जम्मू-कश्मीर में उमर अब्दुल्ला सरकार ने मंगलवार को अपने मंत्रिमंडल में बड़ा फेरबदल किया है. हालांकि इस कैबिनेट फेरबदल को लेकर विवाद गर्माता दिख रहा है. दरअसल इस फेरबदल के बाद उमर अब्दुल्ला सरकार में अब जम्मू का प्रतिनिधित्व पूरी तरह खत्म हो गया है. वहीं सरकार में हिंदू मंत्रियों की संख्या भी घटकर एक रह गई है. बीजेपी ने इसे नेशनल कॉन्फ्रेंस की कश्मीर-केंद्रित राजनीति का उदाहरण बताया है.
राज्य के इतिहास में वर्ष 1953 के बाद पहली बार ऐसा हुआ है कि जम्मू संभाग के 10 में से 8 जिलों का कोई भी मंत्री नहीं है. जम्मू इस राज्य की शीतकालीन राजधानी है. वहीं ग्रीष्मकालीन राजधानी श्रीनगर से दो मंत्री शामिल किए गए हैं. ऐसे में इस पूरे इलाके को मंत्रिमंडल से बाहर रखने को लेकर सवाल उठने लगे हैं. आलोचकों का कहना है कि मंत्रिमंडल में क्षेत्रीय और धार्मिक संतुलन बनाए रखने के लिए दूसरे नेताओं को मौका दिया जा सकता था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ.
इससे पहले उमर अब्दुल्ला कैबिनेट में दो हिंदू मंत्री थे. एक जम्मू के छंब से निर्दलीय विधायक सतीश शर्मा और राजौरी-नौशेरा से उपमुख्यमंत्री सुरिंदर चौधरी. हालांकि कैबिनेट फेरबदल में सतीश शर्मा को हटाए जाने के बाद अब उपमुख्यमंत्री सुरिंदर चौधरी ही मंत्रिमंडल में एकमात्र हिंदू चेहरा रह गए हैं. वैसे अगर मुख्यमंत्री चाहते, तो उनके पास क्षेत्रीय और धार्मिक, दोनों तरह का संतुलन बनाए रखने के साफ विकल्प थे.
इन तीन नामों पर चर्चा
मंत्रिमंडल में जगह दिए जाने के संभावित विकल्पों के तौर पर तीन नेताओं के नाम सामने रखे जा रहे हैं.
प्यारे लाल शर्मा: किश्तवाड़ जिले की इंदरवाल सीट से जुड़े वरिष्ठ नेशनल कॉन्फ्रेंस नेता प्यारे लाल शर्मा को शामिल करने से चिनाब घाटी को प्रतिनिधित्व मिल सकता था. उनके समर्थक उन्हें इस क्षेत्र के लिए एक अहम राजनीतिक चेहरा मानते हैं.
रामेश्वर सिंह: कठुआ जिले की बनी विधानसभा सीट से निर्दलीय विधायक रामेश्वर सिंह को मंत्रिमंडल में जगह देने से कठुआ जिले का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो सकता था. आलोचकों के मुताबिक, इससे जम्मू संभाग के पहाड़ी इलाकों को भी राजनीतिक महत्व मिलता.
अर्जुन सिंह राजू: रामबन से नेशनल कॉन्फ्रेंस के विधायक अर्जुन सिंह राजू का नाम भी चर्चा में है. उन्हें मंत्री बनाए जाने से रामबन जिले के साथ व्यापक चिनाब घाटी को प्रतिनिधित्व देने का संदेश जा सकता था. उनके समर्थकों का तर्क है कि कठिन मानी जाने वाली सीट से जीत हासिल करने वाले पार्टी विधायक को सरकार में मौका मिलना चाहिए था.
इन नेताओं को मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिलने के बाद सवाल उठ रहा है कि क्या सरकार ने क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व की जरूरत को पर्याप्त महत्व दिया.
जम्मू शहर को प्रतिनिधित्व नहीं मिलने पर नाराजगी
जम्मू जिले से किसी मंत्री का नहीं होना इस विवाद का सबसे प्रमुख पहलू बन गया है. जम्मू जिले में विधानसभा की 11 सीटें हैं, जो जम्मू-कश्मीर के किसी भी जिले में सबसे अधिक हैं. इसके बावजूद जिले से मंत्रिमंडल में कोई प्रतिनिधि नहीं है.
इसके उलट, श्रीनगर जिले से दो मंत्री बनाए गए हैं. आलोचकों का कहना है कि जम्मू और श्रीनगर दोनों क्षेत्रीय राजनीति के प्रमुख केंद्र रहे हैं और इनके बीच प्रतिनिधित्व का संतुलन लंबे समय से राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण रहा है.
जम्मू विश्वविद्यालय के एक सेवानिवृत्त प्रोफेसर के हवाले से कहा गया है कि यह मुद्दा किसी एक विधायक तक सीमित नहीं, बल्कि डोगरा समुदाय की भावनाओं से भी जुड़ा है. उनका सवाल है कि जब जम्मू जिले से 11 विधायक हैं, तो जिले को मंत्रिमंडल में पूरी तरह प्रतिनिधित्व से बाहर कैसे रखा जा सकता है?
क्या इतिहास में पहली बार हुआ ऐसा?
1953 के बाद यह पहला मौका है जब जम्मू संभाग के आठ जिलों को मंत्रिमंडल में कोई जगह नहीं मिली है और जम्मू जिले से कोई मंत्री नहीं है. इस दावे के साथ जम्मू-कश्मीर की पिछली सरकारों का उदाहरण दिया जा रहा है.
1953 से 1975 के बीच बख्शी गुलाम मोहम्मद, जीएम सादिक और मीर कासिम के दौर में जम्मू क्षेत्र के नेताओं को मंत्रिमंडल में जगह दी गई थी. वहीं शेख अब्दुल्ला के 1975 से 1982 के कार्यकाल में भी जम्मू के नेताओं को बराबर प्रतिनिधित्व मिला.
फारूक अब्दुल्ला के कार्यकाल में जम्मू जिले से कई नेताओं को मंत्री बनाया गया. वहीं 2002 से 2008 के बीच मुफ्ती मोहम्मद सईद और गुलाम नबी आजाद की सरकारों में भी जम्मू क्षेत्र के नेताओं की मौजूदगी रही. 2009 से 2014 के बीच उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली सरकार में जम्मू जिले से शाम लाल शर्मा, रमन भल्ला, तारा चंद और अजय सधोत्रा जैसे नेताओं को मंत्रिमंडल में जगह मिली थी.
2015 से 2018 की पीडीपी-बीजेपी सरकार में भी जम्मू क्षेत्र के कई नेता मंत्री बने. वहीं, अक्टूबर 2024 में उमर अब्दुल्ला के पहले मंत्रिमंडल में सतीश शर्मा शामिल थे, जिन्हें जम्मू के प्रतिनिधित्व के लिहाज से महत्वपूर्ण माना गया.
बीजेपी ने नेशनल कॉन्फ्रेंस को घेरा
मंत्रिमंडल में क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व को लेकर विपक्ष ने भी सवाल उठाए हैं. विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष सुनील शर्मा ने इस कैबिनेट फेरबदल को नेशनल कॉन्फ्रेंस की कश्मीर-केंद्रित राजनीति से जोड़ते हुए आरोप लगाया कि पार्टी जम्मू की चिंताओं को पर्याप्त महत्व नहीं देती.
विवाद केवल विपक्ष तक सीमित नहीं बताया जा रहा. रिपोर्ट के मुताबिक, पीर पंजाल क्षेत्र के कुछ नेशनल कॉन्फ्रेंस विधायकों में भी असंतोष है और उपमुख्यमंत्री सुरिंदर चौधरी को हटाने की मांग उठने की बात कही जा रही है. वहीं, कश्मीर के वरिष्ठ नेताओं मुबारक गुल, नजीर गुरेजी और अब्दुल मजीद लारमी को मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिलने से नाराज बताया गया है.