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Balaghat News: कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (CDV) ‘पैरामिक्सोवायरस’ परिवार का हिस्सा है. इसी वायरस से इंसानों में खसरा की बीमारी होती है. जब यह वायरस जंगल में फैलता है, तो संक्रमित जानवर की जान बचने की संभावना बहुत कम हो जाती है. CDV मस्तिष्क और फेफड़ों को पूरी तरह डैमेज कर देता है. यह कैनाइन श्वान वंश से जुड़ा है लेकिन यह केवल कुत्तों तक सीमित नहीं है.
बालाघाट. मध्य प्रदेश के बालाघाट के कान्हा नेशनल पार्क को ‘बाघों की नर्सरी’ कहा जाता है. एमपी में कभी सिर्फ 100 ही बाघ थे लेकिन वक्त के साथ बाघों की आबादी भी बढ़ती गई और अब यहां पर 1000 से ज्यादा बाघ हैं. इन सभी में सबसे ज्यादा बाघ कान्हा नेशनल पार्क में हैं. सिर्फ कान्हा नेशनल पार्क में 150 से ज्यादा बाघ मौजूद हैं. वहीं दक्षिण बालाघाट में भी 50 से ज्यादा बाघ मौजूद हैं. ऐसे में पूरे बालाघाट में 200 से ज्यादा बाघ हैं लेकिन इन दिनों बालाघाट में बाघों की अकाल मौत हो रही है. कभी आपसी संघर्ष, तो कभी कोई बीमारी बाघों की जान ले रही है लेकिन सबसे बड़ी चिंता इस बात की है कि जिस वायरस से गिर में 34 शेरों की मौत हुई थी, बालाघाट के कान्हा नेशनल पार्क में इसी वायरस की एंट्री अप्रैल में हुई थी, जिसपर अब तक नियंत्रण नहीं पाया जा सकता है. ऐसे में अब कान्हा प्रबंधन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं.
कान्हा नेशनल पार्क में अप्रैल में ही कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (CDV) के होने की पुष्टि हुई थी. इस वायरस का प्रकोप अब भी जारी है. 6 अक्टूबर को एक बाघिन की मौत हुई थी. वह 27 अगस्त से वन्यप्राणी चिकित्सा विशेषज्ञों की निगरानी में थी. 41 दिन के इलाज के बाद बाघिन की मौत हो गई. कान्हा टाइगर रिजर्व के उप-संचालक पीके वर्मा ने बताया कि बाघिन में सीडीवी के लक्षण देखे गए थे. सीडीवी से सबसे पहली मौत 21 अप्रैल को हुई थी. 11 माह के शावक की मौत सरही रेंज के अमाही क्षेत्र में हुई थी. फिर कुछ दिन बाद 24 अप्रैल को दूसरे शावक की मौत भी इसी इलाके में हुई थी. 25 अप्रैल को तीसरे शावक की मौत हुई थी. 29 अप्रैल को अमाही नाम की बाघिन और उसके शावक की मौत मुक्की क्वारंटाइन सेंटर में ही हुई थी. 19 मई को मुक्की रेंज के मोहगांव बीट में पांच साल के नर बाघ की मौत हुई थी. 23 जून को तीन साल के नर बाघ की मौत मुक्की क्वारंटाइन सेंटर में हुई थी.
क्या है सीडीवी?
कैनाइन डिस्टेंपर वायरस ‘पैरामिक्सोवायरस’ परिवार का हिस्सा है. यह वही वायरस है, जिससे इंसानों में खसरा की बीमारी होती है. जब यह वायरस जंगल में फैलता है, तो संक्रमित वन्यप्राणी की जान बचने की संभावना बेहद कम रहती है. यह वायरस मस्तिष्क और फेफड़ों को पूरी तरह डैमेज करता है. यह कैनाइन श्वान वंश से जुड़ा है लेकिन यह सिर्फ कुत्तों तक सीमित नहीं है. यह मांसाहारी स्तनधारियों के कई परिवारों से भी जुड़ा है. इसमें कैनडे यानी श्वान वंश के और दूसरे फेलिडे यानी बाघ, शेर, तेंदुए और चीते शामिल हैं. यह वायरस हवा, पानी के स्रोत, पालतू जीवों या फिर सीधे संपर्क में आने से फैलता है. कान्हा टाइगर रिजर्व के उप-संचालक पीके वर्मा ने दावा किया है कि सीडीवी पर कंट्रोल पाने के लिए 2881 कुत्तों को वैक्सीनेट किया जा चुका है.
आपसी संघर्ष भी ले रहा जान
कान्हा नेशनल पार्क में बाघों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. ऐसे में बाघों की बढ़ती आबादी और घटते वन क्षेत्र से न सिर्फ कान्हा में बल्कि दक्षिण बालाघाट में भी बाघों की मौत हुई है. हाल ही कटंगी वन परिक्षेत्र के नहलेसरा में भी एक बाघ की मौत की खबर सामने आई थी. वहीं जुलाई से लेकर सितंबर के बीच दो बाघों की मौत की खबर सामने आ चुकी है. 29 जुलाई को सुखा नाम के शावक की मौत हुई. सोनेवानी कंजर्वेशन रिजर्व में बाघिन गौरा के लगभग डेढ़ वर्षीय शावक का शव मिला था. शरीर पर गंभीर चोटें थीं और आपसी संघर्ष की आशंका जताई गई. कान्हा परिक्षेत्र की नक्तीघाटी बीट, कक्ष क्रमांक 138 गश्ती दल को शव के पास दूसरे बाघ के पद चिन्ह और खून के निशान मिले थे.
जंगली भैंसों को बसाया
बालाघाट के कान्हा नेशनल पार्क में 100 साल पहले विलुप्त हुए जंगली भैंसों को फिर से बसाया जा रहा है. एमपी सरकार ने काजीरंगा नेशनल पार्क से करार किया है, जिसके मुताबिक तीन सालों में 50 भैंसों को कान्हा में बसाया जाएगा. ऐसे में 29 अप्रैल को पहले 22 किलोमीटर का सफर तय कर कुछ भैंसों को कान्हा के सुपखार स्थित क्वारंटाइन सेंटर में छोड़ा गया था. करीब 6 महीने बाद उन्हें छोटे बाड़े से 17 हेक्टेयर के बड़े बाड़े में शिफ्ट किया गया. इसी काम के लिए मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव बालाघाट आए थे. सीएम सहित कान्हा के अफसरों ने बाघों की मौतों पर कोई बयान नहीं दिया.
पूर्व सांसद ने जताई चिंता
पूर्व सांसद कंकर मुंजारे ने बाघों की मौतों को लेकर चिंता जाहिर की है. उन्होंने कहा कि लगातार बाघों की मौतों की खबरें आती हैं. सरकार उनके रखरखाव पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च करती है लेकिन मौतें नहीं रुक रहीं. सीएम मोहन यादव के आने बावजूद बाघों की मौत हो रही है. अफसरों पर कोई दबाव नहीं बन रहा है. प्रशासन का कहना है कि कोई वायरस आ गया. अगर वायरस आ गया, तो उसका इलाज भी है तो है. कंट्रोल क्यों नहीं किया. वहीं सीएम द्वारा जंगली भैंसें छोड़ने पर भी उन्होंने हमला बोला. उन्होंने कहा कि सिर्फ और सिर्फ भैंसे छोड़ने के लिए सीएम यहां आए. यह जनता के पैसों (टैक्स) की बर्बादी है.