कुछ जगहें केवल स्वाद के लिए नहीं, उनसे जुड़ी यादों और रिश्तों के लिए भी जानी जाती हैं. दिल्ली के बंगाली मार्केट की बंगाली स्वीट ऐसी ही जगह है, जहां मिठाइयों के साथ कई पीढ़ियों की यादें, खेल, पत्रकारिता, रंगमंच और इंसानियत की कहानियां जुड़ी हैं. बंगाली स्वीट पत्रकारों, फिल्म कलाकारों, नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से जुड़े रंगकर्मियों, खिलाड़ियों और खेल अधिकारियों के मिलने-बैठने का ठिकाना रही है. लोग अपने पद और प्रसिद्धि को बाहर छोड़कर सहज होकर बैठते थे. बातचीत में अपनापन, हंसी-मजाक और सम्मान होता था.
मुझे मॉडर्न स्कूल में अभ्यास के बाद के वे दिन याद हैं, जब हम लगभग रोज यहां बैठते थे. न दिखावा था, न किसी को अपनी पहचान साबित करने की जरूरत. विचार अलग हो सकते थे, लेकिन रिश्ते उनसे बड़े थे. समय के साथ कई लोग दूर हो गए या इस दुनिया से चले गए, फिर भी उनकी यादें उन जगहों से जुड़ी हैं जहां कभी साथ बैठकर जीवन की बातें होती थीं.
बंगाली स्वीट के पास स्थित वह क्लिनिक भी पुरानी यादों का हिस्सा है, जो कभी स्वर्गीय डॉ. कुंडन लाल से जुड़ा था. (फोटो FB/Bengali Sweet House)
दिल्ली की खानपान संस्कृति
दिल्ली की खानपान संस्कृति स्वाद के साथ मेलजोल के लिए भी प्रसिद्ध है. पुराने बाजारों में लोग खाने के बहाने मिलते हैं और रिश्ते बनते हैं. अप्रैल 2023 में राहुल गांधी जी ने बंगाली मार्केट का दौरा कर नाथू स्वीट्स में गोलगप्पे खाए थे. यह स्पष्ट करना जरूरी है कि वह यात्रा नाथू स्वीट्स से जुड़ी थी; बंगाली स्वीट हाउस की अपनी अलग पहचान और पुरानी विरासत है. बंगाली मार्केट में प्रसिद्ध लोगों के साथ आम परिवारों, पुराने दोस्तों, पत्रकारों, कलाकारों और खेल प्रेमियों की यादें भी जुड़ी हैं.
मीडिया, रंगमंच और खेल का मिलन
बंगाली स्वीट में चाय और मिठाइयों के साथ पत्रकारिता, रंगमंच, फुटबॉल और हॉकी पर बातचीत होती थी. लोग एक-दूसरे को पद से नहीं, व्यवहार से पहचानते थे. आज मोबाइल और इंटरनेट ने संपर्क आसान कर दिया है, लेकिन आमने-सामने बैठकर बात करने का आनंद अलग है.
एक पुरानी विरासत
बंगाली स्वीट की पहचान लाला भीम सेन और लाला बनवारी लाल जैसे नामों से जुड़ी है. स्वर्गीय जगदीश जी ने भी इस विरासत को आगे बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई. आज गिरिश अग्रवाल इस परंपरा से जुड़े प्रमुख चेहरों में हैं. पुराना कारोबार चलाना केवल दुकान संभालना नहीं, लोगों का विश्वास बनाए रखना भी है. किसी प्रतिष्ठान की असली सफलता बिक्री से अधिक इस बात में होती है कि उसने कितने लोगों के जीवन में जगह बनाई और कितनी यादों को संभाला.
डॉक्टरों और खेल प्रेम की यादें
नई पीढ़ी और पुरानी पहचान
बंगाली मार्केट की लोकप्रियता केवल इतिहास तक सीमित नहीं है. नई पीढ़ी भी इसके पुराने प्रतिष्ठानों से जुड़ती रही है. ऋषि सुनक और सुधा मूर्ति जैसी हस्तियों से जुड़े प्रसंगों ने भी इसे चर्चा में रखा है. फिर भी किसी बाजार की असली पहचान प्रसिद्ध लोगों से नहीं, आम लोगों के विश्वास और लंबे संबंधों से बनती है. विरासत का अर्थ केवल नाम और कारोबार बचाना नहीं, पुराने अच्छे मूल्यों को बनाए रखना भी है.
दिल्ली की सामूहिक यादों का हिस्सा
कुछ लोग सुर्खियों में नहीं आते, लेकिन दिलों में रहते हैं, किसी जरूरतमंद की मदद करने, खिलाड़ी का इलाज कराने, पुराने दोस्त का हाल पूछने या किसी युवा को आगे बढ़ाने के कारण. बंगाली स्वीट मेरे लिए केवल मिठाई की दुकान नहीं, दिल्ली की सामूहिक यादों का हिस्सा है. यह उस समय की याद दिलाती है, जब मिलने के लिए निमंत्रण की जरूरत नहीं होती थी और लोग पद से नहीं,
व्यवहार से पहचाने जाते थे.
यहां की मिठाइयां स्वाद देती हैं, लेकिन इससे जुड़ी यादें दिल को सुकून देती हैं. दिल्ली की असली पहचान उन जगहों में भी है, जहां दोस्ती, खेल, सेवा और इंसानियत ने वर्षों तक जगह बनाई. बंगाली स्वीट ऐसी ही जगह है. यहां मिठास मिठाइयों के साथ दिल्ली की तहजीब, रिश्तों और इंसानियत में भी है. यही बंगाली मार्केट की असली शान है.

मोहम्मद गौस
दिल्ली के पूर्व गोलकीपर, भारतीय फुटबॉल टीम के कैंप एवं प्री-ओलंपिक से जुड़े रहे अनुभवी खेल विशेषज्ञ और हिंदी कमेंटेटर. फुटबॉल विश्व कप, हॉकी विश्व कप, ओलंपिक फुटबॉल फाइनल (बीजिंग 2008), यूरो कप 2008 तथा डूरंड कप के 25 संस्करणों में लाइव कमेंट्री और सुब्रतो कप के 27 से अधिक फाइनल में अनुभव. मेलबर्न राष्ट्रमंडल खेल 2006 और दिल्ली राष्ट्रमंडल खेल 2010 सहित अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजनों को कवर किया. बीजिंग ओलंपिक 2008 में विजेंदर सिंह, अखिल कुमार, जितेंद्र कुमार और मैरी कॉम जैसे भारतीय मुक्केबाजों के ऐतिहासिक सफर के साक्षी रहे. विभिन्न खेलों की गहरी समझ और दशकों के अनुभव के कारण खेल पत्रकारिता एवं हिंदी कमेंट्री जगत में एक जाना-पहचाना नाम.
खेल पत्रकारिता का सफर एवं गौरवपूर्ण उपलब्धियां
खेल केवल एक विधा नहीं, बल्कि जुनून, समर्पण और जीवन का अभिन्न हिस्सा रहा है. दिल्ली के पूर्व गोलकीपर के रूप में मैदान से शुरू हुआ मेरा सफर आज राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खेल पत्रकारिता एवं हिंदी लाइव कमेंट्री के क्षेत्र में एक समृद्ध अनुभव और विशिष्ट पहचान का प्रतीक है.
मुझे फुटबॉल विश्व कप, हॉकी विश्व कप, ओलंपिक फुटबॉल फाइनल, यूरो कप 2008 और बीजिंग ओलंपिक 2008 जैसे प्रतिष्ठित खेल आयोजनों को कवर करने का गौरव प्राप्त हुआ है. डूरंड कप में 25 बार लाइव कमेंट्री और सुब्रतो कप के 27 से अधिक फाइनल मुकाबलों का अनुभव मेरे पेशेवर सफर की महत्वपूर्ण उपलब्धियां हैं.
बीजिंग ओलंपिक 2008 में विजेंदर सिंह, अखिल कुमार, जितेंद्र कुमार और मैरी कॉम जैसे भारतीय मुक्केबाजों के ऐतिहासिक अभियान को करीब से कवर करना मेरे लिए विशेष अनुभव रहा. इसके अतिरिक्त, मेलबर्न राष्ट्रमंडल खेल 2006 और दिल्ली राष्ट्रमंडल खेल 2010 सहित अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में अपनी भूमिका निभाने का अवसर मिला.
फुटबॉल, हॉकी, मुक्केबाजी और रोइंग सहित विभिन्न खेलों की बारीकियों को समझते हुए मैंने खेल जगत के अनेक यादगार पलों को अपनी आवाज़ और शब्दों के माध्यम से दर्शकों तक पहुंचाया है. मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि केवल प्रतिष्ठित टूर्नामेंटों का हिस्सा बनना नहीं, बल्कि खेल के रोमांच, खिलाड़ियों के संघर्ष और देश की उपलब्धियों को हिंदी कमेंट्री के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाना है. मैदान के अनुभव, खेल की गहरी समझ और वर्षों के समर्पण ने मेरी पहचान एक अनुभवी खेल पत्रकार एवं हिंदी कमेंटेटर के रूप में बनाई है.
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