Madiya Ragi Farming: छत्तीसगढ के सरगुजा जिले में आज भी किसान पारंपरिक खेती को बढ़ावा देते हैं. दरअसल, हम बात कर रहे हैं मडिया जिसे स्थानीय बोलचाल की भाषा में रागी कहा जाता है. इस फसल कि खासियत ऐसा है कि अगर आप एक बार इसका उपयोग करें तो आपको बीमारियां नहीं होगी. ऐसे में नहीं बल्कि किसान का दावा है. पहले इसकी खेती बड़े पैमाने पर लोग करते थे. लेकिन धीरे-धीरे हाइब्रिड का जमाना आया और लोग इस खेती से दूर भागने लगे. हालांकि, रागी कि खेती में कम लागत तो है ही इसके बदले में आपको मोटी कमाई के साथ आपका शरीर तंदुरुस्त होगा बीमारी दूर हो जायेगा यानी कई फायदे हैं, लेकिन फिर एक बार ललित मांझी अपने पारंपरिक खेती पद्धति कि ओर रुख अख्तियार किया है जिससे उनको फायदा भी होगा देखिए ये रिपोर्ट…
कभी आदिवासियों के भोजन का अहम हिस्सा थी मड़िया
सरगुजा के किसान ललित मांझी ने लोकल 18 को बताया कि मड़िया पहले आदिवासी परिवारों के भोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा हुआ करती थी. उनके परिवार के बुजुर्ग भी इसका सेवन करते थे. उस दौर में लोग अपनी जरूरतों के लिए खेतों में पारंपरिक फसलें उगाते थे और उन्हीं से सालभर के भोजन की व्यवस्था करते थे. मड़िया से रोटी बनाकर खाई जाती थी किसान के मुताबिक, पहले इसे दूसरे पारंपरिक खाद्य पदार्थों के साथ मिलाकर भी खाया जाता था. हालांकि, समय के साथ खानपान में बदलाव आया और इसकी खेती करने वाले किसानों की संख्या कम होने लगी.
चावल मिलने से कम हुई पारंपरिक खेती
ललित मांझी के मुताबिक, पहले परिवारों को अपने भोजन के लिए खेती पर ज्यादा निर्भर रहना पड़ता था लोग मेहनत करके अलग-अलग फसलें उगाते थे अब सार्वजनिक वितरण प्रणाली यानी सोसाइटी से चावल मिलने के कारण कई परिवारों की पारंपरिक अनाज की खेती पर निर्भरता कम हो गई है इसके साथ ही आधुनिक खेती और हाइब्रिड अनाज के प्रति बढ़ते रुझान ने भी मड़िया जैसी पुरानी फसलों को पीछे धकेला है यही वजह है कि कभी ग्रामीण जीवन का हिस्सा रही इस खेती का दायरा अब सिमटता जा रहा है.
20 डिसमिल जमीन पर आज भी उगा रहे मड़िया
जहां कई किसान पारंपरिक फसलों से दूरी बना रहे हैं, वहीं ललित मांझी ने 20 डिसमिल जमीन पर मड़िया की खेती की है. उन्होंने बताया कि खेत तैयार करने के बाद बीजों को बोया जाता है. पौधों के बढ़ने के साथ खेत में जरूरी कृषि कार्य किए जाते हैं और धीरे-धीरे फसल में बालियां आने लगती हैं. फिलहाल, उनके खेत में दाने बनने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. किसान को उम्मीद है कि फसल तैयार होने के बाद इससे अनाज प्राप्त होगा, जिसका इस्तेमाल भोजन बनाने में किया जा सकेगा.
मड़िया के मोटे दाने से बनती है रोटी
ललित मांझी बताते हैं कि मड़िया के दाने आकार में मोटे होते हैं..इन्हें पीसकर आटा तैयार किया जाता है, जिससे रोटी बनाई जाती है. उनके अनुसार, इसका स्वाद भले ही आज प्रचलित चावल या दूसरे अनाज से अलग हो, लेकिन उनके परिवार के बुजुर्ग इसे शरीर को ताकत देने वाला भोजन मानते थे. किसान का कहना है कि पारंपरिक खान पान में इस तरह के अनाज का अपना अलग महत्व रहा है. हालांकि, मड़िया खाने से बीमारियां नहीं होतीं या किसी बीमारी का इलाज हो जाता है. ऐसे दावों की पुष्टि के लिए वैज्ञानिक प्रमाण जरूरी हैं.
पारंपरिक पेय हड़िया बनाने में भी होता है इस्तेमाल
मड़िया का उपयोग केवल भोजन तक सीमित नहीं है, ललित मांझी के मुताबिक, उनके क्षेत्र में इसका इस्तेमाल पारंपरिक पेय हड़िया बनाने में भी किया जाता है. इस तरह यह अनाज आदिवासी समाज की खानपान संबंधी परंपराओं से भी जुड़ा हुआ है. पीढ़ियों से चली आ रही इन परंपराओं में स्थानीय अनाज और उनसे बनने वाले खाद्य पदार्थों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है.
कम लागत में खेती, लेकिन किसानों को जागरूक करना जरूरी
ललित मांझी के अनुसार, मड़िया की खेती में लागत कम आती है. हालांकि, वास्तविक लागत और मुनाफा जमीन, बीज, श्रम तथा खेती के तरीकों के आधार पर अलग-अलग हो सकता है. पारंपरिक फसलों को बढ़ावा देने के लिए किसानों को इनके उत्पादन, बाजार और उचित कीमत की जानकारी देना जरूरी है. अगर स्थानीय अनाज की मांग बढ़े और किसानों को अच्छी कीमत मिले, तो ऐसी फसलों की खेती को प्रोत्साहन मिल सकता है.
परंपरा को बचाने की कोशिश कर रहे हैं ललित मांझी
ललित मांझी आज भी मड़िया की खेती करके अपनी पारंपरिक कृषि विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं. उनका मानना है कि जिस अनाज को उनके पूर्वज उगाते और खाते थे. उसे पूरी तरह छोड़ देना ठीक नहीं है. मड़िया जैसी पारंपरिक फसलों को संरक्षित करना स्थानीय कृषि विविधता और खानपान की परंपराओं को बचाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है. जरूरत है कि किसानों को प्रोत्साहन मिले और नई पीढ़ी भी अपने पारंपरिक अनाज की खेती तथा उपयोग के बारे में जानें.