जाति के लिए ‘माउस क्लिक’ या नाम लिखना जरूरी? CJI ने केंद्र से मांगा फैसला
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जनगणना 2027 में जाति का नाम खुद लिखना होगा या माउस क्लिक से विकल्प चुन सकेंगे? सुप्रीम कोर्ट ने इस सवाल पर केंद्र सरकार को विचार करने को कहा है. CJI सूर्यकांत की बेंच ने OBC फेडरेशन ऑफ इंडिया की याचिका का निपटारा करते हुए कहा कि यह नीति से जुड़ा मामला है. याचिका में मांग की गई थी कि डिजिटल जनगणना फॉर्म में मान्यता प्राप्त OBC जातियों की सूची दी जाए. इससे लोगों को नाम टाइप करने के बजाय सही विकल्प चुनने का मौका मिल सकता है. अदालत ने इस मांग को लागू करने का निर्देश नहीं दिया.
CJI सूर्यकांत की बेंच ने जनगणना 2027 में OBC जातियों के लिए ड्रॉपडाउन मेन्यू की मांग पर याचिका का निपटारा किया. (फाइल फोटो)
जनगणना 2027 में अपनी जाति बताने के लिए लोगों को नाम लिखना होगा या मोबाइल और कंप्यूटर पर दिए गए विकल्प में से एक पर क्लिक करना होगा? इस सवाल पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को विचार करने को कहा है. चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने साफ किया कि जाति दर्ज करने का तरीका तय करना मूल रूप से नीति से जुड़ा मामला है. कोर्ट ने इस संबंध में केंद्र को कोई खास व्यवस्था लागू करने का निर्देश नहीं दिया है. लेकिन याचिकाकर्ता को अपनी मांग संबंधित सरकारी अधिकारी के सामने रखने की छूट दे दी है. अब इस मुद्दे पर फैसला लेने की जिम्मेदारी संबंधित प्राधिकरण की होगी.
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार दरअसल OBC फेडरेशन ऑफ इंडिय ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी. इसमें मांग की गई थी कि जनगणना 2027 के डिजिटल फॉर्म में मान्यता प्राप्त अन्य पिछड़ा वर्ग यानी OBC जातियों की पहले से तैयार सूची दी जाए. इससे लोगों को अपनी जाति का नाम खुद टाइप करने के बजाय ड्रॉपडाउन मेन्यू से सही विकल्प चुनने का मौका मिल सकेगा. याचिकाकर्ता का तर्क था कि खुले टेक्स्ट फील्ड में अलग-अलग तरीके से जाति लिखे जाने से आंकड़ों में गड़बड़ी हो सकती है. संगठन चाहता था कि केंद्र इस समस्या को पहले ही दूर करे.
जनगणना के फॉर्म में क्या है व्यवस्था?
- याचिका में बताया गया कि 14 अगस्त 2026 को अधिसूचित जनसंख्या गणना के कार्यक्रम के मुताबिक कॉलम नंबर 10 में जाति से जुड़ी जानकारी दर्ज होनी है. याचिकाकर्ता के अनुसार अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए अधिसूचित विकल्पों की व्यवस्था है. वहीं इनके अलावा दूसरी जातियों के लिए खुला टेक्स्ट फील्ड दिया गया है. ऐसे में व्यक्ति को अपनी जाति का नाम खुद लिखना होगा.
- OBC फेडरेशन का कहना था कि 2011 की सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना में भी जातियों के आंकड़े जुटाने से जुड़ी समस्याएं सामने आई थीं. संगठन के मुताबिक पहले से मान्यता प्राप्त जातियों की सूची देने से आंकड़ों को व्यवस्थित करने में मदद मिलेगी. याचिका में संविधान के अनुच्छेद 342A का भी हवाला दिया गया. यह सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों से जुड़ा प्रावधान है.
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
- चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान कहा कि याचिकाकर्ताओं के मुताबिक इस मामले को केंद्र सरकार के स्तर पर देखा जाना चाहिए. केंद्र का प्रतिनिधित्व करने वाले पक्ष को भी इस मुद्दे पर विचार करने को कहा गया. हालांकि जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने टिप्पणी की कि जनगणना किस तरीके से कराई जाए यह जनगणना प्राधिकरण का नीतिगत फैसला है.
- अदालत ने अंत में कहा कि यह मामला मुख्य रूप से नीति से जुड़ा है और संबंधित अधिकारी इस पर फैसला कर सकते हैं. कोर्ट ने याचिका का निपटारा कर दिया. साथ ही याचिकाकर्ता संगठन को अपनी याचिका की प्रति के साथ भारत के रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त के पास जाने की अनुमति दी. अदालत ने मामले के गुण-दोष पर कोई राय नहीं दी.
अब केंद्र के फैसले पर नजर
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि जनगणना में OBC जातियों के लिए ड्रॉपडाउन मेन्यू लागू हो गया है. फिलहाल सरकार के संबंधित अधिकारी इस मांग पर विचार कर सकते हैं. आगे यह तय होना बाकी है कि डिजिटल फॉर्म में जातियों की सूची दी जाएगी या लोगों को अपनी जाति का नाम खुद दर्ज करना होगा.