आज के दिन ही जन्मे थे जस्टिस आदर्श सेन आनंद… जिन्होंने कसी थी पुलिस की थर्ड डिग्री पर नकेल, गिरफ्तारी के लिए बनाए थे 11 नियम

आज के दिन ही जन्मे थे जस्टिस आदर्श सेन आनंद… जिन्होंने कसी थी पुलिस की थर्ड डिग्री पर नकेल, गिरफ्तारी के लिए बनाए थे 11 नियम


Last Updated:

Who is Justice Adarsh Sen: देश के 29 वें CJI जस्टिस आदर्श सेन आनंद का जन्म 1 नवंबर 1936 को हुआ था. उन्होंने ही पुलिस की मनमानी पर लगाम लगाते हुए किसी की गिरफ्तारी के समय वो 11 नियम बताए थे, जिसका पालन करना पुलिस के लिए आज भी जरूरी है.

Zoom

देश के 29वें CJI जस्टिस ए.एस आनंद का जन्म आज के दिन ही हुआ था. (फोटो- राष्ट्रीय सचिवालय)

पुलिस आज भी किसी को गिरफ्तार करती है तो उसे खास 11 नियमों का पालन करना पड़ता है. इन नियमों को बनाने वाले जस्टिस आदर्श सेन आनंद थे, जो देश के 29 वे सीजेआई रहे थे. उन्होंने जस्टिस मदन मोहन पुंछी की जगह ली थी. जस्टिस आदर्श सेन के जन्मदिवस पर जानते हैं, आखिर उनका वो ऐतिहासिक फैसला क्या था, जिसने पुलिस की मनमानी पर नकेल कसी और गिरफ्तारी के वो 11 नियम बनाए जिनका पालन आज भी किया जाता है.

जस्टिस आदर्श सेन का जन्म 1 नवंबर 1936 को जम्मू में हुआ था. इंडिया लीगल वेबसाइट के मुताबिक उनकी शुरुआती शिक्षा जम्मू के मॉडल अकादमी में हुई थी. इसके बाद 1958 में उन्होंने जम्मू कश्मीर यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन किया था. 1960 में लखनऊ यूनिवर्सिटी से कानून की डिग्री हासिल करने के बाद उन्होंने लंदन यूनिवर्सिटी से कॉमनवेल्थ के संवैधानिक कानून पर डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की थी. जब वे भारत लौटे तो उन्होंने चंडीगढ़ एवं हरियाणा हाईकोर्ट में वकालत शुरू कर दी. वह आपराधिक कानून, संवैधानिक कानून के मामलों की पैरवी करते थे.

38 साल की उम्र में बने हाईकोर्ट के जज

जस्टिस आनंद को 26 मई 1975 को महज 38 साल की उम्र में हाईकोर्ट का अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त किया गया था. वह फरवरी 1976 में स्थायी जज बने थे. 1984 में उन्हें जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट का कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश बनाया गया था. 1 नवंबर 1989 को मद्रास हाईकोर्ट में उनका तबादला हुआ और नवंबर 1991 में उन्हें सुप्रीम कोर्ट के जज के रूप में पदोन्नति मिली. 10 अक्टूबर 1998 में उन्हें भारत का मुख्य न्यायाधीश चुना गया. वह इस पद पर पहुंचने वाले 29वें व्यक्ति थे.

पुलिस की थर्ड डिग्री पर नकेल कसने वाला फैसला

ये वो दौर था जब पुलिस लॉकअप और पुलिस हिरासत में यातना और लोगों की मौत का जिक्र आए दिन अखबारों में होता था. 1986 में पश्चिम बंगाल के कार्यकारी अध्यख डीके बसु ने तत्कालीन चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया को एक लेटर लिखा. यही आगे चलकर डीके बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य मामला बना, जिसका फैसला जस्टिस आनंद के न्यायिक जीवन का सबसे खास फैसला बन गया.

दरअसल डीके बसु की मांग थी कि पुलिस हिरासत में होने वाली मौतों और अत्याचारों को रोकने के लिए एक प्रभावी व्यवस्था बनाई जाए. सुप्रीम कोर्ट ने इस जनहित याचिका के तौर पर स्वीकार किया. इस मामले में 18 दिसंबर 1996 को जस्टिस कुलदीप सिंह और जस्टिस आदर्श सेन आनंद की पीठ ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया, जिनमें गिरफ्तारी से जुड़े 11 नियम बताए गए थे.

CJI के तौर पर कार्यभार ग्रहण करते जस्टिस ए.एस. आनंद. (फोटो-राष्ट्रपति सचिवालय)

क्या थे वो 11 नियम?

  • गिरफ्तारी करने वाले पुलिसकर्मियों की वर्दी पर नाम और पद का बैज होना चाहिए. उनकी पहचान स्पष्ट होनी चाहिए.
  • गिरफ्तारी के समय मेमो तैयार किया जाए. इस पर एक गवाह और एक गिरफ्तार व्यक्ति के साइन होने चाहिए.
  • पकड़े गए व्यक्ति के रिश्तेदार, मित्र या परिचित को तुरंत ही गिरफ्तारी की जानकारी देनी चाहिए.
  • अगर पकड़े गए व्यक्ति का परिवार दूसरे शहर में है तो उसे 8 से 12 घंटे के अंदर सूचना दी जानी चाहिए.
  • पकड़े गए व्यक्ति को बताया जाए कि वह अपने रिश्तेदार या मित्र को गिरफ्तारी की जानकारी देने का अधिकार रखता है.
  • गिरफ्तारी की सूचना पाले वाले व्यक्ति और हिरासत में रखने वाले पुलिसकर्मियों की जानकारी डायरी में दर्ज होनी चाहिए.
  • गिरफ्तारी के समय संबंधित व्यक्ति के शरीर पर कितनी चोटें थीं, पुलिस को इसका भी रिकॉर्ड रखना चाहिए.
  • हिरासत में लेने के दौरान 48 घंटे के अंदर संबंधित व्यक्ति का डॉक्टर से मेडिकल परीक्षण कराया जाए.
  • गिरफ्तारी से संबंधित जरूरी दस्तावेजों की प्रतियां संबंधित मजिस्ट्रेट को भेजी जाएं.
    पूछताछ के दौरान व्यक्ति को अपने वकील से मिलने की अनुमति दी जानी चाहिए.
  • हर जिले और राज्य के पुलिस मुख्यालय में कंट्रोल रूम हो. गिरफ्तारी और हिरासत की जगह की सूचना 12 घंटे के भीतर वहां पहुंचाई जानी चाहिए.

मानवाधिकारों के लिए काम करते रहे जस्टिस आनंद

जस्टिस आनंद ने न्यायपालिका में मानवाधिकारों के लिए काम किया. 2003 में उन्हें राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था. वह 2007 तक इस पद पर रहे. इसके अलावा उन्होंने जम्मू-कश्मीर के संविधान पर एक पुस्तक भी लिखी थी, 1996 में लखनऊ यूनिवर्सिटी से मानद डॉक्टरेट और 1997 में यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन की फेलोशिप मिली थी. वर्ष 2008 में उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था. 1 दिसंबर 2017 को 81 साल की उम्र में उनका निधन हो गया था.



Source link