सतना की 50 साल पुरानी दुकान, यहां से पूरे विंध्य में पहुंचते हैं 20 से ज्यादा किस्मों के पान के पत्ते

सतना की 50 साल पुरानी दुकान, यहां से पूरे विंध्य में पहुंचते हैं 20 से ज्यादा किस्मों के पान के पत्ते


सतना. कभी साइकिल पर पान के पत्ते लेकर गांव-गांव घूमते थे, आज सतना के बस स्टैंड पर अपनी दुकान में बैठकर पूरे विंध्य के लोगों तक पान पहुंचा रहे हैं. यह कहानी 70 साल के रामनिवास चौरसिया की है, जिन्होंने करीब 50 साल पहले छोटे से काम से अपने व्यवसाय की शुरुआत की थी. आज उनकी दुकान पर 20 से ज्यादा किस्म के पान के पत्ते मिलते हैं. यहां 20 रुपये से लेकर 300 रुपये सैकड़ा तक के पान उपलब्ध हैं. दिलचस्प बात यह है कि इस कारोबार से उनका परिवार पांच पीढ़ियों से जुड़ा हुआ है. उम्र के इस पड़ाव पर भी रामनिवास अपने बेटे के साथ दुकान पर बैठते हैं और उसी काम को आगे बढ़ा रहे हैं, जिसने उनके परिवार को पहचान दी.

सतना बस स्टैंड स्थित चौरसिया पान दुकान के संचालक 70 वर्षीय रामनिवास चौरसिया मूल रूप से ग्राम महसांव जिला रीवा के रहने वाले हैं. वर्तमान में वह अपने परिवार के साथ सतना की बैंक कॉलोनी में रहते हैं. रामनिवास ने लोकल 18 से बातचीत में कहा कि करीब 50 साल पहले जब उन्होंने पान का काम शुरू किया था, तब उनके पास कोई दुकान नहीं थी. वह साइकिल पर पान के पत्ते लेकर गांव-गांव जाते थे और लोगों को बेचते थे. उस समय धीरे-धीरे कमाई होती थी लेकिन उन्होंने काम जारी रखा. कुछ समय बाद जब थोड़ी पूंजी इकट्ठा हुई, तो उन्होंने सतना बस स्टैंड पर एक दुकान ले ली. इसके बाद साइकिल से शुरू हुआ उनका सफर दुकान तक पहुंच गया. आज भी वह उसी दुकान में अपने बेटे के साथ बैठकर पान के पत्ते बेचते हैं.

दुकान पर मिलते हैं 20 तरह के पान
रामनिवास की दुकान पर आने वाले ग्राहकों को पान की अलग-अलग किस्में एक ही जगह मिल जाती हैं. यहां कटक, मोहन, फुरी, कलकतिया, बनारसी, बंगला और मीठी पत्ती समेत करीब 20 प्रकार के पान के पत्ते उपलब्ध हैं. हर किस्म का स्वाद और इस्तेमाल अलग होता है, इसलिए ग्राहक अपनी पसंद के हिसाब से पत्ते खरीदते हैं. इनमें मीठी पत्ती सबसे महंगी किस्मों में शामिल है, जिसका भाव 300 रुपये सैकड़ा तक है. इस तरह कम कीमत वाले पान से लेकर महंगी किस्म तक के विकल्प यहां मौजूद हैं.

चवन्नी में मिल जाते थे सैकड़ों पान
रामनिवास चौरसिया ने अपने व्यवसाय के पुराने दिनों को याद करते हुए कहा कि जब उन्होंने 20 साल की उम्र में पान बेचना शुरू किया था, तब चवन्नी यानी 25 पैसे में ही सैकड़ों पान के पत्ते मिल जाते थे. उस समय एक ही कीमत में अलग-अलग किस्मों के पान के पत्ते खरीदने को मिल जाते थे. अब समय के साथ पान के दाम भी बदल गए हैं. आज अलग-अलग वैरायटी के हिसाब से एक सैकड़ा पान के पत्तों की कीमत 20 से 300 रुपये तक पहुंच गई है.

पिता और दादा से मिली थी व्यवसाय की सीख
उन्होंने कहा कि पान का काम उनके परिवार में नया नहीं है, उनके पिता और दादा भी पान लगाकर लोगों को खिलाने का काम करते थे, यानी यह कारोबार उन्हें विरासत में मिला है. उन्होंने भी इसी काम को आगे बढ़ाया और अपनी मेहनत से इसे एक अलग पहचान दिलाई. उनका परिवार सतना और रीवा में पान के पत्तों के लिए जाना जाता है. इस व्यवसाय से उनके परिवार की पांच पीढ़ियां जुड़ी हुई हैं. इसी काम से उन्होंने अपने दोनों बच्चों को पढ़ाया-लिखाया और सतना शहर में अपना घर भी बनवाया. अब उनके बच्चे भी इस व्यवसाय में उनका साथ दे रहे हैं.

गंज, सलेहा और महोदरा के किसानों से सीधा संपर्क
दुकान पर इतनी तरह के पान के पत्ते उपलब्ध होने की एक बड़ी वजह रामनिवास का किसानों से सीधा जुड़ाव है. उन्होंने कहा कि गंज, सलेहा और पन्ना जिले के महोदरा गांव के कई किसान उनके लिए पान के पत्ते लेकर आते हैं. इन किसानों से उनका लंबे समय से संपर्क है. सुबह-सुबह ही अलग-अलग किस्मों के पान के पत्तों की खेप दुकान पर पहुंच जाती है. इससे उन्हें ग्राहकों की जरूरत के हिसाब से अलग-अलग वैरायटी उपलब्ध कराने में आसानी होती है. किसानों से सीधे माल मिलने के कारण उनका कारोबार लगातार चलता रहता है.

विंध्य के कई इलाकों तक पहुंचता है पान
रामनिवास चौरसिया की दुकान सिर्फ सतना के ग्राहकों तक सीमित नहीं है, यहां से पान के पत्ते बसों में लोड होकर विंध्य क्षेत्र के कई इलाकों तक भेजे जाते हैं. सतना बस स्टैंड पर दुकान होने का उन्हें यह फायदा मिलता है कि अलग-अलग रूट की बसों के जरिए पान की खेप आसानी से दूसरे शहरों और कस्बों तक पहुंच जाती है. इस तरह उनकी दुकान से कई जगहों पर पान के पत्तों की सप्लाई होती है.

आज 70 साल की उम्र में भी रामनिवास चौरसिया अपने बेटे के साथ दुकान पर बैठकर काम करते हैं. कभी साइकिल पर गांव-गांव घूमकर पान बेचने वाले रामनिवास ने इसी व्यवसाय से अपने परिवार को आगे बढ़ाया. उनके लिए यह सिर्फ एक दुकान नहीं बल्कि पिता और दादा से मिली विरासत है, जिसे वह अगली पीढ़ी तक पहुंचा रहे हैं. सतना बस स्टैंड की यह दुकान आज भी बताती है कि छोटे स्तर से शुरू किया गया काम भी सालों की मेहनत और भरोसे से बड़ी पहचान बना सकता है.



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