मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष के विरोध प्रदर्शन के बीच मंगलवार को राहुल गांधी हाई-टी का आयोजन कर रहे हैं. वह अपने सुनहरी बाग स्थित आवास पर विपक्ष के तमाम सांसदों और सिविल सोसायटी के लोगों के साथ शाम चार बजे मिलेंगे. संभावना जताई जा रही है कि इस हाई-टी मीटिंग में विपक्ष और सिविल सोसायटी के सदस्य सीईसी के खिलाफ आगे की रणनीति पर चर्चा करेंगे. रिपोर्ट यह भी है कि इस मीटिंग के बाद राहुल गांधी प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सकते हैं.
खैर, हम अभी इस हाई-टी मीटिंग की बात नहीं कर रहे हैं. बल्कि भारतीय राजनीति के इतिहास में एक बार संभवतः सबसे चर्चित टी मीटिंग हुई थी. उस मीटिंग के बाद केंद्र की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार गिर गई थी. यह कहानी है 1998-99 की. जब सोनिया गांधी एक चाय पार्टी में सुब्रमण्यम स्वामी की मेहमान बनी थीं. इस चाय पार्टी में एआईएडीएमके की नेता जयाललिता भी शामिल हुईं. 29 मार्च 1999 की इस चाय पार्टी के कुछ ही दिनों बाद केंद्र की अटल सरकार ने जयललिता ने समर्थन वापस ले लिया. सुब्रमण्यम स्वामी इस वक्त बीजेपी के नेता हैं, लेकिन वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का खुलकर विरोध करते रहे हैं.
क्या था टी-पार्टी का मामला?
इस कहानी की शुरुआत 1998 के लोकसभा चुनाव से होती है. चुनाव में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था. बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सरकार बनी. इस सरकार को एआईएडीएमके समेत कई सहयोगी दलों का समर्थन हासिल था. लेकिन गठबंधन की यह मजबूती ऊपर से जितनी दिखाई देती थी, भीतर से उतनी ही कमजोर थी.
तमिलनाडु की तत्कालीन नेता जयललिता और बीजेपी के बीच लगातार खींचतान चल रही थी. जयललिता की पार्टी के 18 सांसद केंद्र में वाजपेयी सरकार के लिए बेहद अहम थे. उनके समर्थन के बिना सरकार के बहुमत पर संकट खड़ा हो सकता था. दूसरी तरफ तमिलनाडु में जयललिता की राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी एम. करुणानिधि की डीएमके सरकार सत्ता में थी. केंद्र में बीजेपी के साथ डीएमके का भी गठबंधन में होना जयललिता को खटकता था.
इसी राजनीतिक उठापटक के बीच जनता पार्टी के नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने एक ऐसी मुलाकात की जमीन तैयार की, जिसने दिल्ली के सियासी गलियारों में हलचल मचा दी. स्वामी ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और जयललिता चाय के बहाने मीटिंग कराने की कार्ययोजना बनाई. दोनों नेताओं के राजनीतिक हित अलग थे और उनके बीच सहज रिश्तों की उम्मीद भी कम थी. लेकिन वाजपेयी सरकार को लेकर बन रहे हालात ने इस मुलाकात को खास बना दिया.
स्वामी की ओर से आयोजित चाय पार्टी में सोनिया गांधी और जयललिता आमने-सामने आईं. यह महज चाय पर औपचारिक मुलाकात नहीं थी. इसके पीछे सत्ता के समीकरण बदलने की संभावनाएं थीं. कांग्रेस वाजपेयी सरकार को हटाने का मौका तलाश रही थी और जयललिता सरकार पर दबाव बनाने के लिए अपने समर्थन को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही थीं. इस मुलाकात ने विपक्षी खेमे में वैकल्पिक सरकार की चर्चाओं को हवा दी.
बाद को वर्षों में सोनिया गांधी और सुब्रह्मण्य स्वामी के रिश्ते बहुत खराब हो गए. फाइल फोटो
वाजपेयी सरकार कैसे गिरी?
जयललिता और बीजेपी के बीच विवाद लगातार बढ़ता गया. उनकी मांगों में तमिलनाडु की करुणानिधि सरकार को बर्खास्त करने का मुद्दा भी शामिल था. इसके अलावा केंद्र सरकार के साथ कई दूसरे राजनीतिक मतभेद भी थे. वाजपेयी सरकार इन मांगों को पूरी तरह स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थी. नतीजा यह हुआ कि गठबंधन में तनाव बढ़ता चला गया. आखिरकार अप्रैल 1999 में जयललिता ने एनडीए सरकार से समर्थन वापस लेने का फैसला कर लिया. इससे वाजपेयी सरकार अल्पमत में आ गई. राष्ट्रपति केआर नारायणन ने सरकार से लोकसभा में बहुमत साबित करने को कहा. अब फैसला संसद के भीतर होना था. सरकार बचाने के लिए एक-एक सांसद का वोट अहम हो गया. 17 अप्रैल 1999 को लोकसभा में विश्वास मत पर मतदान हुआ. देश की राजनीति ने ऐसा नतीजा देखा, जिसकी चर्चा आज भी होती है. वाजपेयी सरकार के पक्ष में 269 वोट पड़े, जबकि विरोध में 270 सांसदों ने मतदान किया. यानी सरकार महज एक वोट से विश्वास मत हार गई.
इस घटनाक्रम में ओडिशा के तत्कालीन मुख्यमंत्री और कांग्रेस सांसद गिरिधर गमांग का वोट भी निर्णायक साबित हुआ. मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा नहीं दिया था. इसलिए वह सांसद के तौर पर मतदान कर सकते थे. उन्होंने वाजपेयी सरकार के खिलाफ वोट दिया. सरकार को बचाने की आखिरी कोशिशें नाकाम रहीं और अटल बिहारी वाजपेयी को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा. फिर देश मध्यावधि चुनाव की ओर बढ़ और करीब एक साल बाद ही देश में दोबारा चुनाव हुए.
13 अक्टूबर 1999 को फिर पीएम बने वाजपेयी
वाजपेयी सरकार गिरने के बाद देश में 1999 में फिर लोकसभा चुनाव हुए. इस बार चुनाव से पहले कारगिल युद्ध भी हो चुका था. राष्ट्रीय सुरक्षा और नेतृत्व का सवाल चुनावी चर्चा के केंद्र में था. बीजेपी ने अपने सहयोगियों के साथ चुनाव लड़ा और एनडीए को पहले के मुकाबले बेहतर समर्थन मिला. एनडीए ने बहुमत हासिल किया. 13 अक्टूबर 1999 को अटल बिहारी वाजपेयी ने तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली. इस बार उनकी सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा किया. सुब्रमण्यम स्वामी की चाय पार्टी भारतीय राजनीति में इसलिए याद की जाती है क्योंकि उसने अलग-अलग राजनीतिक हितों वाले नेताओं को एक मंच पर लाने की कोशिश की थी. राहुल गांधी की मौजूदा हाई-टी बैठक का नतीजा क्या होगा, यह तो आगे पता चलेगा. लेकिन भारतीय राजनीति का इतिहास बताता है कि कभी-कभी चाय की एक बैठक चर्चा जरूर पैदा कर देती है.