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Jaishakar Visits Temple in Azerbaijan: भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर अजरबैजान के दौरे पर पहुंचे, तो उन्होंने अग्निमंदिर का भी दौरा किया. इस मंदिर का खास नाता भारत से है और अजरबैजान वो देश है, जहां 97 फीसदी मुस्लिम आबादी रहती है. ऐसे में विदेश मंत्री का ये दौरा और मंदिर के दर्शन अपने आपमें महत्वपूर्ण हैं.
एस जयशंकर ने टेंपल ऑफ फायर के किए दर्शन. (एक्स/@DrSJaishankar)
Jaishakar Visits Temple in Azerbaijan: भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर 23 अक्टूबर को अजरबैजान के दौरे पर पहुंचे और यहां उनकी मंदिर यात्रा ने सोशल मीडिया से लेकर मेनस्ट्रीम मीडिया तक का ध्यान खींचा. आठ साल बाद किसी भारतीय विदेश मंत्री की यह पहली स्वतंत्र द्विपक्षीय यात्रा है. दोनों देशों के बीच राजनीतिक, आर्थिक और आपसी संबंधों को मजबूत बनाने पर चर्चा हुई और इसी दौरान जयशंकर पहुंच गए अजरबैजान की राजधानी बाकू में स्थित ऐतिहासिक अतिशगाह फायर टेंपल में.
एस जयशंकर ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर मंदिर की तस्वीर साझा करते हुए इसे भारत और अजरबैजान के बीच पुराने सांस्कृतिक संबंधों का प्रतीक बताया. अजरबैजान को आग की धरती यानी ‘लैंड ऑफ फायर’ कहा जाता है. यहां आग का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व सदियों पुराना है. जयशंकर का यह दौरा दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संबंधों के साथ-साथ साझा ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को भी उजागर करता है.
मंदिर का बैकग्राउंड क्या है?
यह जगह प्राकृतिक गैस के रिसाव पर बनी है, जहां जमीन से निकलने वाली गैस स्वाभाविक रूप से जलती रहती थी. अब्शेरोन क्षेत्र प्राचीन काल से ही आग की भूमि के रूप में जाना जाता था. पांचवीं शताब्दी के स्रोतों में बाकू के पास चट्टानों से निकलती आग का जिक्र मिलता है. सासानी काल में जोरोस्ट्रियन (पारसजी) धर्म के प्रभाव में यहां अग्नि पूजा के स्थल रहे होंगे. 10वीं शताब्दी के अरब भूगोलवेत्ता अल-इस्ताखरी ने बाकू के पास अग्नि-पूजकों का उल्लेख किया है. इस्लामी विजय के बाद कई अग्नि मंदिर खंडहर हो गए, लेकिन प्राकृतिक आग का महत्व बना रहा.
हिंदू-सिख लोगों ने बनवाया मंदिर
- वर्तमान संरचना और निर्माणआज जो पत्थर का परिसर दिखता है, वह मुख्य रूप से 17वीं-18वीं शताब्दी में बना. इसे भारतीय व्यापारियों और तीर्थयात्रियों खासतौर पर भारत-मुल्तान, पंजाब क्षेत्र के हिंदू और सिख ने बनवाया और विकसित किया. ये व्यापारी सिल्क और कैस्पियन सागर के व्यापार मार्गों से बाकू आते थे और प्राकृतिक अग्नि को ज्वाला जी के रूप में पूजते थे.
- परिसर पंचकोणीय है और बीच में एक वेदी बनी हुई है, जिसके चारों ओर भिक्षुओं और तीर्थयात्रियों के लिए कोशिकाएं और एक कारवां सराय जैसी दीवार है. ऊपर हिंदू धर्म का प्रतीक त्रिशूल भी लगा है, दीवारों पर करीब 21 शिलालेख हैं, जिनमें से ज्यादातर संस्कृत और गुरुमुखी लिपि में हैं, जबकि एक फारसी में भी है. ये गणेश, ज्वाला जी और शिव की वंदना करने वाले हैं.
जलती हुई ज्वाला का संबंध
1683 में जर्मन यात्री एंगेलबर्ट कैम्फर ने यहां सात जगहों से जलती आग का वर्णन किया. 18वीं शताब्दी में अंग्रेज व्यापारी जोनास हनवे ने भी भारतीय भक्तों का जिक्र किया था. यह स्थल हिंदू, सिख और कुछ हद तक जोरोस्ट्रियन/पारसी तीर्थयात्रियों का साझा केंद्र था. भारतीय व्यापारी यहां व्यापार के साथ-साथ पूजा-अर्चना करते थे. कुछ स्रोत कहते हैं कि प्राचीन स्थल जोरोस्ट्रियन रहा होगा, लेकिन वर्तमान इमारत और शिलालेख स्पष्ट रूप से हिंदू और सिख प्रभाव दिखाते हैं.