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US Midterm Elections Impact : अमेरिका में 3 नवंबर को मिडटर्म इलेक्शन होंगे. ये चुनाव राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए कड़ी परीक्षा है. अगर इस चुनाव में ट्रंप की विरोधी डेमोक्रेटिक पार्टी किसी भी एक सदन या दोनों सदनों में बहुमत हासिल कर लेती है तो राष्ट्रपति को अपने एजेंडों को लागू करना काफी मुश्किल हो जाएगा.
यदि डेमोक्रेट्स दोनों सदनों में जीत भी जाते हैं, तब भी राष्ट्रपति ट्रंप के कार्यकारी अधिकारों पर पूरी तरह ताला नहीं लगेगा. (Photo : रॉयटर्स)
नई दिल्ली. अमेरिका में 3 नवंबर को होने वाले मिडटर्म चुनाव बेहद निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुके हैं. इन चुनावों से यह तय होगा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के अंतिम दो वर्षों में अमेरिकी संसद के दोनों सदनों यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट पर किसका कब्जा होगा. इस चुनाव में प्रतिनिधि सभा की सभी 435 सीटों पर मतदान होगा. सीनेट की 100 में से एक-तिहाई सीटों पर चुनाव होगा. यही वजह है कि मिडटर्म चुनाव राष्ट्रपति के लिए सीधे राष्ट्रपति चुनाव जैसा नहीं होता, लेकिन इससे अगले दो साल में उनकी सरकार की काम करने की क्षमता पर बड़ा असर पड़ सकता है. यदि इस चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी किसी भी एक सदन या दोनों सदनों में बहुमत हासिल कर लेती है, तो ट्रंप प्रशासन के व्यापार, इमिग्रेशन और टैरिफ से जुड़े फैसलों की कड़ी संसदीय निगरानी और जांच शुरू हो सकती है.
मिडटर्म चुनाव में अगर डोनाल्ड ट्रंप की पार्टी हार जाती है और डेमोक्रेटिक पार्टी जीत जाती है तो इससे भारत-अमेरिका के व्यापार संबंधों, टैरिफ या फिर यूएस में काम कर रहे पेशेवरों पर तुंरत और सीधा असर नहीं होगा. लेकिन, यदि कांग्रेस में डेमोक्रेट्स आते हैं तो वे अंधाधुंध टैरिफ लगाने की राष्ट्रपति ट्रंप की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा सकते हैं और विधायी बहस छेड़ सकते हैं. हालांकि, विदेश नीति और व्यापारिक फैसलों पर ट्रंप के पास वीटो पावर बनी रहेगी, जिससे रातोंरात नीतियां बदलना आसान नहीं होगा. लेकिन, ट्रंप पर एक दबाव जरूर बनेगा.
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका भारतीय सामानों का सबसे बड़ा निर्यातक बाजार है. फरवरी में भारत और अमेरिका के बीच एक अंतरिम व्यापार ढांचे की घोषणा हुई थी, जिसके तहत भारतीय सामानों पर 18 फीसदी टैरिफ लगाने की बात कही गई थी. हालांकि, बाद में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप द्वारा आपातकालीन शक्तियों के जरिए लगाए गए टैरिफ को रद्द कर दिया, जिससे शुल्क घटकर 10 फीसदी के आधार स्तर पर आ गया. इसके बावजूद दोनों देशों के बीच पूर्ण द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर अब तक कोई ठोस सहमति नहीं बन सकी है. हाल ही में अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जैमीसन ग्रीर ने साफ किया था कि व्यापार समझौता जल्द होने की उम्मीद नहीं है. वहीं भारत की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी स्पष्ट किया कि बातचीत एक ठहराव पर पहुंच चुकी है और आगे गुंजाइश सीमित है.
अमेरिका में कार्यरत भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स और कंपनियों के लिए H-1B वीजा सबसे संवेदनशील मुद्दा रहा है. ट्रंप प्रशासन ने नए H-1B आवेदनों पर 1 लाख डॉलर की भारी-भरकम फीस लगाने का प्रस्ताव रखा था, जिसे अदालतों में कानूनी चुनौती मिली है. दो संघीय न्यायाधीशों ने प्रक्रिया का सही पालन न होने के आधार पर फिलहाल इस फीस को लागू करने पर रोक लगा रखी है, हालांकि यह कानूनी लड़ाई का अंतिम समाधान नहीं है.
संसद में डेमोक्रेट्स का बहुमत होने से भविष्य में बनने वाले इमिग्रेशन कानूनों और प्रशासनिक आदेशों पर संसद की जांच तो बढ़ेगी, लेकिन वीजा नियमों में तुरंत बड़े बदलाव की गारंटी नहीं है. बेंगलुरु स्थित तक्षशिला इंस्टीट्यूशन के एक शोध के मुताबिक, अमेरिकी कांग्रेस में भारत के लिए समर्थन व्यापक जरूर है, लेकिन वह काफी हद तक सतही है. इसके अलावा सत्ता पक्ष के भीतर एक मुखर समूह लगातार इमिग्रेशन को सीमित करने के पक्ष में सक्रिय है.
यदि डेमोक्रेट्स दोनों सदनों में जीत भी जाते हैं, तब भी राष्ट्रपति ट्रंप के कार्यकारी अधिकारों पर पूरी तरह ताला नहीं लगेगा. राष्ट्रपति के पास किसी भी पारित विधेयक को वीटो करने की ताकत रहेगी और सीनेट की फिलिबस्टर प्रक्रिया भी किसी कानून को आसानी से पास नहीं होने देती. खुद अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा है कि अगर डेमोक्रेट्स प्रतिनिधि सभा जीत भी जाते हैं, तो भी वे ट्रंप के आर्थिक एजेंडे को रोकने के लिए बहुत सीमित कदम ही उठा पाएंगे. साफ है कि मिडटर्म चुनाव ट्रंप के फैसलों पर सख्त संसदीय ब्रेक जरूर लगा सकते हैं, लेकिन भारत-अमेरिका व्यापार की दिशा काफी हद तक दोनों सरकारों की आपसी कूटनीति पर ही टिकी रहेगी.
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