राष्ट्रीय ध्वज के साथ राजकीय झंडे का क्या प्रावधान है?
भारत का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा है. राष्ट्रीय ध्वज के प्रदर्शन और इस्तेमाल के लिए फ्लैग कोड ऑफ इंडिया, 2002 लागू है. इसमें राष्ट्रीय ध्वज की गरिमा, उसके प्रदर्शन की स्थिति, आकार, अनुपात और अन्य झंडों के साथ उसे लगाने के नियम दिए गए हैं. फ्लैग कोड के मुताबिक कुछ नियम हैं.
यहां एक अहम बात समझने की जरूरत है. फ्लैग कोड में दूसरे झंडों के साथ राष्ट्रीय ध्वज के प्रदर्शन पर कुछ नियम जरूर हैं, लेकिन यह अपने आप में राज्यों के लिए अलग झंडा बनाने की अनुमति या प्रतिबंध का कानून नहीं है.
क्या तिरंगे के साथ राज्य का झंडा लगाया जा सकता है?
फ्लैग कोड के नियमों के अनुसार एक ही खंभे पर दोनों झंडे फहराना प्रतिबंधित है. अलग-अलग खंभों पर प्रदर्शन के मामले में भी राष्ट्रीय ध्वज को सर्वोच्च सम्मान और विशिष्ट स्थान देना होगा. राष्ट्रीय ध्वज के ऊपर, उससे ऊंचा या उसके बराबर ऐसी स्थिति में दूसरा झंडा नहीं लगाया जा सकता, जो कोड के नियमों के विपरीत हो. इसलिए अलग खंभों पर झंडे लगाने और एक ही खंभे पर दोनों झंडे फहराने को एक जैसा नहीं समझना चाहिए.
क्या अलग राज्य झंडा रखने के लिए केंद्र सरकार की मंजूरी जरूरी है?
यह इस पूरे मामले का एक महत्वपूर्ण कानूनी सवाल है. संविधान में राज्य के झंडे के लिए अलग से कोई प्रक्रिया निर्धारित नहीं की गई है. इसी वजह से यह भी स्पष्ट नहीं है कि किसी राज्य को झंडे की औपचारिक मान्यता देने के लिए केंद्र से किस तरह की मंजूरी लेनी होगी. हालांकि 2018 में कर्नाटक सरकार ने अपना अलग आधिकारिक झंडा बनाने की पहल की थी. तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने पीले, सफेद और लाल रंग की पट्टियों वाले झंडे का प्रस्ताव पेश किया था. इसके बीच में राज्य का प्रतीक चिह्न गंडभेरुंडा बनाया गया था.
क्या राज्य का झंडा फहराने पर किसी तरह की सजा हो सकती है?
सिर्फ किसी राज्य, भाषा, संस्कृति या क्षेत्रीय पहचान का झंडा रखने से अपने आप कोई अपराध नहीं बनता. लेकिन राष्ट्रीय ध्वज का अपमान करना या उसके प्रदर्शन से जुड़े कानूनों का उल्लंघन करना अलग मामला है.राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 की धारा 2 के तहत राष्ट्रीय ध्वज को जलाना, विकृत करना, पैरों से कुचलना या सार्वजनिक रूप से उसका अपमान करना दंडनीय अपराध है. इसके लिए तीन साल तक की कैद, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं. इसके अलावा, किसी भी राज्य के झंडे को इस तरह प्रदर्शित नहीं किया जा सकता कि राष्ट्रीय ध्वज की गरिमा और सम्मान से जुड़े फ्लैग कोड के नियमों का उल्लंघन हो. इसलिए राज्य के झंडे और राष्ट्रीय ध्वज के बीच सम्मान और प्रदर्शन के नियमों का पालन करना अनिवार्य है.
क्या राज्य का झंडा राष्ट्रीय ध्वज से अलग पहचान रख सकता है?
भारत में राज्यों की अपनी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान है. राज्य अपने प्रतीक चिह्न, राजकीय पशु, पक्षी, फूल और भाषा निर्धारित कर सकते हैं. इन प्रतीकों का इस्तेमाल राज्य की पहचान और प्रशासनिक प्रतिनिधित्व के लिए होता है. लेकिन झंडे का मामला थोड़ा अलग है. राज्य के प्रतीक चिह्न और राज्य के झंडे को एक ही कानूनी श्रेणी में नहीं रखा जा सकता. राज्य का प्रतीक चिह्न सरकारी आदेशों और राज्य के नियमों के तहत इस्तेमाल हो सकता है, लेकिन अलग राजकीय झंडे के मामले में राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान और प्रदर्शन से जुड़े नियमों का भी ध्यान रखना होगा.
क्या भारत में दो झंडे रखने से संविधान का उल्लंघन होगा?
इसका जवाब सीधे हां या ना में देना सही नहीं होगा. भारतीय संविधान में राज्यों के अलग झंडे पर कोई स्पष्ट प्रतिबंध नहीं है. लेकिन संविधान का अनुच्छेद 51A(a) प्रत्येक नागरिक को राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान का सम्मान करने का कर्तव्य देता है. इसके अलावा अनुच्छेद 51A(c) के तहत देश की संप्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करना भी प्रत्येक नागरिक का मौलिक कर्तव्य है. इसलिए किसी राज्य का झंडा उसकी सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक हो सकता है, लेकिन उसे राष्ट्रीय ध्वज के समान संवैधानिक दर्जा हासिल नहीं है. दूसरे शब्दों में, राज्य की क्षेत्रीय पहचान और देश की राष्ट्रीय पहचान को अलग-अलग समझना होगा. किसी राज्य के झंडे को मान्यता देने का सवाल राष्ट्रीय ध्वज की संवैधानिक सर्वोच्चता और उसके सम्मान से जुड़े नियमों के अधीन ही देखा जाएगा.
क्या जम्मू-कश्मीर के पास अपना अलग झंडा था?
हां. जम्मू-कश्मीर भारत का ऐसा राज्य रहा है, जिसके पास अलग संवैधानिक प्रावधान के तहत अपना झंडा था. इसकी वजह अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को मिला विशेष संवैधानिक दर्जा था. जम्मू-कश्मीर के अपने संविधान में भी राज्य के झंडे का प्रावधान था. जम्मू-कश्मीर संविधान की धारा 144 में राज्य के झंडे का उल्लेख किया गया था. इसमें लाल रंग की पृष्ठभूमि पर सफेद रंग से हल और तीन खड़ी पट्टियां बनाई गई थीं. लाल रंग को मजदूरों और श्रम का प्रतीक बताया गया था, जबकि हल कृषि और तीन पट्टियां जम्मू, कश्मीर और लद्दाख क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करती थीं. हालांकि अब परिस्थिति बदल चुकी है. जम्मू-कश्मीर का अलग झंडा अब नहीं है. 5 अगस्त 2019 को केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को हटाने की प्रक्रिया के बाद जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के तहत राज्य को दो केंद्रशासित प्रदेशों- जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में पुनर्गठित किया गया. इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर का अलग संविधान और उसके तहत मिलने वाली अलग झंडे की संवैधानिक व्यवस्था भी समाप्त हो गई.