चीन की जीडीपी यानी विकास दर के आंकड़े आए तो कई अर्थशास्त्री चौंक गए. क्योंकि अनुमान था कि इकॉनमी ग्रोथ 4.4 फीसदी से कम रहेगी, जबकि असलितयत में आंकड़े 4.5% फीसदी रहे. भारत ने भी कुछ इसी तरह चौंकाया था. जब अप्रैल से जून 2026 की तिमाही में जीडीपी 7.8% बढ़ने के आंकड़े आए थे. सीधे सीधे देखें तो भारत चीन के मुकाबले 3 फीसदी आगे है. लेकिन इसका मतलब क्या है?
चीन की अर्थव्यवस्था की रफ्तार बढ़ी है. वहां फैक्ट्रियों में ज्यादा सामान बन रहा है और दूसरे देशों में भी इसकी बिक्री हो रही है. पहली नजर में यह चीन के लिए अच्छी खबर है. लेकिन क्या भारतीय कंपनियों को चीन में ज्यादा सामान बेचने का मौका मिलेगा या चीन का सस्ता माल भारत के कारोबारियों की मुश्किल बढ़ा देगा?
चीन की कमाई बढ़ने की वजह क्या है?
- चीन को दुनिया की बड़ी फैक्ट्री कहा जाता है. मोबाइल फोन से लेकर मशीनों, बैटरियों और सोलर पैनल तक, कई तरह के सामान वहां बड़े पैमाने पर बनाए जाते हैं. चीन की कमाई का एक बड़ा हिस्सा दूसरे देशों को सामान बेचने से आता है.
- ताजा आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर में चीन का औद्योगिक उत्पादन पिछले साल के मुकाबले 5.5% बढ़ा. आसान भाषा में कहें तो वहां की फैक्ट्रियों में पहले के मुकाबले ज्यादा सामान बना. लेकिन आम लोगों की खरीदारी में उतनी तेजी नहीं दिखी. सितंबर में चीन की खुदरा बिक्री सिर्फ 1.1% बढ़ी.
- एक और परेशानी है. जनवरी से सितंबर 2026 के बीच चीन में प्रॉपर्टी यानी मकान और जमीन से जुड़े निवेश में 20.6% की गिरावट आई. इससे पता चलता है कि चीन की अर्थव्यवस्था में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है. फैक्ट्रियां अच्छा काम कर रही हैं, लेकिन मकान-जमीन के कारोबार और घरेलू मांग में कमजोरी बनी हुई है.
इसका भारत से क्या लेना-देना?
मान लीजिए, चीन की कंपनियां पहले से ज्यादा सामान बना रही हैं, लेकिन उनके अपने देश में उतने खरीदार नहीं मिल रहे. ऐसे में वे दूसरे देशों में अपना सामान बेचने की कोशिश कर सकती हैं. भारत भी उनके लिए एक बड़ा बाजार है. इससे भारतीय कारोबारियों को फायदा भी हो सकता है और नुकसान भी.
भारत की कंपनियों को कहां मिल सकता है फायदा?
चीन की अर्थव्यवस्था बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि भारत को अपने आप फायदा होने लगेगा. फायदा इस बात पर निर्भर करेगा कि चीन को किस चीज की जरूरत है और भारत की कंपनियां उसे क्या बेच सकती हैं.
1. मशीनों और उनके पुर्जों का कारोबार
भारत की कई कंपनियां मशीनों के पुर्जे और इंजीनियरिंग से जुड़ा सामान बनाती हैं. अगर चीन की फैक्ट्रियों में उत्पादन बढ़ता है और उन्हें ऐसे सामान की जरूरत पड़ती है, तो भारतीय कंपनियों को ऑर्डर मिल सकते हैं.
जून 2026 में भारत से चीन को इंजीनियरिंग सामान का निर्यात सालाना आधार पर 74% बढ़कर करीब 36.15 करोड़ डॉलर पहुंच गया था. यह बताता है कि इस कारोबार में भारतीय कंपनियों के लिए मौके बन सकते हैं.
2. केमिकल बेचने का मौका
भारत चीन को कई तरह के केमिकल भी बेचता है. इनका इस्तेमाल फैक्ट्रियों में अलग-अलग चीजें बनाने के लिए होता है. अगर चीन में उत्पादन बढ़ने के साथ कुछ केमिकल की मांग भी बढ़ती है, तो भारतीय कंपनियों को इसका फायदा मिल सकता है. लेकिन यहां मुकाबला आसान नहीं है. चीन खुद भी केमिकल का बड़ा उत्पादक है. ऐसे में भारतीय कंपनियों को सही कीमत पर अच्छी गुणवत्ता वाला सामान देना होगा.
3. समुद्री और कृषि उत्पाद
भारत चीन को समुद्र से मिलने वाले कुछ उत्पाद, मसाले और दूसरे सामान भी बेचता है. चीन में इनकी मांग बढ़ती है तो भारतीय कारोबारियों को ज्यादा बिक्री का मौका मिल सकता है.
हालांकि, इसके लिए चीन के बाजार में भारतीय सामान की बिक्री की अनुमति, गुणवत्ता से जुड़े नियम और दूसरी कारोबारी शर्तें भी मायने रखती हैं. इसलिए इन क्षेत्रों में फायदा मिलने की संभावना है, लेकिन इसे पक्का नहीं माना जा सकता.
भारत पहले से चीन को कितना सामान बेच रहा है?
भारत के कारोबार के आंकड़ों पर नजर डालें तो तस्वीर कुछ बेहतर दिखाई देती है. वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने चीन को करीब 19.47 अरब डॉलर का सामान बेचा. इससे पिछले वित्त वर्ष में यह आंकड़ा करीब 14.25 अरब डॉलर था. यानी भारत का चीन को निर्यात लगभग 36.6% बढ़ा. इसका मतलब है कि भारतीय कंपनियों की चीन में बिक्री बढ़ सकती है. लेकिन इस बढ़ोतरी का पूरा श्रेय चीन की GDP को नहीं दिया जा सकता. निर्यात बढ़ने के पीछे अलग-अलग उत्पादों की मांग, कीमतें और कारोबार से जुड़े दूसरे कारण भी हो सकते हैं. यानी भारतीय कंपनियों के पास मौका जरूर है, लेकिन उन्हें चीन के बाजार में अपनी जगह बनाने के लिए मेहनत करनी होगी.
चीन का सस्ता सामान भारत के लिए मुसीबत कैसे बन सकता है?
चीन की ताकत सिर्फ इतनी नहीं है कि वहां बड़ी संख्या में फैक्ट्रियां हैं. वहां कई कंपनियां बहुत बड़े पैमाने पर सामान बनाती हैं. जब सामान बड़ी मात्रा में बनता है, तो कई बार उसकी लागत कम हो जाती है. इससे कंपनियों को कम कीमत पर सामान बेचने का मौका मिलता है. यही बात भारत के कारोबारियों के लिए परेशानी बन सकती है. भारतीय कंपनी के सामने अपनी कीमत घटाने, खर्च कम करने या सामान की गुणवत्ता बेहतर बनाने का दबाव आ जाएगा. अगर भारतीय कंपनी अपनी कीमत कम करती है तो उसका मुनाफा घट सकता है. अगर वह कीमत कम नहीं करती तो ग्राहक खोने का खतरा रहता है.
भारत और चीन के कारोबार में सबसे बड़ी परेशानी क्या है?
भारत चीन से जितना सामान खरीदता है, उसके मुकाबले उसे बहुत कम सामान बेच पाता है. वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने चीन से करीब 131.63 अरब डॉलर का सामान खरीदा. इसके मुकाबले भारत ने चीन को करीब 19.47 अरब डॉलर का सामान बेचा. यानी दोनों के बीच सामान खरीदने और बेचने का अंतर करीब 112.16 अरब डॉलर रहा. भारत चीन से इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, केमिकल और प्लास्टिक से जुड़े कई सामान खरीदता है. इनमें से कुछ सामान भारत की अपनी फैक्ट्रियों में भी इस्तेमाल होते हैं. यानी चीन से आने वाला हर सामान भारत के लिए नुकसान नहीं है.
चीन में भारतीय सामान बिकने में क्या परेशानी है?
भारत के लिए सिर्फ सामान बनाना काफी नहीं है. उसे दूसरे देशों में बेचने के लिए बाजार भी चाहिए. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अक्टूबर 2026 में चीन के साथ बढ़ते व्यापार घाटे और भारतीय उत्पादों को वहां बाजार तक पहुंचाने में आने वाली रुकावटों पर चिंता जताई. जेनेरिक दवाओं, मांस और कुछ कृषि उत्पादों जैसे क्षेत्रों में भारतीय कंपनियों के लिए मौके हो सकते हैं, लेकिन इन बाजारों तक पहुंचना आसान नहीं है.
क्या चीन की GDP बढ़ने से भारत को तुरंत फायदा होगा?
जरूरी नहीं. GDP का मतलब है कि किसी देश में एक तय अवधि के दौरान कितनी आर्थिक गतिविधियां हुईं और कितना सामान व सेवाएं तैयार की गईं. GDP बढ़ने से यह पता चलता है कि अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ रहा है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वहां के हर आदमी की कमाई बढ़ गई या हर सामान की मांग भी बढ़ गई. चीन के ताजा आंकड़े भी यही बताते हैं. वहां फैक्ट्रियों में उत्पादन बढ़ा है, लेकिन खुदरा बिक्री की रफ्तार धीमी है और प्रॉपर्टी में निवेश घटा है. इसलिए भारतीय कंपनियों को फायदा तभी मिलेगा, जब चीन में उनके उत्पादों की मांग बढ़ेगी और वे वहां के खरीदारों तक अपना सामान पहुंचा पाएंगी.