क्रांतिकारी पत्रकार से संन्यासी बने स्वामी चिन्मयानंद सरस्वती कौन? ऋषिकेश में जिंदगी ने कैसे लिया यू-टर्न

क्रांतिकारी पत्रकार से संन्यासी बने स्वामी चिन्मयानंद सरस्वती कौन? ऋषिकेश में जिंदगी ने कैसे लिया यू-टर्न


Swami Chinmayanand Saraswati: देश के पीएम नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को नई दिल्ली के भारत मंडपम में चिन्मय अमृत महोत्सव के कार्यक्रम में हिस्सा लिया. उनके संबोधन से ही 3 दिनों के कार्यक्रम की शुरुआत हुई. बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए. उन्होंने स्वामी चिन्मयानंद के बारे में उल्लेख किया. लेकिन ये संत आखिर कौन थे? भारत की आध्यात्मिक परंपरा में ऐसे कई संत हुए, जिन्होंने धर्म और दर्शन को केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे आम आदमी के जीवन से जोड़ने की कोशिश की. स्वामी चिन्मयानंद सरस्वती भी ऐसी ही शख्सियतों में शामिल थे. उनका मानना था कि भगवद्गीता, उपनिषद और वेदांत का ज्ञान केवल संन्यासियों या विद्वानों के लिए नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए है जो जीवन, अपने मन और अपने अस्तित्व को समझना चाहता है.

स्वामी चिन्मयानंद का जन्म एक सामान्य संन्यासी के रूप में नहीं हुआ था. उनका मूल नाम बालकृष्ण मेनन था. उन्होंने अंग्रेजी साहित्य की पढ़ाई की, पत्रकारिता की और युवावस्था में देश के सामाजिक-राजनीतिक सवालों में भी दिलचस्पी ली. लेकिन जीवन के एक मोड़ पर उनकी तलाश बाहरी दुनिया से हटकर आध्यात्मिक ज्ञान की ओर मुड़ गई. आगे चलकर उन्होंने चिन्मय मिशन की स्थापना की, जिसने भारत ही नहीं, विदेशों में भी वेदांत और भगवद्गीता की शिक्षाओं को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. आज उनके इसी विचार और विरासत के 75 साल पूरे होने के अवसर पर चिन्मय अमृत महोत्सव आयोजित किया जा रहा है.

कौन थे स्वामी चिन्मयानंद सरस्वती?
स्वामी चिन्मयानंद सरस्वती 20वीं सदी के प्रमुख भारतीय आध्यात्मिक गुरुओं, वेदांत के शिक्षकों और चिन्मय मिशन के संस्थापक थे. उनका जन्म 8 मई 1916 को केरल के एर्नाकुलम में हुआ था. जन्म के समय उनका नाम बालकृष्ण मेनन रखा गया था. उनकी खासियत यह थी कि वे प्राचीन भारतीय शास्त्रों की व्याख्या ऐसी भाषा और उदाहरणों में करते थे, जिन्हें आधुनिक शिक्षा वाले लोग और आम गृहस्थ भी समझ सकें. वे भगवद्गीता और उपनिषदों के संदेश को रोजमर्रा के जीवन, फैसले लेने की क्षमता, मन के नियंत्रण, कर्तव्य और आत्मबोध से जोड़कर समझाते थे.

उन्होंने अपने जीवन के लगभग चार दशक आध्यात्मिक शिक्षा और सेवा के लिए समर्पित किए. उन्होंने भारत और विदेशों में प्रवचन दिए, आश्रमों और अध्ययन केंद्रों के विकास में योगदान दिया और ऐसी संस्थाओं की नींव रखी, जिनके जरिए वेदांत का अध्ययन आगे बढ़ाया जा सके. उनके अनुयायी उन्हें आदर से पूज्य गुरुदेव कहते हैं. उनका निधन 3 अगस्त 1993 को अमेरिका के सैन डिएगो में हुआ था. उनकी शिक्षाओं और संस्थागत विरासत को चिन्मय मिशन आज भी आगे बढ़ा रहा है.

ऋषिकेश में कैसे बदल गई कहानी
बालकृष्ण मेनन पढ़ने-लिखने में बहुत तेज छात्र थे. वह स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े स्टूडेंट थे. उस समय के संत-महात्माओं और धर्म पर सवाल उठाने वाले प्रखर नास्तिक माने जाते थे. लेकिन जिंदगी में यू-टर्न आया. ऋषिकेश के स्वामी शिवानंद सरस्वती का इंटरव्यू लेने और साधुओं के ढोंग का पर्दाफाश करने के इरादे से वे हिमालय पहुंचे थे. यहां उल्टा हो गया. स्वामी शिवानंद के संपर्क में आते ही उनका जीवन पूरी तरह बदल गया. उन्होंने 1949 में संन्यास लिया और ‘स्वामी चिन्मयानंद सरस्वती’ कहलाए. इसके बाद उन्होंने ऋषिकेश और उत्तरकाशी में स्वामी तपोवन महाराज के सानिध्य में वेदांत और ग्रंथों का गहन अध्ययन किया.

स्वामी चिन्मयानंद ने उस दौर में भारतीय धर्म और दर्शन की रूढ़ियों को तोड़कर नए कीर्तिमान स्थापित किए. उस दौर में संस्कृत और जटिल भाषा तक सीमित ज्ञान को उन्होंने अंग्रेजी भाषा और सरल तर्कों के साथ आम जनता के सामने रखा. उन्होंने कहा कि उपनिषद और गीता केवल जंगलों में रहने वाले संन्यासियों के लिए नहीं, बल्कि गृहस्थों और युवाओं के लिए भी हैं. 31 दिसंबर 1951 को पुणे में उन्होंने अपना पहला ‘ज्ञान यज्ञ’ शुरू किया. इसके तहत उन्होंने गीता और उपनिषदों पर भाषण देने शुरू किए. उसी ज्ञान यज्ञ और चिन्मय आंदोलन की 75वीं सालगिरह के उपलक्ष्य में ‘चिन्मय अमृत महोत्सव’ का आयोजन किया जा रहा है.

ज्ञान यज्ञ में ऐसा क्या खास था?

  • सरल व्याख्या: कठिन दार्शनिक अवधारणाओं को रोजमर्रा के उदाहरणों के जरिए समझाने की कोशिश की जाती थी.
  • सवाल पूछने की गुंजाइश: श्रोताओं को केवल सुनने की बजाय विषय पर विचार करने और अपनी शंकाएं रखने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था.
  • शास्त्रों का व्यावहारिक अर्थ: गीता को केवल धार्मिक ग्रंथ के रूप में नहीं, बल्कि कर्तव्य, मन, निर्णय और आत्मज्ञान पर चिंतन के स्रोत के रूप में भी समझाया जाता था.
  • ज्ञान का प्रसार: प्रवचनों के नोट्स और पुस्तिकाएं तैयार की जाती थीं, ताकि कार्यक्रम समाप्त होने के बाद भी लोग उन शिक्षाओं को पढ़ सकें.

स्वामी चिन्मयानंद के बाद चिन्मय मिशन की कमान किसने संभाली?
किसी भी बड़े आध्यात्मिक आंदोलन की निरंतरता इस बात पर निर्भर करती है कि उसके संस्थापक के बाद उसकी शिक्षाओं और संस्थाओं को कौन आगे बढ़ाता है. स्वामी चिन्मयानंद के मामले में भी यह सवाल महत्वपूर्ण रहा. 3 अगस्त 1993 को अमेरिका के सैन डिएगो में स्वामी चिन्मयानंद का निधन हुआ. इसके बाद 22 अगस्त 1993 को सेंट्रल चिन्मय मिशन ट्रस्ट के न्यासियों ने स्वामी तेजोमयानंद को मिशन का अध्यक्ष और आध्यात्मिक प्रमुख नियुक्त किया. उन्होंने संगठन के विस्तार और संस्थापक की शिक्षाओं को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. जनवरी 2017 में स्वामी स्वरूपानंद को चिन्मय मिशन के वैश्विक प्रमुख की जिम्मेदारी दी गई.



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