नैनीताल. उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्रों में मौजूद ग्लेशियर झीलें भविष्य में बड़ी प्राकृतिक आपदा का कारण बन सकती हैं. जलवायु परिवर्तन के चलते तेजी से पिघलते ग्लेशियर और झीलों में बढ़ता पानी का स्तर वैज्ञानिकों और आपदा प्रबंधन विभाग के लिए चिंता का सबब बन गया है. प्रदेश में करीब 344 ग्लेशियर झीलें हैं, जिनमें से 13 झीलों को संभावित खतरे के लिहाज से चिह्नित किया गया है. इनमें पांच झीलें अति संवेदनशील श्रेणी में रखी गई हैं. खतरे को देखते हुए अब इन झीलों की निगरानी और समय रहते चेतावनी देने के लिए इंतजाम किए जा रहे हैं. इसी कड़ी में चमोली जिले के वसुधारा ताल में 4700 मीटर की ऊंचाई पर उत्तराखंड का पहला ग्लेशियल लेक मॉनिटरिंग एंड अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित किया गया है.
कहां कितनी खतरनाक
लोकल 18 से रुड़की स्थित सेंट्रल बिल्डिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (CBRI) के वैज्ञानिक डॉ. राजेश कुमार ने बताया कि कई एजेंसियों के अध्ययन में उत्तराखंड की 13 ग्लेशियर झीलों को संभावित आपदा के लिहाज से संवेदनशील पाया गया है. इन झीलों को खतरे के स्तर के आधार पर तीन श्रेणियों में बांटा गया है. इनमें A श्रेणी में पांच, B श्रेणी में चार और C श्रेणी में चार झीलें शामिल हैं. A श्रेणी की झीलों को अति संवेदनशील, B श्रेणी की झीलों को संवेदनशील और C श्रेणी की झीलों को कम संवेदनशील माना गया है. सबसे ज्यादा खतरे वाली पांच झीलों में तीन पिथौरागढ़ और दो चमोली जिले में हैं. पिथौरागढ़ जिले में स्यूंति यांक्ति झील, मांबांग झील और प्यंगरू झील के साथ ही चमोली जिले में स्थित सरस्वती ताल और वसुधारा ताल को A श्रेणी में रखा गया है.
हर आहट पर नजर
ग्लेशियर झीलों की संवेदनशीलता को देखते हुए वसुधारा ताल में ग्लेशियल लेक मॉनिटरिंग एंड अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित किया गया है. डॉ. राजेश कुमार के मुताबिक, यह सिस्टम CSR और CBRI के सहयोग से उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (USDMA) और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के सहयोग से लगाया गया है. करीब 4700 मीटर की ऊंचाई पर स्थापित इस सिस्टम में विशेष सेंसर लगाए गए हैं, जो झील से संबंधित रियल टाइम डेटा उपलब्ध करा रहे हैं. इसका उद्देश्य झील के जलस्तर और संभावित बदलावों पर नजर रखना है, ताकि किसी भी असामान्य स्थिति का समय रहते पता लगाया जा सके और आसपास के क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को पहले ही सतर्क किया जा सके. डॉ. राजेश ने बताया कि वर्ष 2026 में स्थापित यह उत्तराखंड का पहला ग्लेशियर लेक मॉनिटरिंग सिस्टम है, दूसरी संवेदनशील झीलों में भी ऐसे उपकरण लगाने की तैयारी की जा रही है.
नेपाल और भूटान की घटनाओं ने बढ़ाई चिंता
वैज्ञानिकों के मुताबिक, ग्लेशियर झीलों के फटने से अचानक बड़े पैमाने पर पानी नीचे की ओर बहने लगता है. इस घटना को ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) कहा जाता है. पहाड़ों का हिस्सा टूटकर झील में गिरने, बर्फ तेजी से पिघलने या झील के प्राकृतिक बांध पर दबाव बढ़ने से ऐसी स्थिति पैदा हो सकती है. इससे निचले इलाकों में अचानक बाढ़, भूस्खलन और भारी तबाही की आशंका रहती है. डॉ. राजेश कुमार ने नेपाल में 26 अगस्त 2026 को आई आपदा और 30 अक्टूबर 2026 को भूटान में ग्लेशियर झील के अचानक फटने की घटना का जिक्र करते हुए कहा कि हिमालयी क्षेत्रों में इस तरह की घटनाएं गंभीर हो सकती हैं. उत्तराखंड पहले भी ऐसी आपदाओं का सामना कर चुका है. वर्ष 2013 में केदारनाथ क्षेत्र में आई भीषण आपदा में हजारों लोगों की जान गई थी. वर्ष 2021 में चमोली में आई आपदा में 200 से अधिक लोगों की मौत हुई थी. इन घटनाओं के बाद हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियर, बर्फीले पहाड़ों और झीलों की निगरानी को लेकर वैज्ञानिक अध्ययन तेज किए गए.
लोगों को भी जागरूक करना जरूरी
संभावित खतरे से निपटने के लिए केवल तकनीकी निगरानी ही नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों को जागरूक करने पर भी जोर दिया जा रहा है. वैज्ञानिकों और आपदा प्रबंधन विभाग की ओर से संवेदनशील झीलों के आसपास रहने वाले लोगों को संभावित खतरे, चेतावनी के संकेतों और बचाव के उपायों की जानकारी दी जा रही है. आपदा मित्रों को SDRF और NDRF के सहयोग से प्रशिक्षण दिया जा रहा है, ताकि किसी आपात स्थिति में राहत और बचाव कार्य तेजी से शुरू किए जा सकें. हिमालयी क्षेत्रों में बदलते मौसम और ग्लेशियरों पर पड़ रहे प्रभाव के बीच उत्तराखंड के लिए इन झीलों की लगातार निगरानी बेहद जरूरी हो गई है. वसुधारा ताल में लगाया गया अर्ली वॉर्निंग सिस्टम इस दिशा में अहम कदम माना जा रहा है. अब चुनौती यह है कि दूसरी संवेदनशील झीलों तक भी ऐसी व्यवस्था पहुंचाई जाए, जिससे संभावित आपदा से पहले चेतावनी देकर जान-माल के नुकसान को कम किया जा सके.