न्यूजीलैंड में क्यों इस्तेमाल होती है ड्रॉप-इन-पिच, कैसे नर्सरी में तैयार की जाती है 22 गज की ‘बर्फी’, गेंदबाजों के लिए होता है चैलेंज


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न्यूजीलैंड में क्यों इस्तेमाल होती है ड्रॉप-इन-पिच, कैसे होती है तैयार

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ind vs nz drop in pitches: न्यूजीलैंड में इस्तेमाल होने वाली ड्रॉप-इन पिच आखिर बनती कैसे है? जमीन से अलग तैयार की गई इस पिच को मैदान में लाकर फिट कैसे किया जाता है? सबसे बड़ा सवाल यह कि इन पिचों पर तेज गेंदबाजों को स्विंग और सीम मूवमेंट की मदद क्यों मिलती है और पिच की नमी को लंबे समय तक बरकरार कैसे रखा जाता है? इसके पीछे सिर्फ मौसम का नहीं, बल्कि मिट्टी, घास, पानी और आधुनिक तकनीक का भी बड़ा खेल है.

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न्यूजीलैंड में ज्यादातर मैदानों पर ड्रॉप इन पिचों का होता है इस्तेमाल

नई दिल्ली.  न्यूजीलैंड में मैच से पहले क्रेन में फंसी बर्फी की तरफ 22 गज की मिट्टी का पीस को बीच पिच पर मैदान पर फिट होते देखने का अपना एक रोमांच है. क्रिकेट में पिच सिर्फ 22 गज की जमीन नहीं, बल्कि बल्लेबाज और गेंदबाज के बीच होने वाली जंग का सबसे अहम किरदार होती है. कहीं गेंद बल्ले पर इतनी आसानी से आती है कि बल्लेबाज चौकों-छक्कों की बरसात कर देते हैं, तो कहीं गेंद हवा में लहराती है और पिच पर पड़ते ही बल्लेबाज को चकमा दे जाती है.न्यूजीलैंड में क्रिकेट के फॉर्मेट के हिसाब से पिच को तैयार करने के लिए नर्सरी का इस्तेमाल किया जाता है या यूं कहे फैक्ट्री में 22 गज की पिच तैयार की जाती है.सीमिंग विकेट चाहिए या स्पोर्टिंग डिमांड के हिसाब से पिच तैयार की जाती है.

न्यूजीलैंड की परिस्थितियों में तेज गेंदबाजों का खौफ अक्सर इसी वजह से देखने को मिलता है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि न्यूजीलैंड में इस्तेमाल होने वाली ड्रॉप-इन पिच आखिर बनती कैसे है? जमीन से अलग तैयार की गई इस पिच को मैदान में लाकर फिट कैसे किया जाता है? सबसे बड़ा सवाल यह कि इन पिचों पर तेज गेंदबाजों को स्विंग और सीम मूवमेंट की मदद क्यों मिलती है और पिच की नमी को लंबे समय तक बरकरार कैसे रखा जाता है? इसके पीछे सिर्फ मौसम का नहीं, बल्कि मिट्टी, घास, पानी और आधुनिक तकनीक का भी बड़ा खेल है.

क्या होती है ड्रॉप-इन पिच?

न्यूजीलैंड के ज्यादातर मैदान मल्टी स्पोर्ट्स के लिए होते है खास तौर पर रग्बी हर जगह खेला जाता है इसीलिए यहां पर सबसे ज्यादा ड्राप इन पिचों का इस्तेमाल होता है. आमतौर पर क्रिकेट के मैदान में पिच उसी जगह तैयार की जाती है, जहां मैच खेला जाना है. इसके उलट ड्रॉप-इन पिच को मैदान से अलग किसी दूसरी जगह तैयार किया जाता है. जब पिच पूरी तरह तैयार हो जाती है, तो उसे विशेष उपकरणों की मदद से उठाकर स्टेडियम के अंदर निर्धारित जगह पर रख दिया जाता है. इसी प्रक्रिया के कारण इसे ड्रॉप-इन पिच कहा जाता है. ड्रॉप-इन पिच का सबसे बड़ा फायदा यह है कि जिस स्टेडियम में क्रिकेट के अलावा दूसरे खेल या बड़े आयोजन होते हैं, वहां क्रिकेट की पिच को जरूरत के हिसाब से हटाया या लगाया जा सकता है. इससे मैदान का इस्तेमाल सिर्फ क्रिकेट तक सीमित नहीं रहता.

कैसे तैयार की जाती है ड्रॉप-इन पिच?

ड्रॉप-इन पिच बनाने की प्रक्रिया काफी मेहनत और तकनीकी विशेषज्ञता मांगती है. सबसे पहले एक मजबूत आधार तैयार किया जाता है. इसके ऊपर खास तरह की मिट्टी की परतें बिछाई जाती हैं. मिट्टी का चुनाव बेहद अहम होता है, क्योंकि इसी से तय होता है कि गेंद पिच पर पड़ने के बाद कितनी उछाल लेगी, कितनी तेजी से बल्ले तक पहुंचेगी और उसमें कितना सीम मूवमेंट देखने को मिल सकता है. इसके बाद मिट्टी को तय मानकों के अनुसार दबाया जाता है, ताकि पिच को मजबूती मिले. फिर उस पर घास उगाई जाती है और पानी देने, घास काटने, रोलिंग तथा नमी नियंत्रित करने जैसी प्रक्रियाओं से उसे तैयार किया जाता है. इस दौरान पिच क्यूरेटर लगातार उसकी स्थिति पर नजर रखते हैं. पिच तैयार होने के बाद उसे एक विशेष ट्रे या मजबूत आधार सहित उठाया जाता है. क्रेन अथवा अन्य भारी उपकरणों की मदद से उसे स्टेडियम तक पहुंचाकर मैदान में फिट किया जाता है. इसके बाद पिच और मैदान के बीच का स्तर ठीक किया जाता है, ताकि खिलाड़ियों को खेलने के दौरान सतह में असमानता का सामना न करना पड़े. ध्यान देने वाली बात यह है कि ड्रॉप-इन पिच का मतलब सिर्फ मिट्टी की बनी एक पट्टी को उठाकर दूसरी जगह रख देना नहीं है. उसे इस तरह तैयार करना पड़ता है कि उसकी मजबूती, उछाल और खेलने की गुणवत्ता मैच के दौरान बनी रहे.



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