GLOF: हिमाचल में नहीँ होगी नेपाल जैसी तबाही! घेपन झील पर देश का पहला अर्ली वार्निंन सिस्टम स्थापित

GLOF: हिमाचल में नहीँ होगी नेपाल जैसी तबाही! घेपन झील पर देश का पहला अर्ली वार्निंन सिस्टम स्थापित


केलांग.  हिमाचल प्रदेश में नेपाल में आई आपदा के दौरान हुई जन हानि से बचा सकता है. हिमालयी क्षेत्र में आपदा जोखिम को कम करने तथा प्रारंभिक चेतावनी तंत्र को सुदृढ़ किया गया है. सूबे के लाहौल-स्पीति जिले की घेपन झील पर भारत का पहला अर्ली वार्निंन सिस्टम स्थापित कर दिया गया है. इस सिस्टम के जरिये ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF)  चेतावनी मिलेगी और बड़े पैमाने पर नुकसान रोका जा सकता है.

जानकारी के अनुसार, लाहौल घाटी में सिस्सु के ऊपर समुद्र तल से लगभग 4,100 मीटर की ऊंचाई पर घेपन झील है. यहां पर सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांस्ड कंप्यूटिंग (C-DAC) की ओर से यह सिस्टम लगाया गया है. जो कि राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण  की पायलट परियोजना का हिस्सा है.

हाल ही में डीसी पैदल पहुंची थी

लाहौल घाटी में घेपन झील तक पहुंचने के लिए करीब 14 किमी की पैदल चढ़ाई करनी पड़ती है.  हाल  ही में डीसी किरण भड़ाना ने झील का खुद जाकर जायजा लिया था. घेपन घाट झील के बढ़ते आकार और इससे जुड़े संभावित जोखिमों को देखते हुए जिला प्रशासन निगरानी बढ़ाई  थी. डीसी और अध्यक्ष जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण किरण भड़ाना लगातार अर्ली मॉर्निंग सिस्टम जल्दी स्थापित करने हेतु राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण से संपर्क में थी, ताकि झील के पानी के स्तर की वास्तविक स्थिति के आंकड़े लगातार मिल सके और झील के पानी के स्तर की लगातार निगरानी रखी जा सके,.

लगातार बढ़ रहा है झील का दायरा

नवंबर 2023 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO)  ने झील के बढ़ते क्षेत्रफल के संबंध में प्रशासन को अवगत करवाया गया था. इसके बाद झील के संभावित जोखिमों के आकलन, वैज्ञानिक अध्ययन, संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान और आपदा से निपटने की तैयारियों को लेकर विभिन्न स्तरों पर प्रयास किए गए. बीते 40 साल में झील का दायरा करीब 160 फीसदी बढ़ा है. इस वजह से झील बड़ा खतरा बन रही है.दूसरी ओर, चंद्रा–चिनाब (चंद्रभागा) नदी के आसपास के उन इलाकों की भी पहचान की गई है, जहां कि बाढ़ आने का अधिक खतरा है.

कैसे काम करेगा अर्ली वार्निंग सिस्टम

घेपन झील में स्थापित प्रणाली में बुआय-आधारित झील निगरानी स्टेशन, स्वचालित मौसम स्टेशन  तथा ग्लेशियर विजन यूनिट शामिल हैं. इन उपकरणों के माध्यम से झील और उसके आसपास के पर्यावरणीय परिवर्तनों की निगरानी की जाएगी. प्रणाली से प्राप्त सेंसर डेटा, दृश्य अवलोकनों और कम्प्यूटेशनल मॉडलों को C-DAC के सुपरकंप्यूटर प्लेटफॉर्म के साथ एकीकृत किया जाएगा. इससे प्राप्त सूचनाओं का विश्लेषण कर संबंधित आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों को झील की स्थिति और संभावित खतरों के आकलन में सहायता मिलेगी.

इस प्रणाली की प्रमुख विशेषताओं में वास्तविक समय में डेटा का दृश्यांकन, निर्धारित मानकों के आधार पर अलर्ट जारी करना, संभावित गोल्फ परिदृश्यों का अनुकरण तथा बाढ़ जोखिम का आकलन शामिल है. इससे अधिकारियों को परिस्थितियों की बेहतर समझ विकसित करने, जोखिम का आकलन करने और आपातकालीन तैयारियों को प्रभावी बनाने में सहायता मिलने की उम्मीद है.

इस महत्वपूर्ण परियोजना के क्रियान्वयन में जिला प्रशासन लाहौल-स्पीति और जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण  ने प्रशासनिक स्वीकृतियों, लॉजिस्टिक व्यवस्थाओं तथा फील्ड स्तर पर समन्वय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. हिमाचल प्रदेश राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण , अटल बिहारी वाजपेयी पर्वतारोहण एवं संबद्ध खेल संस्थान , राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल , चिकित्सा एवं पुलिस दलों तथा अन्य सहयोगी एजेंसियों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा. दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों, कठिन पहाड़ी भूभाग और अप्रत्याशित मौसम के बावजूद विभिन्न एजेंसियों और फील्ड टीमों के समन्वित प्रयासों से इस प्रणाली की स्थापना संभव हो पाई.



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