छत पर सूखता सरसों का साग, फिर बनती है टमाटर-आलू वाली देसी सब्जी, जानिए सरगुजा की सूकटी

छत पर सूखता सरसों का साग, फिर बनती है टमाटर-आलू वाली देसी सब्जी, जानिए सरगुजा की सूकटी


Sarson Ki Sukti Recipe: छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में आज भी पुरानी परंपरा से जुड़ी हुए खानपान को ग्रामीण संजोए हुए है. दरअसल, आधुनिकता के इस दौर में जहां लोग हाई प्रोफाइल खान पान पसंद करते हैं और ख़ान पान में भी तेजी से बदलाव आ रहा है, तो दूसरी ओर गांव में आज भी सरसों की फसल लगाकर लोग अपने घर की रसोई में पुराने स्वाद का आंनद लेते हैं. ऐसे में केसरा गांव जो सरगुजा का आदिवासी बाहुल्य इलाका है. वहां के एक युवक ने 10 डिस्मिल में सरसों की खेती की है और फिर उस फसल और फूल को सुपा में रखकर घर की छत के उपर सुखाकर बारीक पीसकर चूर्ण की तरह होने के बाद सब्जी बनाकर पुरे परिवार के लोग बैठकर खाते हैं और खाने का स्वाद मजेदार होता है, देखिए ये रिपोर्ट…

धूप में सुखाया जाता है सरसों का साग, फिर बनती है सूकटी
सरगुजा के गांवों में आज भी पारंपरिक खानपान को लेकर लोगों का खास लगाव देखने को मिलता है यहां सरसों की खेती से निकलने वाले हरे साग को सीधे सब्जी बनाने के बजाय पहले धूप में सुखाया जाता है कंच कुमार के घर में भी सरसों के साग को सुखाने के लिए छत पर रखा गया था जब साग अच्छी तरह सूख जाता है, तो उसे पीसकर सुरक्षित रख लिया जाता है. इसी सूखे साग से तैयार होती है पारंपरिक सरसों की सूकटी..

टमाटर, आलू और मसालों के साथ तैयार होती है देसी सब्जी
कंच कुमार बताते हैं कि सरसों की सूकटी बनाने का तरीका काफी आसान है, सबसे पहले सरसों के साग को धूप में सुखाया जाता है. इसके बाद उसे पीसकर रखा जाता है, जब सब्जी बनानी होती है, तब उसमें टमाटर, आलू, तेल और दूसरे जरूरी मसाले मिलाकर पकाया जाता है. इस तरह तैयार होने वाली सब्जी का स्वाद सामान्य हरी सब्जियों से अलग होता है. परिवार के लोग इसे अपने रोजमर्रा के भोजन में बड़े चाव से खाते हैं.

पांच डिसमिल में करते हैं सरसों की खेती, बाजार नहीं घर के लिए उत्पादन
कंच कुमार बताते हैं कि उन्होंने अपने घर की जरूरत के हिसाब से करीब पांच डिसमिल जमीन में सरसों की खेती की है. इसका उद्देश्य बाजार में बेचकर कमाई करना नहीं, बल्कि परिवार के खाने के लिए साग तैयार करना है. सरसों के पौधों में निकलने वाले फूलों का भी इस्तेमाल खाने में किया जाता है. इस तरह घर में ही अपनी जरूरत का पारंपरिक साग तैयार कर लिया जाता है.

दादी-पुरखों से मिली रेसिपी, आज भी निभा रहे परंपरा
इस पारंपरिक खानपान की सबसे खास बात यह है कि इसे बनाने की विधि किसी किताब या इंटरनेट से नहीं सीखी गई है. कंच कुमार बताते हैं कि उनके परिवार में यह परंपरा पुराने समय से चली आ रही है. उनकी दादी और पूर्वज भी इसी तरह सरसों के साग को सुखाकर सब्जी बनाते थे. पीढ़ी दर पीढ़ी यह स्वाद आगे बढ़ता रहा और आज भी परिवार के लोग इसे अपने भोजन में शामिल करते हैं.

ठंड के मौसम में बढ़ जाता है सूकटी का स्वाद
ग्रामीणों के मुताबिक सरसों की सूकटी का सेवन खासतौर पर ठंड के मौसम में अधिक पसंद किया जाता है. सरसों के साग की खासियत और उसे सुखाकर तैयार करने का पारंपरिक तरीका इस व्यंजन को अलग पहचान देता है, धूप निकलने पर एक-दो दिनों में साग सूखकर तैयार हो जाता है. इसके बाद इसे जरूरत के अनुसार इस्तेमाल किया जा सकता है.

आधुनिक खानपान के बीच बची हुई है सरगुजा की देसी पहचान
आज बाजार में तरह-तरह की सब्जियां और खाने-पीने के विकल्प मौजूद हैं, लेकिन सरगुजा के ग्रामीण परिवार आज भी अपने पुरखों के खानपान को नहीं भूले हैं. सरसों की सूकटी इसका एक उदाहरण है. यह सिर्फ एक सब्जी नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवनशैली, पारंपरिक ज्ञान और परिवार की पुरानी यादों से जुड़ा स्वाद है,ऐसे पारंपरिक व्यंजन आज भी सरगुजा की सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखे हुए हैं.



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