नोएडा: सेक्टर 128 स्थित असगरपुर गांव में एक महिला ने ऐसी फसल उगा रही हैं, जिसे आमतौर पर करना किसी के लिए भी मुश्किल है. यहां आर्किटेक्ट रहीं प्रेरिका सक्सेना ने 20×10 के कमरे में एरोपोनिक तकनीक के जरिए केसर की खेती का सेटअप तैयार किया है. कमरे में तापमान, नमी, CO2, एयरफ्लो और रोशनी को सेंसर और ऑटोमेशन की मदद से नियंत्रित किया जाता है. अब केसर वाले फ्लॉवर्स आने शुरू हो गए हैं. इस समय कमरे का तापमान करीब 10 डिग्री है. रैक्स और ट्रे में लगाए गए केसर के कॉर्म्स से अब केसर आना शुरू हो गया है और नवंबर के मध्य तक फूल आते रहेगें.
150 ट्रे में उगा रही हैं केसर
प्रेरिका सक्सेना ने लोकल 18 से बात करते हुए बताया कि वो ग्रोटेक ऑर्गेनिक फॉर्म की फाउंडर हैं. उन्होंने आर्किटेक्चर की पढ़ाई करने के बाद करीब 10 साल तक एक MNC में काम किया. नौकरी के दौरान रिसर्च करते हुए उन्हें पता चला कि बाजार में केसर की मांग अधिक है, जबकि उत्पादन और सप्लाई सीमित है. इसके बाद उन्होंने कश्मीर जाकर वहां के किसानों से खेती की जानकारी हासिल की और रिसर्च शुरू की. साल 2025 में उन्होंने पहली बार इस तकनीक से केसर उगाया. पहले साल इसी सेटअप से करीब 300 ग्राम केसर का उत्पादन हुआ. इस साल यह उनका दूसरा चक्र है और करीब 150 ट्रे में केसर की खेती कर रही हैं.
हर चीज ऑटोमेशन पर
इस सेटअप में एरोपोनिक तकनीक का इस्तेमाल किया गया है, जिसमें पौधों को सामान्य तरीके से सीधे पानी देने के बजाय हवा में नमी और मिस्ट के जरिए पानी उपलब्ध कराया जाता है. इसके लिए ह्यूमिडिफायर लगाया गया है. साथ ही फुल स्पेक्ट्रम ग्रो लाइट्स, चिलर, एयर सर्कुलेशन के लिए पंखे और CO2 सेंसर लगाए गए हैं. तापमान और ह्यूमिडिटी सेंसर के साथ स्मार्ट स्विच की मदद से AC, ह्यूमिडिफायर, डीह्यूमिडिफायर, CO2 और लाइटिंग को ऑटोमेट किया गया है. जरूरत के हिसाब से ये उपकरण अपने आप चालू और बंद होते रहते हैं. इस वजह से पूरे सेटअप को एक नियंत्रित वातावरण में चलाया जा सकता है.
अभी आ रहे हैं केसर वाले फ्लॉवर्स
केसर के लिए कॉर्म का आकार भी महत्वपूर्ण बताया गया है. करीब 5 से 6 ग्राम या उससे बड़े कॉर्म में फूल आने की संभावना होती है, जबकि छोटे कॉर्म पहले साल फूल नहीं देते और आगे मल्टीप्लिकेशन के काम आते हैं. अगस्त में कॉर्म को एरोपोनिक स्टेज में रखा जाता है और अक्टूबर के अंत से करीब 15 दिन की फ्लावरिंग साइकिल शुरू होती है. फूल आने के बाद उन्हें तुरंत तोड़ना पड़ता है, क्योंकि फूल के अंदर मौजूद केसर की तीन लड़ी वाली पत्तियों को निकालकर सुखाया जाता है और ज्यादा देर तक रोशनी के संपर्क में रहने से गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है. फ्लावरिंग के बाद दिसंबर से कॉर्म को मिट्टी में डालकर अगली साइकिल के लिए तैयार किया जाता है.
दूसरों को भी दे रहीं रोजगार
इस खेती में सबसे बड़ी चुनौतियों में तापमान और नमी के साथ फंगस को नियंत्रित करना है. प्रेरिका के मुताबिक, केसर में व्हाइट फंगस और ब्लैक फंगस जैसी समस्या सामने आ सकती है, जिसके लिए कृषि उपयोग वाले नीम ऑयल से उपचार किया जाता है. फ्लावरिंग के समय नियमित निरीक्षण जरूरी होता है. हार्वेस्टिंग के दौरान करीब 10 से 20 लोगों की जरूरत पड़ सकती है, जिसमें फूल तोड़ने, सुखाने और आगे की प्रक्रिया का काम शामिल है. मिट्टी वाले चरण में भी महिलाओं समेत अन्य लोगों को काम मिलता है. प्रेरिका और उनके पति विकास का कहना है कि इस तकनीक में बाहरी मौसम और मिट्टी की परिस्थितियों को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है, इसलिए इसे देश के दूसरे हिस्सों में भी अपनाया जा सकता है. हालांकि इसके लिए लगातार रिसर्च, फसल की स्टेज की समझ और वैज्ञानिक तरीके से निगरानी जरूरी है.
ट्रेनिंग भी देती हैं प्रेरिका
नोएडा में तैयार इस सेटअप का एक दूसरा पहलू किसानों और नए उद्यमियों के लिए ट्रेनिंग भी है. विकास के मुताबिक, वो और उनकी वाइफ एरोपोनिक केसर की खेती के लिए ऑनलाइन और ऑफलाइन ट्रेनिंग के साथ सेटअप डिजाइन, उपकरण, सेंसर और ऑटोमेशन को लेकर कंसल्टेंसी भी देती हैं. ऑनलाइन ट्रेनिंग की फीस 5,000 रुपये और ऑफलाइन ट्रेनिंग की फीस 10,000 रुपये बताई गई है. इन्होंने बताया कि अक्टूबर के अंत में भी एक ट्रेनिंग कार्यक्रम प्रस्तावित है, जिसमें किसान और उद्यमी शामिल होने वाले हैं.