जिनपिंग के दरबार में किम जोंग! ट्रंप के साथ मुलाकात से पहले ये दौरा क्यों?
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नॉर्थ कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन एक बार फिर चीन पहुंच गए. उनका ये दौरा ट्रंप के साथ मुलाकात से पहले रणनीतिक संतुलन साधने की कोशिश बताया जा रहा है. दरअसल डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में कहा था कि वह चीन के शेन्जेन में होने वाले APEC सम्मेलन के दौरान किम जोंग उन से मुलाकात कर सकते हैं.
उत्तर कोरिया के सुप्रीम लीडर किम जोंग उन.
नॉर्थ कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन अपनी ट्रंप से संभावित मुलाकात से पहले चीन पहुंचे हैं. हाल ही में उन्होंने सीमावर्ती शहर डांडोंग का दौरा किया. यह सितंबर 2025 के बाद उनकी दूसरी यात्रा है. दरअसल डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में ये संभावना जताई थी कि चीन के शेन्जेन में होने वाले APEC सम्मेलन में वह किम जोंग से मुलाकात कर सकते हैं. ऐसे में माना जा रहा है कि इस मुलाकात से पहले ही किम जोंग जिनपिंग के साथ रणनीति पर तालमेल बैठाने के लिए पहुंचे हैं.
खास बात ये है कि किम ने चीन के इस दौरे के इस बार यालू नदी पर बने पुल का सहारा लिया. यह दोनों देशों के बीच बना एक प्रमुख पुल है, जिसे कछ समय पहले ही शुरू किया गया है. चीन की समाचार एजेंसी शिन्हुआ के मुताबिक किम के साथ इस दौरान जिनपिंग के नजदीकी अधिकारी वांग हुनिंग रहे. किम ने इस दौरान कोरियाई युद्ध में लड़ने वाले चीनी सैनिकों को श्रद्धांजिल दी. दोनों नेता डांडोंग में एक ऑटोमोबाइल फैक्ट्री में भी गए. इससे पहले किम सितंबर 2025 में चीन की एक बड़ी सैन्य परेड में शामिल होने बीजिंग गए थे. जिनपिंग हाल ही में जून में उत्तर कोरिया पहुंचे थे.
ट्रंप के साथ किम जोंग उन की मुलाकात की संभावना है. अभी इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है. हालांकि ऐसा माना जा रहा है कि किम इस मुलाकात से पहले जिनपिंग के साथ तालमेल बैठाना चाह रहे हैं. बिजनेस स्टैंडर्ड में क्राइसिस ग्रुप के वरिष्ठ सलाहकार क्रिस्टोफर ग्रीन के हवाले से ये संभावना जताई गई है. हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि दोनेां के पास बातचीत के लिए कई दूसरे मुद्दे भी हो सकते हैं. दरअसल अमेरिका और उत्तर कोरिया के रिश्तों के बीच लंबे समय से खटास रही है. खासतौर से परमाणु हथियार, मिसाइल परीक्षणों और आर्थिक प्रतिबंधों को लेकर संबंध तनावपूर्ण रहे हैं. दोनों राष्ट्राध्यक्षों के बीच पहले भी बातचीत हुई है, लेकिन कोई स्थायी समझौता नहीं हो सका.
ट्रंप के साथ एक टेबल पर बैठने से पहले किम जोंग उन को कूटनीतक समर्थक की जरूरत है, जो चीन दे सकता है. इसके अलावा आर्थिक सुरक्षा और रणनीतिक संतुलन के लिए भी उत्तर कोरिया को चीन चाहिए. ऐसा इसलिए क्योंकि अमेरिका खुले तौर पर साउथ कोरिया को सपोर्ट करता है. लिहाजा नॉर्थ कोरिया को भी किसी ऐसे देश की जरूरत है जो अमेरिका से टक्कर लेने की ताकत रखता हो. रूस पहले से ही युद्धरत है और इस समय सिर्फ किम को कूटनीतिक सपोर्ट ही दे सकता है. जिनपिंग कर किम की पीठ पर हाथ रख देते हैं तो रणनीतिक संतुलन के लिहाज से बातचीत अहम हो जाएगी.
चीन और उत्तर कोरिया सिर्फ एक दूसरे के पड़ोसी नहीं है. यह सदियों पुरानी दोस्ती की दास्तान है. 1950 में जब कोरियाई युद्ध शुरू हुआ था तो चीन ने अपनी सेना भेजी थी. 1953 युद्धविराम हुआ लेकिन दोनों कोरियाई देशों के बीच आज तक औपचारिक शांति संधि नहीं हुई है. काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशन के मुताबिक चीन और उत्तर कोरिया की मित्रता तब से ही अटल है. दोनों देश साझा सहयोग के लिए औपचारिक संधियां भी कर चुके हैं. हालांकि दोनों देशों के बीच इन संबंधों के पीछे अपने-अपने हित हैं. खासतौर से कोरिया चीन पर आर्थिक रूप से निर्भर है, मगर वह अपनी विदेश नीति में स्वतंत्रता बनाए रखना चाहता है.
किम जोंग की इस यात्रा का सबसे खास पहलू यादू नहीं है. जो चीन के डांडों शहर को उत्तर कोरिया के सिनुइजू से जोड़ता है. यालू नदी को उत्तर कोरिया में अमनोक नदी भी कहा जाता है. पुल का निर्माण 2014 में पूरा हो गया था, लेकिन सड़क और सीमा शुल्क से जुड़ी सुविधाएं तैयार न होने के कारण इसका इस्तेमाल लंबे समय तक शुरू नहीं हो सका था. तकरीबन तीन किलोमीटर लंबा यह पुल हाल ही में शुरू हुआ था. योनहाप न्यूज एजेंसी के मुताबिक यह पुल दोनों देशों के बीच व्यापारिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए बनाया गया है.
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