अरुणाचल प्रदेश की सियांग नदी पर प्रस्तावित हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट विवाद के केंद्र में है. सरकार इसे चीन के तिब्बत में बनाए जा रहे विशाल बांध के मुकाबले के लिए जरूरी बता रही है, जबकि आदिवासी समुदायों को डर है कि इससे उनके गांव, खेती और जमीन प्रभावित हो जाएगी. अब तक यहां विरोध सिर्फ प्रदर्शन तक सीमित था, लेकिन अब हालात हिंसक हो रहे हैं. खासतौर से पूर्वी सियांग के पासीघाट और आसपास के इलाकों में आगजनी, तोड़फोड़ की घटनपएं सामने आई हैं. इसके बाद केंद्र सरकार ने रैपिड एक्शन फोर्स के तकरीबन 250 जवानों को अरुणाचल प्रदेश में भेजने की तैयारी शुरू कर दी है.
सियांग नदी पर केंद्र सरकार 11 हजार 200 मेगावाट क्षमता का हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट बनाने की तैयारी में है. 23 अक्टूबर को इसके विरोध में ही 12 घंटे बंद का ऐलान किया गया था. इसी दौरान हिंसा शुरू हुई. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक शुक्रवार रात को सबसे पहले पासीघाट में हिंसा शुरू हुई जो शनिवार को भी जारी रहेगा. इस दौरान उपद्रवियों ने नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कॉरपोरेशन यानी NHPC के कार्यालय में भी तोड़फोड़ कर आग लगा दी. इस दौरान पुलिस थाने,पुलिस वाहनों व अन्य सरकारी संपत्तियों को भी नुकसान पहुंचने की सूचना मिली है.
क्या है सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट
सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट SUIMP एक 11200 मेगावाट क्षमता की जल विद्युत परियोजना है. इसका उद्देश्य बिजली उत्पादन के साथ पानी भंडारण और बाढ़ के प्रभाव को कम करने की संभावना पर काम करना है. यह कोई नया विचार नहीं है.
केंद्र सरकार ने सियांग नदी की जलविद्युत क्षमता का इस्तेमाल करने की दिशा में वर्षों पहले प्रयास शुरू किए थे. वर्ष 2008 में जब पहली बार प्रस्ताव दिया गया तो यहां स्टेज-I के तहत 6,000 मेगावाट और स्टेज-II के तहत 3,750 मेगावाट की परियोजना का प्रस्ताव दिया गया था. बाद में इसे बिजली उत्पादन के साथ जल भंडारण और बाढ़ नियंत्रण की संभावनाओं वाली एक बड़ी परियोजना के रूप में विकसित किया गया.
सियांग प्रोजेक्ट कैसे होगा चीन का जवाब?
सियांग नदी पर सरकार की ओर से जो प्रोजेक्ट प्रस्तावित किया गया है वह भारत के जल सुरक्षा और सामरिक हितों से जुड़ा है. दरअसल चीन तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो नदी के निचले हिस्से में एक हाइड्रोपावर कॉम्प्लेक्स बना रहा है. जुलाई 2025 में चीन यहां काम शुरू कर चुका है. यही नदी अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करने के बाद सियांग कहलाती है और आगे असम में नदियों के साथ मिलकर ब्रह्मपुत्र बन जाती है.
चीन के इस बांध के बन जाने से चीन नदी के पानी के प्रवाह को कंट्रोल कर सकेगा. ऐसे में अगर कभी चीन ने अचानक पानी छोड़ा तो उसका असर निचले इलाकों यानी अरुणाचल और असम पर पड़ेगा. सरकार का मानना है कि अगर सियांग प्रोजेक्ट पूरा होता है तो यहां बड़े पैमाने पर पानी जमा किया जा सकेगा. यानी अगर चीन पानी रोकता है तो ज्यादा प्रभाव नहीं होगा और अचानक से छोड़ता है तो इससे होने वाली तबाही को बचाया जा सकेगा.
सर्वे से पहले ही विरोध
सियांग का ये प्रोजेक्ट अभी पूरी तरह शुरुआती चरण में है. अभी इसकी प्री फिजिबलिटी रिपोर्ट तैयार हुई है. यह शुरुआती अध्ययन होता है, जिसके जरिए ये पता लगाया जाता है कि परियोजना कितनी कारगर हो सकती है. इसकी कितनी जरूरत है और इसे कहां बनाया जा सकता है. सरकार भी कह चुकी है कि अभी इसका निर्माण फाइनल नहीं हुआ है, इसके बावजूद सियांग इंडिजिनस फार्मर्स फोरम इसका विरोध कर रहा है.
उनका मानना है कि सर्वे का काम आगे चलकर बांध निर्माण का रास्ता खोल देगा. इसीलिए प्रदर्शनकारी इसका सर्वे रोकने की मांग कर रहे हैं. सबसे पहले इसकी शुरुआत 30 सितंबर तक तब हुई थी जब अपर सियांग जिले में सीएम पहुंचे थे. इस दौरान भी लोगों ने हिसंक प्रदर्शन किए थे. इसके बाद 4 अक्टूबर को दोबारा झड़पें हुईं थीं. अब एक बार फिर 23 अक्टूबर को पासीघाट में आगजनी की घटनाएं हुईं हैं
आदिवासी समुदाय को किस बात का डर?
सियांग नदी के किनारे रहने वाले आदिवासी समुदायों के लिए यह नदी खेती, जीवनशैली और परंपराओं से जुड़ी है. लोगों ये आशंका है कि यहां बांध बनने से सबसे ज्यादा असर उन पर पड़ेगा. लोगों को ये आशंका है कि बांध की जमीन के लिए उन्हें शिफ्ट किए जाने का फरमान सुनाया जा सकता है. खासतौर से बांध के प्रस्तावित स्थान के आसपास जो 27 गांव हैं वहां के लोगों को विस्थापन का सबसे ज्यादा डर सता रहा है.
मानवाधिकार वकील और बांध विरोधी कार्यकर्ता ईबो मिली के हवाले से हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत और चीन के बीच जल बंटवारे के लिए एक संधि होनी चाहिए. सियांग में सिर्फ चीन से पानी नहीं आता है, यहां भारतीय क्षेत्र में मौजूद हिमनदी और झीलें भी इसका प्रमुख स्रोत हैं.