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Uttarakhand state bird Monal in danger : उत्तराखंड में गिद्ध, गौरैया और कौवे के बाद अब मोनाल खतरे में है. मोनाल उत्तराखंड का राज्य पक्षी है. इनके रहने की जगह कम हो रही है. पर्वतीय इलाकों में मानवीय गतिविधियों की वजह से बढ़ता शोर इन पक्षियों का अपने साथियों के साथ बातचीत करने के तरीके को भी बदल रहा है. देहरादून के पर्यावरणविद अशीष गर्ग लोकल 18 से बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन, भवन निर्माण और पर्यटकों की बढ़ती संख्या के चलते मोनाल की आवाज की पिच बदल गई है. मोनाल के प्राकृतिक आवास तेजी से सिमट रहे हैं. बीते पांच साल में दो अलग-अलग स्टडीज में इस पक्षी के लिए कई खतरों के संकेत मिले हैं.
देहरादून. उत्तराखंड का राज्य पक्षी मोनाल खतरे में है. उत्तराखंड के पहाड़ों पर लगातार इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट और पर्यटन की वजह से इनके रहने की जगह कम हो रही है. पर्वतीय इलाकों में मानवीय गतिविधियों की वजह से बढ़ता शोर इन पक्षियों का अपने साथी और अपने साथियों के साथ बातचीत करने के तरीके को भी बदल रहा है. इनकी पिच बदल रही है. उत्तराखंड के रिसर्चर ने पांच साल में दो अलग-अलग स्टडीज कीं, जिनमें इस पक्षी के लिए खतरों का संकेत मिला. देहरादून के गिद्ध, गौरैया और कौवे की तरह इन पर भी संकट नजर आ रहा है. देहरादून के पर्यावरणविद अशीष गर्ग लोकल 18 से बताते हैं कि मोनाल उत्तराखंड का राज्य पक्षी और नेपाल का राष्ट्रीय पक्षी है. यह ज्यादा हरियाली और ऊंचाई वाले इलाकों में रहते हैं. जलवायु परिवर्तन, भवन निर्माण और पर्यटकों की बढ़ती संख्या के चलते मोनाल की आवाज की पिच बदल गई है. मानव हस्तक्षेप के कारण मोनाल के प्राकृतिक आवास तेजी से सिमट रहे हैं.
तालमेल बिठाने में दिक्कत
पहाड़ी इलाकों में मानवीय गतिविधियों और पर्यटकों की गाड़ियों का शोर लगातार बढ़ रहा है. इस शोर-शराबे का असर अब मोनाल के व्यवहार और उसकी आवाज पर साफ दिखने लगा है. शोध के मुताबिक, शोर के बीच तालमेल बिठाने के लिए मोनाल की आवाज की पिच बदल गई है. पक्षियों को अपने साथी को बुलाने और प्रतिद्वंद्वियों से संवाद करने के लिए अपनी बोली का तरीका बदलना पड़ रहा है. जलवायु परिवर्तन और निर्माण कार्यों ने इस संवेदनशील पक्षी के जीवन को बुरी तरह प्रभावित किया है. कभी देहरादून की फिजाओं में मंडराने वाले गिद्ध अब लगभग ओझल हो चुके हैं. ठीक इसी तरह, घरों के आंगन में फुदकने वाली नन्हीं गौरैया भी अब शहरों में बहुत कम नजर आती है. अंधाधुंध शहरीकरण ने इन पारंपरिक पक्षियों के ठिकाने छीन लिए हैं. मोनाल पर भी खतरा मंडराने लगा है.
श्राद्ध में नहीं मिल रहे कौवे
अशीष गर्ग कहते हैं कि शहरों में पर्यावरण असंतुलन का असर कौवों की आबादी पर भी दिखने लगा है. स्थानीय लोग चिंता जताते हैं कि श्राद्ध पक्ष के दौरान खाना खिलाने के लिए भी शहरों में कौवे नजर नहीं आते हैं. बढ़ते प्रदूषण, खुले में कचरे के गलत प्रबंधन और भोजन के प्राकृतिक स्रोतों में कमी के कारण कौवों की संख्या भी घटी है. जो कौवे हर गली-मोहल्ले में आसानी से मिल जाते थे, वे अब शहरी इलाकों से दूर चले गए हैं.
सबसे बड़ी जरूरत
अशीष गर्ग के मुताबिक मोनाल, गिद्ध, गौरैया और कौवे जैसे पक्षियों का तेजी से गायब होना एक बड़े पर्यावरणीय संकट की चेतावनी है. अगर समय रहते निर्माण कार्यों, अनियंत्रित पर्यटन और ध्वनि प्रदूषण पर लगाम नहीं लगाई गई, तो आने वाली पीढ़ियां इन पक्षियों को केवल किताबों में देखेंगी. अशीष गर्ग कहते हैं कि उत्तराखंड के पर्वतीय और मैदानी दोनों क्षेत्रों में पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने के लिए सख्त नीतियां बनाना अनिवार्य है. पक्षियों के प्राकृतिक आवासों को बचाने के लिए ठोस कदम उठाना आज की सबसे बड़ी जरूरत है.