Last Updated:
Darma Valley Pithoragarh: भारत-चीन सीमा के निकट 12 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित दारमा घाटी इन दिनों देश भर के पर्यटकों के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र बनी हुई है. पंचाचूली की बर्फ से ढकी चोटियां, महाभारत काल से जुड़ा पौराणिक इतिहास और स्थानीय भोटिया संस्कृति से सजे होमस्टे सैलानियों को खूब लुभा रहे हैं. बेहतर सड़क संपर्क के चलते यहां पर्यटन के साथ-साथ स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी खुले हैं.
Darma Valley Pithoragarh: चीन सीमा के करीब सटी दारमा घाटी बेहद ही खूबसूरत है. सड़क से जुड़ने के बाद दारमा घाटी में सैलानियों का तांता लगा रहता है. इस घाटी के सौंदर्य को चार-चांद लगाती हैं पंचाचूली की चोटियां. इन चोटियों को निहारने के लिए पर्यटक देश भर से यहां पहुंचने लगे हैं. साल दर साल यहां सैलानियों की संख्या में इजाफा हो रहा है. उसी तर्ज पर यहां होम स्टे भी बन रहे हैं. पंचाचूली की चोटियों का ऐतिहासिक महत्व भी है.
12 हजार फीट की ऊंचाई और गांवों का नैसर्गिक सौंदर्य
धारचूला तहसील मुख्यालय से करीब 80 किलोमीटर का सफर तय करके 12 हजार फीट की ऊंचाई पर मौजूद दारमा घाटी पहुंचा जा सकता है. फिलहाल दुग्तू तक सड़क बनी है. इस दौरान करीब 13 गांव आते हैं. इन गांवों पर भी प्रकृति ने अपना खजाना जमकर लुटाया है. दांतू, दुग्तू, बॉलिंग और सिपू जैसे गांव हैं, जहां बीते सालों में जमकर होम स्टे बने हैं. दारमा घाटी में लगातार बढ़ रही सैलानियों की संख्या यहां के लोगों को रोजगार भी मुहैया करा रही है.
भोटिया संस्कृति और धौलीगंगा पर बना बांध
इस घाटी में मुख्य रूप से भोटिया जनजाति के लोग रहते हैं. दारमा घाटी के ठीक नीचे धौलीगंगा नदी बहती है. इसी नदी पर एनएचपीसी का बांध भी बना है. यह बांध भी दारमा का सफर तय करने वाले सैलानियों के लिए आकर्षण का केंद्र है. हिमालय की गोद में बना बांध देखने वालों को अपनी तरफ आकर्षित करता है.
पंचाचूली बेस कैंप का सफर और पर्यटकों का अनुभव
दारमा घाटी की पहचान पंचाचूली की चोटियों को लेकर है. दुग्तू से करीब ढाई किलोमीटर की चढ़ाई चढ़ने के बाद पंचाचूली बेस कैंप पहुंचा जाता है. बेस कैंप से करीब तीन किलोमीटर का पैदल सफर तय करने के बाद पंचाचूली की तलहटी पर पहुंच सकते हैं. इस सफर के नजारे देखने वालों के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं हैं. दिल्ली से आए प्रखर सिंह का कहना है कि उन्होंने सपने में भी कल्पना नहीं की थी कि दुनिया में कोई जगह इतनी खूबसूरत भी हो सकती है.
महाभारत कालीन पौराणिक मान्यता और सामरिक महत्व
पंचाचूली का ऐतिहासिक महत्व भी है. माना जाता है कि पंचाचूली नाम पांच चूल्हों के नाम पर पड़ा है. ऐसी मान्यता है कि महाभारत काल में पांडवों ने स्वर्ग जाने से पहले यहीं रुककर अपना अंतिम भोजन पकाने के लिए पांच चूल्हे बनाए थे. इन्हीं पांच चूल्हों (शिखरों) के कारण इन्हें पंचाचूली कहा गया. चीन सीमा के करीब होने के कारण इस घाटी में भारतीय सुरक्षा बल भी भारी संख्या में मौजूद हैं. सेना और आईटीबीपी यहां साल भर तैनात रहती है.