बांग्लादेश में खसरे से 1,147 मौतें, तारिक रहमान से नहीं सभल रहा, 2 लाख से ज्यादा पर सीधा खतरा

बांग्लादेश में खसरे से 1,147 मौतें, तारिक रहमान से नहीं सभल रहा, 2 लाख से ज्यादा पर सीधा खतरा


बांग्लादेश में खसरे का प्रकोप खतरनाक रूप ले चुका है. मार्च के मध्य से 9 अक्टूबर तक देश में खसरे के 2.02 लाख से ज्यादा संदिग्ध मामले सामने आए हैं, जबकि 22 हजार मामलों की जांच में बीमारी की पुष्टि हुई है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक, इस दौरान 1,147 लोगों की मौत हुई है. मरने वालों में 94 फीसदी पांच साल से कम उम्र के बच्चे हैं. टीकाकरण में कमी, स्वास्थ्य कर्मचारियों की पहुंच से दूर गांव और सरकारी आंकड़ों में खामियों ने इस संकट को और गंभीर बना दिया है. बांग्लादेश के हालात पूरी दुनिया के लिए एक सीधी चेतावनी है.

न्यूज एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, बांग्लादेश में खसरे का यह प्रकोप दुनिया के लिए भी चेतावनी है. विशेषज्ञों का कहना है कि जब बच्चों को समय पर टीका नहीं मिलता और टीकाकरण का स्तर गिर जाता है, तो खसरे जैसी तेजी से फैलने वाली बीमारी को रोकना मुश्किल हो जाता है. बांग्लादेश में हालात इसलिए भी चिंताजनक हैं, क्योंकि कुछ महीने पहले सरकार ने दावा किया था कि टीकाकरण अभियान से बीमारी पर काबू पाया जा रहा है. लेकिन सितंबर में संक्रमण के मामले फिर तेजी से बढ़ने लगे.

बेटे को बचाने के लिए बेचा ऑटो, फिर भी नहीं बची जान

बांग्लादेश के उत्तर-पूर्वी सिलहट इलाके में खसरे का असर सबसे ज्यादा देखने को मिला है. यहां दो साल के अरमान हुसैन की जुलाई में मौत हो गई. उसे खसरे का टीका नहीं लगा था. तबीयत बिगड़ने पर परिवार उसे अस्पताल लेकर गया, जहां इलाज का खर्च जुटाने के लिए उसके पिता अमीन मियां को परिवार का ऑटो रिक्शा तक बेचना पड़ा. अस्पताल में भर्ती होने के करीब 24 घंटे बाद अरमान की मौत हो गई. उसका चार साल का टीका न लगा हुआ बहन बीमारी से बच गई.

26 साल के अमीन मियां का कहना है कि उनके दूर-दराज के गांव में टीका लगाने के लिए कोई स्वास्थ्यकर्मी समय पर नहीं पहुंचा. उन्होंने कहा, ‘वे मेरे बेटे को दफनाने के बाद ही आए.’ सिलहट के ही छातक कस्बे में एक और परिवार ने अपनी नौ महीने की बच्ची को खो दिया. बढ़ई का काम करने वाले 30 साल के हुमायूं राशिद की बेटी लबीबा अख्तर की जून में खसरे से मौत हो गई. उसे भी टीका नहीं लगा था. अप्रैल में सरकार ने इमरजेंसी वैक्सीनेशन प्रोग्राम के तहत टीका लगवाने की न्यूनतम उम्र नौ महीने से घटाकर छह महीने कर दी थी. इस बदलाव के कारण लबीबा को भी टीका लगाया जा सकता था. लेकिन उसके पिता के मुताबिक, उन्हें इसकी जानकारी देने कोई स्वास्थ्यकर्मी नहीं आया. ये दोनों घटनाएं बताती हैं कि वैक्सीन की मौजूदगी के बावजूद अगर जानकारी और स्वास्थ्य सेवाएं जरूरतमंद परिवारों तक नहीं पहुंचें, तो बच्चों की जान जा सकती है.

95 फीसदी टीकाकरण जरूरी

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, खसरे के प्रकोप को रोकने के लिए कम से कम 95 फीसदी बच्चों का टीकाकरण जरूरी है. बांग्लादेश कुछ साल पहले इस लक्ष्य के करीब पहुंच गया था, लेकिन 2025 में टीकाकरण की दर गिर गई. WHO और संयुक्त राष्ट्र की बाल एजेंसी यूनिसेफ के अनुमान के मुताबिक, 2024 में बांग्लादेश में 96 फीसदी बच्चों को खसरे के टीके की पहली खुराक और 93 फीसदी को दूसरी खुराक मिली थी. दूसरी खुराक उन बच्चों को सुरक्षा देने के लिए जरूरी होती है, जिनके शरीर में पहली खुराक के बाद पर्याप्त सुरक्षा नहीं बन पाती. लेकिन 2025 में पहली खुराक लेने वाले बच्चों का आंकड़ा घटकर 90 फीसदी और दूसरी खुराक लेने वालों का आंकड़ा 86 फीसदी रह गया. यह स्तर बीमारी को फैलने से रोकने के लिए जरूरी लक्ष्य से काफी नीचे है.

विशेषज्ञों का कहना है कि जब बड़ी संख्या में बच्चे टीके से छूट जाते हैं, तो संक्रमण तेजी से फैल सकता है. खसरे में तेज बुखार, खांसी और शरीर पर लाल चकत्ते जैसे लक्षण दिखाई देते हैं. WHO के मुताबिक, आम तौर पर हर 1,000 संक्रमित लोगों में दो से तीन की मौत हो सकती है. हालांकि, कुपोषण और बेहतर इलाज तक पहुंच न होने जैसी समस्याओं के कारण गरीब देशों में बीमारी ज्यादा जानलेवा साबित हो सकती है.

हालात काबू में होने का दावा, फिर भी बढ़ने लगे मामले

खसरे का प्रकोप सामने आने के बाद बांग्लादेश सरकार ने तेजी से टीकाकरण अभियान शुरू किया. अप्रैल और मई में करीब दो करोड़ बच्चों को टीका लगाया गया. इसके बाद शुरुआती दौर में नए मामलों की संख्या में कमी भी आई. मई में स्वास्थ्य मंत्री सरदार मोहम्मद सखावत हुसैन ने कहा था कि जिन इलाकों में बीमारी तेजी से फैल रही थी, वहां मामले लगभग शून्य हो गए हैं और प्रकोप नियंत्रण में है. लेकिन बाद में सामने आए आंकड़ों ने इस दावे पर सवाल खड़े कर दिए. सितंबर में बांग्लादेश में हर दिन औसतन 1,198 नए संदिग्ध मामले दर्ज किए गए. मई के बाद यह सबसे ज्यादा दैनिक औसत था.

गरीब परिवार सबसे ज्यादा प्रभावित

रॉयटर्स ने अप्रैल और अगस्त में सरकार, WHO तथा अन्य स्वास्थ्य संगठनों के बीच हुई बैठकों के दस्तावेजों की समीक्षा की. इन दस्तावेजों से पता चला कि आपातकालीन अभियान को तेजी से शुरू करने के दबाव में तैयारियों की पूरी जांच नहीं हो सकी. 19 अप्रैल की बैठक के रिकॉर्ड के मुताबिक, समय की कमी के कारण सरकार ने अभियान शुरू करने से पहले तैयारियों की केवल एक बार जांच कराई. सामान्य तौर पर ऐसी जांच के चार दौर किए जाते हैं. इनमें यह देखा जाता है कि टीकों को ठंडा रखने के लिए जरूरी इंतजाम हैं या नहीं और किन इलाकों में कितने बच्चों को टीका लगाया जाना है.

पहली जांच में ज्यादातर जिले तैयार पाए गए थे, लेकिन सभी जगह तैयारियां पूरी नहीं थीं. बांग्लादेश के महामारी विशेषज्ञ और खसरा-रूबेला उन्मूलन के लिए बने राष्ट्रीय सत्यापन समिति के अध्यक्ष प्रोफेसर महमुदुर रहमान ने कहा कि जब तैयारी की सही तरीके से जांच नहीं होती, तो सबसे गरीब और दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले बच्चे टीकाकरण से छूट जाते हैं. इसकी सबसे बड़ी कीमत भी उन्हीं परिवारों को चुकानी पड़ती है. अगस्त में हुई बैठक के रिकॉर्ड में भी अभियान की कमियों का जिक्र था. दस्तावेज के मुताबिक, टीकाकरण अभियान से पहले खसरे की पुष्टि वाले मामलों में 82 फीसदी बच्चों को टीका नहीं लगा था.



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