वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) बढ़ने की रफ़्तार 1960 के दशक से तीन गुना हो गई है. विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने 27 अक्टूबर को जारी अपनी एक ताजा रिपोर्ट में ये बात जैसे ही सामने रखी, पूरी दुनिया में जालवायु परिवर्तन को लेकर चिंताएं और बढ़ गई हैं. ये रिपोर्ट बताती है कि वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड का बढ़ना अल-नीनो के कारण और भी ज्यादा बढ़ रहा है. सबसे चिंता वाली बात ये है कि CO2 की ये मात्रा जो हवा में मौजूद है, वो एक-दो साल नहीं बल्कि सदियों तक अपना असर छोड़ने वाली है. सिर्फ कार्बन डाइऑक्साइड ही नहीं, मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड की मात्रा भी 2025 में काफी ज्यादा ऊपर पहुंच गई है. मानव गतिविधियों से पैदा होने वाली ये गैस वातावरण में लम्बे समय तक बने रहने के मामले में दूसरे व तीसरे स्थान पर आती हैं.
एक-दो साल नहीं, सदियों तक रहेगा असर
संयुक्त राष्ट्र की ये ताजा रिपोर्ट बताती है कि 2025 में, वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड समेत अन्य ग्रीनहाउस गैस की मात्रा अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच गई है. चिंता की बात ये है कि इसके प्रभाव कई सदियों तक जारी रह सकते हैं. इसकी वजह से वैश्विक तापमान में बढोत्तरी जारी रहने और तूफ़ान, सूखा, बाढ़, भीषण गर्मी जैसी मौसम घटनाओं का जोखिम भी बढ़ने की आशंका है. रिपोर्ट में सामने आया है कि पिछले 11 साल रिकॉर्ड पर सबसे अधिक गर्म साबित हुए हैं और यह रुझान आगे भी जारी रहने की काफी ज्यादा उम्मीदे हैं.
2025 में, कार्बन डाइऑक्साइडकी सघनता 426.8 पार्ट्स प्रति मिलियन रही. जबकि मीथेन की 1,948 पार्ट्स प्रति बिलियन और नाइट्रस ऑक्साइड की मात्रा 339.1 पार्ट्स प्रति बिलियन आंकी गई. 1960 के वर्षों की तुलना में, वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में बढ़ोत्तरी की दर तीन गुना हो गई है.
गर्म होती पृथ्वी (Image AI)
कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा कैसे बढ़ रही है?
इंसान, जानवरी जब सांस लेते हैं तो ऑक्सीजन गैस ग्रहण करते हैं और छोड़ते समय कार्बन डाइऑक्साइड गैस छोड़ते हैं. बाहर निकलने वाली कार्बन डाऑक्साइड को जंगल, पेड़-पौधे और महासागर सोख लेते हैं. यही प्रकृति का संतुलन है. लेकिन मानव ने यह संतुलन बिगाड़ दिया है. क्योंकि बिजली बनाने और कारखानों में कोयला, तेल और प्राकृतिक गैस जलाने से सबसे अधिक कार्बन डाइऑक्साइड निकलती है. इसके अलावा सड़कों पर चलती गाड़ियो के धुंए से भी भारी मात्रा में यह गैस उत्सर्जित होती है. सीमेंट उत्पादन जैसी औद्योगिक प्रक्रियाओं में भी बड़े पैमाने पर CO₂ निकलती है. इन्हीं गतिविधियों ने वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा को बहुत ज्यादा बढ़ा दिया है. WMO की रिपोर्ट बताती है कि हर साल उत्सर्जित कार्बन डाइऑक्साइड का लगभग आधा हिस्सा वायुमंडल में रह जाता है, जबकि बाक़ी को जंगल, पेड़-पौधे और महासागर सोख लेते हैं.
अमेरिका के राष्ट्रीय महासागरीय एवं वायुमंडलीय प्रशासन (NOAA) के अनुसार, 1990 से 2025 के बीच ग्रीनहाउस गैसों का पृथ्वी को गर्म करने वाला प्रभाव 56 प्रतिशत बढ़ा. इस बढ़ोत्तरी में लगभग 81 प्रतिशत योगदान कार्बन डाइऑक्साइड का था. वैज्ञानिक इसे ‘रेडियोएक्टिव फोरसिंग’ कहते हैं, जो पृथ्वी को गर्म करने में ग्रीनहाउस गैसों के प्रभाव को दिखाता है.
कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ने से क्या होगा?
कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) धरती को गर्म करती है क्योंकि यह धरती से निकलने वाली गर्मी, खासकर इन्फ्रारेड विकिरण, को अवशोषित करके उसका कुछ हिस्सा वापस धरती की ओर भेज देती है. इसे ग्रीनहाउस प्रभाव कहते हैं. दरअसल CO₂ को धरती के चारों ओर लिपटा एक पतला कंबल समझ सकते हैं. यह सूरज की रोशनी को आने से नहीं रोकता, लेकिन रात में धरती से निकलने वाली गर्मी को पूरी तरह वायुमंडल से बाहर निकलने नहीं देता. धरती पर जीवन के लिए थोड़ा ग्रीनहाउस इफेक्ट जरूरी है. क्योंकि इसके बिना धरती जीवन के लिए बहुत ठंडी हो जाती. लेकिन CO₂ बढ़ने पर यही “कंबल” मोटा हो जाता है और अधिक गर्मी फंसती है. पृथ्वी के महासागरों का तापमान बढ़ रहा है और ऐसे में काबर्न डाइऑक्साइड जैसी ग्रीन हाउस गैसों के बढ़ने से खतरा और बढ़ जाता है. मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड भी ऐसी ही ग्रीन हाउस गैसे हैं.
WMO की वरिष्ठ वैज्ञानिक अधिकारी ओक्साना तारासोवा के अनुसार, 2023 से 2024 के बीच CO2 की मात्रा रिकॉर्ड 3.5 ppm बढ़ी. इस दौरान शक्तिशाली मौसमी प्रभावों ‘अल नीन्यो’ के कारण सूखा और जंगलों में आग की घटनाएं भी बढ़ीं. जिससे प्राकृतिक तंत्रों की कार्बन डाइऑक्साइड सोखने की क्षमता कम हो गई. ओक्साना तारासोवा ने आगाह किया कि जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल और शक्तिशाली अल नीन्यो के सम्भावित प्रभाव से 2026 में भी CO2 का स्तर बढ़ने की आशंका है. अल नीन्यो धरती की कार्बन सोखने की क्षमता को और कमज़ोर कर सकता है.