गाजीपुर: आज के दौर में मोबाइल फोन, इलेक्ट्रिक वाहन, आधुनिक चिकित्सा उपकरण और रक्षा तकनीक के विकास में कुछ खास धातुओं की भूमिका लगातार बढ़ रही है. इन्हें रेयर अर्थ एलिमेंट्स (Rare Earth Elements) कहा जाता है. ये तत्व आधुनिक तकनीक की जरूरत बन चुके हैं. इनकी वैश्विक सप्लाई चेन पर चीन का बड़ा प्रभाव है. ऐसे में भारत के लिए इनका खनन, प्रसंस्करण और तकनीक विकसित करना महत्वपूर्ण हो गया है.
गाजीपुर के पीजी कॉलेज में रसायन विज्ञान के प्रोफेसर डॉ. त्रिनाथ मिश्रा रेयर अर्थ एलिमेंट्स पर शोध कर रहे हैं. उन्होंने बताया कि एमएससी की पढ़ाई के दौरान उन्हें सुपरकंडक्टर के बारे में जानने में दिलचस्पी हुई. यहीं से इस विषय पर उनकी रुचि बढ़ी और उन्होंने आगे शोध करने का फैसला किया. सुपरकंडक्टर ऐसे खास पदार्थ होते हैं, जिनमें कुछ विशेष परिस्थितियों में बिजली बिना रुकावट के प्रवाहित हो सकती है. रेयर अर्थ एलिमेंट्स का इस्तेमाल ऐसे पदार्थों को बनाने में भी किया जाता है.
क्या हैं रेयर अर्थ एलिमेंट्स?
रेयर अर्थ एलिमेंट्स कुल 17 रासायनिक तत्वों का समूह है. इनमें नियोडिमियम (Neodymium), प्रासियोडिमियम (Praseodymium), डिस्प्रोसियम (Dysprosium), टर्बियम (Terbium), सेरियम (Cerium), लैंथेनम (Lanthanum), यूरोपियम (Europium), गैडोलिनियम (Gadolinium), समेरियम (Samarium), इट्रियम (Yttrium) और स्कैंडियम (Scandium) जैसे तत्व शामिल हैं.
कई आधुनिक तकनीकों से लैस
नियोडिमियम और प्रासियोडिमियम से शक्तिशाली परमानेंट मैग्नेट बनाए जाते हैं. इन मैग्नेट का इस्तेमाल इलेक्ट्रिक वाहनों की मोटर, पवन ऊर्जा टरबाइन और कई औद्योगिक मशीनों में होता है. वहीं, यूरोपियम और टर्बियम का इस्तेमाल डिस्प्ले और प्रकाश से जुड़ी तकनीक में किया जाता है. गैडोलिनियम से बने कुछ यौगिक MRI जांच में इस्तेमाल होने वाले कंट्रास्ट एजेंट के रूप में उपयोग किए जाते हैं.
डॉ. मिश्रा के मुताबिक, रेयर अर्थ एलिमेंट्स का उपयोग सुपरकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, बैटरी, इलेक्ट्रिक वाहन, विमानन और रक्षा क्षेत्र में भी किया जाता है. इनकी उपयोगिता चिकित्सा और फार्मा उद्योग तक फैली हुई है. कुछ रेयर अर्थ तत्वों के यौगिक रासायनिक प्रक्रियाओं में उत्प्रेरक (Catalyst) के रूप में भी इस्तेमाल होते हैं.
रेयर अर्थ के क्षेत्र में चीन का दबदबा क्यों?
डॉ. मिश्रा ने बताया कि रेयर अर्थ एलिमेंट्स के उत्पादन और प्रसंस्करण में चीन का दबदबा है. भारत के पास भी इन तत्वों के संसाधन मौजूद हैं, लेकिन खनन के साथ-साथ इन्हें अलग-अलग तत्वों में बदलने और शुद्ध करने की तकनीक विकसित करना बड़ी चुनौती है. उन्होंने बताया कि रेयर अर्थ एलिमेंट्स को जमीन से निकालना और उन्हें इस्तेमाल लायक बनाना काफी मुश्किल काम है. इसके लिए खास तकनीक और सावधानी की जरूरत होती है. इन तत्वों को अलग-अलग करने और शुद्ध बनाने के लिए आधुनिक मशीनों और बेहतर प्रयोगशालाओं की आवश्यकता होती है.
AI से शोध और निष्कर्षण में मिल सकती है मदद
प्रोफेसर के अनुसार, आने वाले समय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और रेयर अर्थ एलिमेंट्स से जुड़े शोध का मेल उपयोगी साबित हो सकता है. AI आधारित मॉडलिंग से खनिजों की पहचान, निष्कर्षण की प्रक्रिया और उनके गुणों को समझने में मदद मिल सकती है. इससे शोध और औद्योगिक प्रक्रियाओं को अधिक प्रभावी बनाने की संभावनाएं हैं.
जर्मनी से पीएचडी, अमेरिका में अकादमिक कार्य
इसके बाद उनका शैक्षणिक सफर जर्मनी तक पहुंचा. उन्होंने जर्मनी की मुंस्टर यूनिवर्सिटी से पीएचडी की. फिर अमेरिका की आयोवा स्टेट और फ्लोरिडा स्टेट यूनिवर्सिटी में भी शोध और अकादमिक कार्य किया. इस दौरान उन्हें अमेरिका की नेशनल साइंस फाउंडेशन जैसी प्रतिष्ठित संस्था से फेलोशिप भी मिली. उनका मानना है कि विदेशों में शोध के लिए बेहतर सुविधाएं और आर्थिक सहयोग जरूर मिलता है, लेकिन किसी भी वैज्ञानिक की सबसे बड़ी ताकत उसकी सोच और शोध करने की क्षमता होती है.
उन्होंने विद्यार्थियों को भी इस क्षेत्र में रुचि लेने की सलाह दी. उनके मुताबिक, रेयर अर्थ एलिमेंट्स पर शोध का दायरा काफी व्यापक है. इलेक्ट्रॉनिक्स, ऊर्जा, चिकित्सा, रक्षा और आधुनिक उद्योगों में इनके बढ़ते इस्तेमाल को देखते हुए विज्ञान के विद्यार्थियों के लिए इस क्षेत्र में आगे बढ़ने की अच्छी संभावनाएं हैं.