Why Stock Market Crash: कई संकेत बेहतर, फ‍िर कैसे स्वाहा हो गए 10 लाख करोड़, कहीं र‍िकवरी की उम्‍मीद द‍िख रही?

Why Stock Market Crash: कई संकेत बेहतर, फ‍िर कैसे स्वाहा हो गए 10 लाख करोड़, कहीं र‍िकवरी की उम्‍मीद द‍िख रही?


शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2026 को शेयर मार्केट निवेशकों के लिए फ‍िर ब्लैक फ्राइडे साबित हुआ. घरेलू स्तर पर अर्थव्यवस्था के कई संकेत बेहतर होने के बावजूद, सिर्फ एक बाहरी झटके ने पूरे बाजार का खेल बिगाड़ दिया.सुबह मार्केट ग्रीन ओपन हुआ, लगा क‍ि कल के झटके से बाजार उबर जाएगा. लेकिन तभी क्रूड ऑयल की कीमतें अचानक 114 डॉलर प्रति बैरल के खतरनाक स्तर तक पहुंच गईं.सुबह के सत्र में जो बाजार संभलता हुआ दिख रहा था, वह कुछ ही घंटों में ताश के पत्तों की तरह ढह गया. हालांक‍ि, जाते जाते बाजार कुछ संभलता नजर आया.

सेंसेक्स अपने दिन के उच्चतम स्तर से करीब 1200 अंक गोता लगाकर एक समय 72,600 के करीब आ गया, जबकि निफ्टी 50 इंडेक्स 260 से ज्यादा अंक टूटकर 22,450 के अहम साइकोलॉज‍िक लेवल के नीचे जा फिसला. इस भारी बिकवाली के सुनामी में बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) पर लिस्टेड कंपनियों की कुल मार्केट कैप में महज कुछ ही घंटों के भीतर करीब 10 लाख करोड़ की भारी-भरकम कमी आ गई. यानी निवेशकों की गाढ़ी कमाई का एक बड़ा हिस्सा पल भर में स्वाहा हो गया.

1- सबसे बड़ा विलेन

शेयर बाजार के इस भारी क्रैश के पीछे जो सबसे बड़ा और मुख्य कारण रहा, वह है कच्चे तेल की कीमतों में लगी अचानक आग. ब्रेंट क्रूड ऑयल उछलकर 114 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को छू गया. भारत जैसे विकासशील देश के लिए, जो अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का 80 फीसदी से ज्यादा हिस्सा आयात करता है, यह किसी आर्थिक दुःस्वप्न से कम नहीं है.

2-ज‍ियोपोल‍िट‍िक टेंशन और सप्लाई चेन का संकट

कच्चे तेल में इस भयंकर तेजी के पीछे मध्य पूर्व में टेंशन है. सऊदी अरब के आसपास के क्षेत्रों में हालात बेहद तनावपूर्ण हो गए हैं. हूती विद्रोहियों के हमलों के बाद दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादकों में से एक, सऊदी अरब की तेल आपूर्ति को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा हो गई हैं. स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सऊदी अरामको जैसी दिग्गज कंपनी को धहरान स्थित अपने मुख्यालय को खाली कराने का आपातकालीन आदेश तक जारी करना पड़ा.

साथ ही, लाल सागर के प्रवेश द्वार पर स्थित बाब-अल-मंदेब समुद्री जलमार्ग के पास तनाव चरम पर है. यह दुनिया के सबसे व्यस्त और महत्वपूर्ण शिपिंग रूट्स में से एक है. यदि यहां जहाजों की आवाजाही थोड़ी सी भी बाधित होती है, तो वैश्विक स्तर पर तेल और अन्य जरूरी सामानों की सप्लाई चेन बुरी तरह चरमरा सकती है. दूसरी तरफ, अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर संभावित नए हमलों की रिपोर्ट्स ने आग में घी का काम किया है.

3-भारतीय अर्थव्यवस्था पर सीधा प्रहार

तेल महंगा होने का सीधा मतलब है भारत का इंपोर्ट बिल बढ़ना. इससे न सिर्फ चालू खाता घाटा बिगड़ने का खतरा रहता है, बल्कि देश के भीतर महंगाई भी तेजी से सिर उठाती है. ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट बढ़ने से रोजमर्रा की चीजों से लेकर कंपनियों के कच्चे माल तक, सब कुछ महंगा हो जाता है. इसका सीधा असर कंपनियों के मुनाफे पर पड़ता है, जिससे घबराकर निवेशक अपने शेयर बेचने लगते हैं.

4-विदेशी निवेशकों (FIIs) की लगातार बिकवाली

विदेशी संस्थागत निवेशक FIIs भारतीय बाजार की दिशा तय करने में एक अहम भूमिका निभाते हैं, और फिलहाल उनका रुख बाजार के लिए नकारात्मक बना हुआ है. गुरुवार को ही विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार से करीब 3,459 करोड़ के शेयर बेच डाले. यह बिकवाली तब और हैरान करने वाली थी, जब ठीक एक दिन पहले बुधवार को उन्होंने 1,407 करोड़ की खरीदारी कर बाजार को कुछ उम्मीद दी थी.

आंकड़ों पर नजर डालें तो अक्टूबर महीने के 14 कारोबारी सत्रों में से 11 सत्रों में विदेशी निवेशक नेट सेलर्स रहे हैं. जब विदेशी निवेशक लगातार अपना पैसा निकालते हैं, तो बाजार में शेयरों की सप्लाई अचानक बढ़ जाती है, जिससे कीमतों पर भारी दबाव पड़ता है. कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और वैश्विक अनिश्चितता के बीच, विदेशी निवेशकों का यह फ्लाइट टू सेफ्टी यानी सुरक्षित निवेश की ओर भागना घरेलू निवेशकों के आत्मविश्वास को भी चकनाचूर कर रहा है.

5-मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में बुलबुला फटने का डर

शुक्रवार की गिरावट की सबसे खास बात यह रही कि लार्जकैप की तुलना में छोटी और मझोली कंपनियों के शेयरों में कहीं ज्यादा कत्लेआम देखने को मिला. निफ्टी स्मॉलकैप 100 इंडेक्स करीब 4 फीसदी और निफ्टी मिडकैप 100 इंडेक्स करीब 3 फीसदी तक क्रैश हो गया. एनएसई (NSE) पर कुल 3,081 शेयरों में गिरावट दर्ज की गई, जबकि मुश्किल से 297 शेयर ही हरे निशान में बंद हो सके.

6-वैल्यूएशन और फंडामेंटल्स का अंतर

जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के मुख्य निवेश रणनीतिकार वीके विजयकुमार के अनुसार, पिछले कुछ समय से मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में एकतरफा तेजी देखी जा रही थी. कई कंपनियों के शेयरों की कीमतें उनकी असल कमाई, ग्रोथ और फंडामेंटल्स से कहीं ज्यादा आगे निकल गई थीं. ऐसे ओवरवैल्यूड (Overvalued) शेयरों में हमेशा एक बड़े करेक्शन का खतरा बना रहता है. जब बाजार में थोड़ा भी पैनिक आता है, तो निवेशक सबसे पहले इन्हीं शेयरों से अपना पैसा निकालकर भागते हैं. यही वजह है कि स्मॉलकैप में बिकवाली सबसे ज्यादा हावी रही.

सेक्टोरल इंडेक्स की बात करें तो मेटल, रियल्टी और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स में 3% से ज्यादा की गिरावट आई. दिग्गज कंपनियों में टाटा स्टील, अडानी पोर्ट्स, बीईएल (BEL), टाइटन, एनटीपीसी, इंडिगो, बजाज फिनसर्व, ट्रेंट, एचयूएल, एसबीआई, मारुति सुजुकी और महिंद्रा एंड महिंद्रा (M&M) के शेयरों में 2 से 4 फीसदी तक का भारी नुकसान दर्ज किया गया.

7-अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरें ऊंची रखने की आशंका

कच्चे तेल की आग सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि अमेरिका को भी झुलसा रही है. तेल महंगा होने से अमेरिका में भी महंगाई फिर से बढ़ने का डर पैदा हो गया है. इस डर का सीधा असर अमेरिकी सेंट्रल बैंक, फेडरल रिजर्व (US Fed) की मौद्रिक नीति पर पड़ता है. बाजार अब इस बात को लेकर आशंकित है कि महंगाई को काबू में रखने के लिए फेडरल रिजर्व ब्याज दरों को लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनाए रख सकता है.

निवेशकों की नजरें अब 27-28 अक्टूबर को होने वाली फेड की बैठक और अगले हफ्ते जारी होने वाले पर्सनल कंजम्पशन एक्सपेंडिचर (PCE) महंगाई के आंकड़ों पर टिकी हैं. पीसीई अमेरिका में महंगाई मापने का फेड का सबसे पसंदीदा पैमाना है. भले ही अगली बैठक में ब्याज दरें स्थिर रहने का अनुमान है, लेकिन अब दिसंबर में दरें बढ़ने की संभावना 80 फीसदी तक आंकी जा रही है.

जब अमेरिका में ब्याज दरें ऊंची रहती हैं, तो विदेशी निवेशक उभरते बाजारों (जैसे भारत) से अपना जोखिम भरा निवेश निकालकर अमेरिकी बॉन्ड्स जैसे सुरक्षित विकल्पों में पैसा लगाना पसंद करते हैं. इसी चिंता के कारण मेटल और रियल एस्टेट जैसे ब्याज दरों के प्रति संवेदनशील सेक्टर्स में भारी बिकवाली देखी गई.

क्‍या रिकवरी की उम्मीद है?

बाजार में फिलहाल चारों तरफ निराशा का माहौल है, लेकिन कुछ ऐसे फैक्टर्स भी हैं जो निचले स्तरों पर बाजार को सहारा दे सकते हैं. वीके विजयकुमार मानते हैं कि 114 डॉलर का क्रूड ऑयल निश्चित रूप से बाजार के लिए सबसे बड़ा निगेटिव फैक्टर है, लेकिन इसी बीच अमेरिकी 10-वर्षीय बॉन्ड यील्ड का गिरकर 4.96% पर आना और डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये का 94.70 के स्तर पर मजबूती दिखाना, अर्थव्यवस्था के लिए थोड़ी राहत की सांस है.

तकनीकी नजरिए से बात करें तो, निफ्टी के लिए 22,500 का स्तर एक मजबूत सपोर्ट माना जा रहा था, जो अब टूट चुका है. तकनीकी विश्लेषक हेमांग गोर के अनुसार, बाजार में रिकवरी के लिए निफ्टी को हर हाल में पहले 22,800 के स्तर के ऊपर जाकर टिकना होगा. अगर निफ्टी इस स्तर को होल्ड कर लेता है, तो ‘शॉर्ट कवरिंग’ का सहारा मिल सकता है. जिन ट्रेडर्स ने बाजार गिरने की उम्मीद में मंदी की पोजिशन बनाई थी, वे 22,800 के ऊपर बाजार जाने पर अपनी पोजिशन काटने के लिए वापस खरीदारी करेंगे, जिससे निफ्टी को 23,000 तक का उछाल मिल सकता है.



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