105 साल की उम्र, चल-फिर नहीं सकते, फिर भी नवरात्र में 9 दिन का उपवास; काली घाट मंदिर के पुजारी की अटूट आस्था

105 साल की उम्र, चल-फिर नहीं सकते, फिर भी नवरात्र में 9 दिन का उपवास; काली घाट मंदिर के पुजारी की अटूट आस्था


छतीसगढ़ के सरगुजा संभाग मुख्यालय से 30 किलो कि दूरी पर स्थित दरीमा इलाके के पाहड़ियों में एक मंदिर मौजूद है, जो प्राचीन समय से स्थापित है. दरअसल, इस मंदिर को मां काली के नाम से जानते हैं, जहां उनकी मूर्ति पहाड़ों के बीच स्थापित है. यही वजह है, कि इस जगह को काली घाट के नाम से जानते और पहचानते हैं. यानी अंबिकापुर की ओर से आप आते हैं, तो दरीमा इलाके से नजदीक पड़ता है. मंदिर अगर आप मैनपाट से आते है, तो आमगांव के नीचे पड़ता है. यानी 400 फीट ऊंची पहाड़ों में स्थित है मां काली इसके साथ ही पूरे पहाड़ में खतरनाक रास्ता, घुमावदार मोड़ जिसे आप पहली दफा देखेंगे तो आपके रोंगेटे खड़े हो जाएंगे. लेकिन फिर भी आज तक कभी बड़ा हादसा नहीं हुआ. ऐसा बताया जाता है कि मां काली राहगीरों का रक्षा करती है. इस रास्ते है कोई भी गुजरता है तो माथा टेक कर आशीर्वाद लेकर जाता है. लेकिन बडी बात 105 साल का पुजारी जो चल फिर नहीं सकता है. इसके बावजूद पुजा पाठ में लीन है. और पुजारी ने कहा की सच्चे मन से ढूंढोगे तो भगवान इसी युग में मिलेंगे. इसलिए इरादा नेक होना चाहिए. सोचिए उम्र ढल गई हो लेकिन फिर भी नवरात्र में नौ दिन का खाना पीना त्याग दिया है, फलाहार से जिंदा है और पूजारी ने पुराने दौर की कहानी बताई है. देखिए ये रिपोर्ट…

8 साल की उम्र से मां काली की सेवा
पुजारी बाबा संभू ने लोकल 18 को बताया कि उनकी उम्र अब 105 वर्ष हो चुकी है, जब वे महज 8 साल के थे, तभी से मां काली की पूजा-अर्चना कर रहे हैं. उस समय राजा-महाराजाओं का शासन हुआ करता था. उनके अनुसार, उस दौर में देवन ठाकुर का राज था और लोग हाथी-घोड़ों से आया-जाया करते थे. गांवों में पक्के मकान भी नहीं हुआ करते थे. समय के साथ बहुत कुछ बदल गया, लेकिन मां काली के प्रति उनकी आस्था आज भी वैसी ही बनी हुई है.

चांदी के सिक्कों का था चलन, एक रुपये में मिलता था 18 टामी चावल
पुजारी ने पुराने समय को याद करते हुए बताया कि उस दौर में कागज के नोटों की जगह चांदी, तांबे और पीतल के सिक्कों का चलन था. उन्होंने बताया कि उस जमाने में एक रुपये में 18 टामी चावल मिलता था. उनके मुताबिक, उस समय की जीवनशैली आज के दौर से काफी अलग थी. वर्षों के अपने अनुभवों के आधार पर वे पुराने समय की आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों को याद करते हैं.

1971-72 का भीषण अकाल आज भी है याद
पुजारी ने अपने जीवन के सबसे कठिन दौर को याद करते हुए 1971-72 के अकाल का जिक्र करते हुए बताया कि उस समय लगातार करीब तीन वर्षों तक अकाल जैसी स्थिति बनी रही. लोगों को खाने-पीने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ता था. कई लोग आम की गुठली और कंद-मूल खाकर गुजारा करते थे, जबकि कुछ लोग जीवन बचाने के लिए सरगुजा छोड़कर असम तक चले गए थे. पुजारी के अनुसार, उस दौर में लोगों के सामने पेट भरने का संकट था और यह समय बेहद कठिन था.

नवरात्र में नौ दिनों का उपवास, फलाहार कर कर रहे मां की आराधना
105 वर्ष की उम्र में भी पुजारी नवरात्र के दौरान नौ दिनों का उपवास रख रहे हैं. उन्होंने बताया कि उपवास के दौरान उन्होंने अन्न और सामान्य भोजन का त्याग किया है तथा फलाहार करके मां काली की पूजा कर रहे हैं. नवमी के दिन उनका उपवास और संकल्प पूरा होगा.इतनी अधिक उम्र में भी पूजा-पाठ के प्रति उनका समर्पण श्रद्धालुओं के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है.

अमगांव पहाड़ के नीचे स्थित है मां काली का मंदिर
श्रद्धालुओं के अनुसार, अमगांव पहाड़ के नीचे स्थित मां काली के इस मंदिर में वर्षों से पूजा-अर्चना की जा रही है. नवरात्र के दौरान यहां सुबह और शाम भक्तों की भीड़ देखने को मिलती है. श्रद्धालुओं की मान्यता है कि मां काली के दरबार में सच्चे मन से मांगी गई मन्नतें पूरी होती हैं. मंदिर में पूजा-अर्चना के साथ भक्त मां का आशीर्वाद लेने पहुंचते हैं.

भजन-कीर्तन और भगवान के नाम में ही जीवन का सार मानते हैं पुजारी
पुजारी ने लोगों को भगवान का नाम लेने, भजन-कीर्तन करने और आस्था के मार्ग पर चलने का संदेश दिया. उनका मानना है कि इंसान को जीवन में भगवान को याद करते हुए दूसरों के प्रति भी सद्भाव रखना चाहिए. बदलते समय और कठिन परिस्थितियों को देखने के बाद भी उनका विश्वास मां काली और ईश्वर के प्रति बना हुआ है.



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