भगवान शिव ने बाघ तो माता पार्वती ने धरा गाय का रूप… क्या है बागेश्वर नाम की रोचक कहानी? पुराणों में दर्ज

भगवान शिव ने बाघ तो माता पार्वती ने धरा गाय का रूप… क्या है बागेश्वर नाम की रोचक कहानी? पुराणों में दर्ज


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भगवान शिव ने बाघ तो माता पार्वती ने धरा गाय का रूप… बागेश्वर नाम की कहानी

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Bageshwar News: उत्तराखंड के बागेश्वर नगर के नामकरण के पीछे ऋषि मार्कडेय की तपस्या और भगवान शिव-माता पार्वती से जुड़ी एक रोचक पौराणिक कथा प्रचलित है. सरयू और गोमती नदियों के संगम पर स्थित बागनाथ मंदिर यहां का प्रमुख धार्मिक केंद्र है. आइए इस स्थान से जुड़ी रोचक कथा जानते हैं.

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बागेश्वर: उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में स्थित बागेश्वर अपनी प्राकृतिक सुंदरता, धार्मिक महत्व और प्राचीन पौराणिक मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध है. सरयू, गोमती और सरस्वती नदियों के पवित्र संगम पर बसा यह नगर भगवान शिव की आराधना के लिए विशेष पहचान रखता है. यहां स्थित प्रसिद्ध बागनाथ मंदिर में सालभर श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि बागेश्वर नाम के पीछे ऋषि मार्कडेय की तपस्या और भगवान शिव-माता पार्वती से जुड़ी एक रोचक पौराणिक कथा प्रचलित है.

ऋषि मार्कडेय की तपस्या से जुड़ी है मान्यता
पंडित कैलाश उपाध्याय ने लोकल 18 को बताया कि प्राचीन समय में ऋषि मार्कडेय ने सरयू और गोमती नदियों के संगम के निकट ब्रह्मकपाली शिला पर बैठकर कठोर तपस्या की थी. कहा जाता है कि उनकी तपस्या इतनी प्रभावशाली थी कि सरयू नदी का प्रवाह भी इस स्थान पर रुक गया. इस घटना के बाद भगवान शिव और माता पार्वती ने ऋषि की तपस्या और उनकी भक्ति से जुड़ी लीला रची.

भगवान शिव ने धारण किया बाघ का रूप
लोकप्रचलित कथा के अनुसार, भगवान शिव ने बाघ और माता पार्वती ने गाय का रूप धारण किया. बाघ के गाय पर झपटने का दृश्य देखकर ऋषि मार्कडेय की तपस्या भंग हो गई. जब ऋषि ने इस घटना को देखा, तो वे गाय की रक्षा के लिए आगे आए. इसके बाद भगवान शिव और माता पार्वती ने अपने वास्तविक दिव्य स्वरूप में दर्शन दिए.

मान्यता है कि ऋषि मार्कडेय भगवान शिव के इस रूप से अभिभूत हो गए. उन्होंने भगवान से इसी स्थान पर निवास करने का अनुरोध किया. ऋषि की प्रार्थना स्वीकार करते हुए भगवान शिव ने यहां व्याघ्र यानी बाघ के रूप में विराजमान रहने का वरदान दिया.

व्याघ्रेश्वर से बागेश्वर पड़ा नाम
पंडित कैलाश उपाध्याय का कहना है कि भगवान शिव के व्याघ्र रूप में विराजमान होने के कारण इस स्थान को व्याघ्रेश्वर कहा जाने लगा. समय के साथ व्याघ्रेश्वर नाम का प्रचलित रूप बागेश्वर हो गया. हालांकि, यह नामकरण धार्मिक मान्यता और स्थानीय परंपरा से जुड़ा है, इसे प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य के बजाय पौराणिक कथा के रूप में समझना चाहिए.

बागनाथ मंदिर है आस्था का प्रमुख केंद्र
बागेश्वर का प्रसिद्ध बागनाथ मंदिर सरयू और गोमती नदियों के संगम के निकट स्थित है. भगवान शिव को समर्पित इस मंदिर को क्षेत्र के प्रमुख धार्मिक स्थलों में गिना जाता है. मंदिर की प्राचीनता और धार्मिक परंपराएं इसे कुमाऊं की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाती हैं. महाशिवरात्रि और उत्तरायणी मेले के दौरान भी बागेश्वर में धार्मिक गतिविधियां विशेष रूप से देखने को मिलती हैं. उत्तरायणी मेले में धार्मिक आस्था के साथ-साथ स्थानीय संस्कृति, लोकपरंपराओं और व्यापार की झलक भी दिखाई देती है.

धार्मिक आस्था और इतिहास का संगम है बागेश्वर
बागेश्वर की पहचान केवल इसकी प्राकृतिक सुंदरता तक सीमित नहीं है. यहां की नदियां, मंदिर और उनसे जुड़ी पौराणिक कथाएं क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती हैं. ऋषि मार्कडेय और भगवान शिव से जुड़ी कथा आज भी स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं के बीच प्रचलित है. यही वजह है कि सरयू-गोमती संगम पर बसा बागेश्वर धार्मिक पर्यटन के लिहाज से उत्तराखंड के महत्वपूर्ण स्थलों में अपनी अलग पहचान रखता है.

Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी, राशि-धर्म और शास्त्रों के आधार पर ज्योतिषाचार्य और आचार्यों से बात करके लिखी गई है. किसी भी घटना-दुर्घटना या लाभ-हानि महज संयोग है. ज्योतिषाचार्यों की जानकारी सर्वहित में है. बताई गई किसी भी बात का Local-18 व्यक्तिगत समर्थन नहीं करता है.



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