मिर्जापुर का वो चमत्कारी मंदिर, जहां की शक्तियों को देख कांपने लगा था औरंगजेब
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राजाराम गोश्वामी ने बताया कि औरंगजेब चुनार किले में स्थित राजा भर्तहरि के समाधि स्थल को तोड़ने के लिए आया हुआ था. यहां पर आने के बाद उनके समाधि स्थल पर बने मंदिर को तोड़ दिया. जब सामाधि स्थल को तोड़ने के लिए आया तो कहा कि अगर आपके अंदर शक्तियां है तो महसूस कराओ.
मिर्जापुर: उत्तर प्रदेश का मिर्जापुर जिला आध्यात्मिक नजरिए से बेहद ही अतिदिव्य रहा है. यहां पर कई ऐसे धार्मिक स्थल रहे हैं, जिनकी पौराणिक मान्यताएं हैं. वहीं इनकी ऐतिहासिक घटनाक्रमों को खुद में समेटे हुए भी है. मिर्जापुर के चुनार किले के बारे में तो सभी जानते होंगे, लेकिन चुनार के किले में मौजूद राजा भर्तहरि का समाधि स्थल भी है. समाधि स्थल को लेकर भी कई मान्यताएं हैं.
ऐसी मान्यता है कि यहां पर शांति और सुकून को देखकर राजा भर्तहरि के द्वारा तपस्या किया गया था. उनके तपोस्थली को जब तोड़ने के लिए औरंगजेब आया था, तो यहां की शक्तियों को देखकर माफीनामा देकर वापस चला गया और यहां की व्यवस्थाओं को लेकर कोष से धनराशि देने का भी ऐलान किया था.
आध्यात्म के मार्ग पर निकल गए राजा भर्तहरि
मंदिर के पुजारी राजाराम गोश्वामी ने बताया कि उज्जैन के राजा विक्रमादित्य के बड़े भाई राजा भर्तहरि अपना साम्राज्य छोड़कर गुरु गोरखनाथ के मार्गों पर चलते हुए राज्य छोड़कर आध्यात्म के मार्ग पर निकल गए. सिद्धि को लेकर राजा भर्तहरि चुनार के किले के पास आए. यहां पर गंगा नदी उत्तरवाहिनी हो जाती है. शांति-सुकून और प्राचीनता को देखकर राजा भर्तहरि ने तपोस्थली बनाया और साधना शुरू की.
उनको खोजते हुए भाई राजा विक्रमादित्य भी आए हुए थे. उन्होंने समझाने का प्रयास किया, लेकिन राजा भर्तहरि वापस नहीं गए, जिसके बाद राजा विक्रमादित्य ने ही यहां किले का बाउंड्रीवाल कराया. बताते हैं कि 1660 ईस्वी के बाद औरंगजेब पूर्वांचल में आया हुआ था, जिसके बाद करीब 10 से ज्यादा वर्षों तक पूर्वांचल के कई धार्मिक स्थलों को तोड़ दिया.
तोड़ने आया था औरंगजेब
राजाराम गोश्वामी ने बताया कि औरंगजेब चुनार किले में स्थित राजा भर्तहरि के समाधि स्थल को तोड़ने के लिए आया हुआ था. यहां पर आने के बाद उनके समाधि स्थल पर बने मंदिर को तोड़ दिया. जब सामाधि स्थल को तोड़ने के लिए आया तो कहा कि अगर आपके अंदर शक्तियां हैं, तो महसूस कराओ. यह कहकर तोड़फोड़ करने लगा. जैसे ही विग्रह के पास तोड़ने की कोशिश की, तो भौरों ने हमला कर दिया. काले भौरों ने सेना पर आक्रमण कर दिया, जिसके बाद औरंगजेब ने गर्म तेल डलवाया. जितना तेल डाला जाता, उससे ज्यादा भौरे बाहर निकलते थे. भौरों को देखकर औरंगजेब शक्तियों को समझा और मंदिर के ऊपर चार खंभों की मदद से छत बनाकर निकल गया.
पूजन खर्च उठाने का किया वादा
राजराम गोश्वामी ने बताया कि यहां पर औरंगजेब के आगमन के बाद उसका माफीनामा भी है. उसने फारसी में माफीनामा लिखा और देकर वापस चला गया. उसने यहां पर पूजन का खर्च उठाने का वादा किया था. आज भी ऐतिहासिक साक्ष्य के तौर पर प्रमाण मौजूद है. आज भी राजा भर्तहरि के समाधि स्थल पर दर्शन व पूजन के लिए लोग पहुंचते हैं. मनोकामना पूर्ण होने पर घंटा चढ़ाते हैं. आज भी पूजन और अर्चन के लिए एक हजार से ज्यादा लोग पहुंचते हैं.
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