Desi Jalebi Clay Stove Business: छत्तीसगढ के सरगुजा जिले के आमगांव की रहने वाली सबंदों बाई जिनकी उम्र 60 साल है, लेकिन हौसला इतना बुलंद की ढलती उम्र में भी मेहनत करना नहीं छोड़ा. अपने हाथों का जादू दिखा रही है और स्वादिष्ट जलेबी बनाकर अपनी आजीविका चला रही है. दरअसल, बूढ़ी अम्मा की कहानी भावुक और दिलचप्स है, पहले जब बूढ़ी अम्मा मजदुरी करती थीं, तब उन्हें कभी-कभी दो वक्त की रोटी तक नहीं मिलता था. इसके बावजूद मेहनत करती थीं कि समय का चक्र एक न एक दिन चेहरे में खुशी लाएगा और आज बूढ़ी अम्मा अपने मेहनत के दम पर इतना स्वादिष्ट जलेबी बनाती है कि लोग जलेबी के दीवाने हैं. जलेबी के स्वाद के पीछे संघर्ष छुपा और मिट्टी के चूल्हे और लकड़ी से जब जलेबी बनती है तो स्वाद चार गुना ज्यादा बढ़ जाता है देखिए ये रिपोर्ट…
मजदूरी से शुरू हुआ सफर, दूसरों को देखकर सीखी जलेबी बनाने की कला
सबंदो बाई ने लोकल 18 को बताया कि उनकी उम्र 60 साल से अधिक हो चुकी है और वह पिछले करीब 10 वर्षों से देसी अंदाज में जलेबी बना रही हैं, सड़क किनारे उनकी टपरी होने के कारण उनके मन में खुद का छोटा-सा रोजगार शुरू करने का विचार आया. शुरुआत में वह मजदूरी किया करती थीं. इस दौरान वह अलग-अलग लोगों को अपने हुनर से काम करते देखती थीं, कोई भजिया बनाता था, तो कोई जलेबी. उन्हें देखकर सबंदो बाई ने भी जलेबी बनाना सीख लिया शुरुआत में उन्होंने भजिया बनाकर बेचना शुरू किया, लेकिन धीरे-धीरे जलेबी उनकी खास पहचान बन गई, इसके बाद उन्होंने टपरी पर ही अपना छोटा-सा होटल चलाना शुरू कर दिया. आज वह अपनी मेहनत से रोजी-रोटी कमा रही हैं और किसी के सामने हाथ फैलाने की जरूरत नहीं पड़ती.
मिट्टी के चूल्हे पर बनती है देसी जलेबी, स्वाद ऐसा कि दिनभर में बिक जाती है पूरी
सबंदो बाई की जलेबी बनाने का अंदाज भी खास है, वह आधुनिक गैस चूल्हे की जगह मिट्टी के चूल्हे पर जलावन की लकड़ियां जलाकर जलेबी तैयार करती हैं, उनके मुताबिक, जलेबी बनाने के लिए मैदे का घोल तैयार किया जाता है, इसके बाद उसे गर्म तेल में पकाया जाता है और फिर मीठी चाशनी में डुबो दिया जाता है. चाशनी में डूबने के बाद जलेबी में मिठास भर जाती है और उसका स्वाद और भी बेहतर हो जाता है, सबंदो बाई का कहना है कि जलेबी को सही तरीके से चाशनी में डुबोना जरूरी है, तभी उसमें मिठास और अच्छा स्वाद आता है. वह इसी पारंपरिक तरीके से जलेबी बनाती हैं और दिनभर में जितनी जलेबी तैयार करती हैं, वह बिक जाती है.
कभी दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं होती थी, आज मेहनत से चला रही हैं अपना होटल
सबंदो बाई की जिंदगी हमेशा इतनी आसान नहीं थी उन्होंने बताया कि एक समय ऐसा भी था, जब परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद खराब थी. कभी दो वक्त की रोटी मिल जाती थी, तो कभी खाने के लिए भी परेशानी होती थी.छोटे-छोटे बच्चे थे, ऐसे में चिंता रहती थी कि पहले बच्चों को खिलाएं या खुद खाना खाएं. कई बार रात भूखे पेट ही सोना पड़ता था.लेकिन इन मुश्किलों के बीच भी उन्होंने हिम्मत नहीं छोड़ी,मजदूरी करने के बाद उन्होंने अपने हुनर को पहचाना और छोटा-सा होटल शुरू कर दिया.आज वह अपनी मेहनत से कमाई कर रही हैं.उनके मुताबिक, अब पहले जैसी स्थिति नहीं है. दो वक्त की रोटी मिल जाती है और सरकार की ओर से मिलने वाले राशन से भी काफी राहत मिलती है.
पति के निधन के बाद भी नहीं मानी हार, टपरी ही बनी रोजगार का सहारा
सबंदोबाई ने बताया कि उनके पति के दुनिया से चले जाने के बाद से वह टपरी में ही होटल चलाकर अपनी जिंदगी गुजार रही हैं उनकी छोटी-सी टपरी ही उनके रोजगार का सहारा है. वह इसी जगह जलेबी और भजिया बनाती हैं और ग्राहकों को बेचती हैं. भले ही उनका होटल किसी बड़े भवन में नहीं है, लेकिन अपनी मेहनत के दम पर वह रोजी-रोटी कमा रही हैं. दिनभर की मेहनत से उनकी मजदूरी निकल जाती है और उन्हें किसी से पैसे मांगने की जरूरत नहीं पड़ती. सीमित संसाधनों के बावजूद अपने पैरों पर खड़े रहने का उनका यह प्रयास ग्रामीण महिलाओं के लिए प्रेरणा है.
युवाओ को सबंदो बाई की नसीहत, नशे से दूर रहकर खुद का रोजगार करें शुरू
सबंदो बाई ने युवाओं को संदेश देते हुए कहा कि लोगों को गलत रास्ते पर जाने और नशे में पैसा बर्बाद करने के बजाय कोई काम सीखना चाहिए और अपना रोजगार शुरू करना चाहिए उनका मानना है कि मेहनत करके कमाए गए पैसे से इंसान अपनी जरूरतें पूरी कर सकता है और सम्मान के साथ जीवन जी सकता है. उन्होंने अपनी जिंदगी में गरीबी और परेशानियों का सामना किया है, लेकिन मेहनत करना नहीं छोड़ा. आज 60 वर्ष से अधिक उम्र में भी वह काम कर रही हैं. उनकी कहानी बताती है कि रोजगार के लिए हमेशा बड़े निवेश या बड़ी दुकान की जरूरत नहीं होती. हुनर, मेहनत और कुछ कर गुजरने का जज्बा हो, तो छोटी-सी टपरी भी जिंदगी बदलने का जरिया बन सकती है.