ईरान को बांटने की साजिश कर चुका है मस्क का स्टारलिंक? भारत ने ले लिया सबक?
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Star link National Security Threat: अगर आप गंभीरता से ये सोचेंगे कि भारत में स्टारलिंक की एंट्री को लेकर बहस क्यों छिड़ी है, तो आपको उदाहरण लेना होगा ईरान का. ये वही देश है, जिसने इस डिवाइस का सबसे ज्यादा खामियाजा उठाया है. इस बात तो खुद ईरान के डिप्टी कम्युनिकेशन मिनिस्टर मान चुके हैं. चलिए बताते हैं कि क्यों इसे देश की सुरक्षा और संप्रभुता के लिए खतरा माना जा रहा है.
ईरान में स्टारलिंक डिवाइस से चलते हुआ था जमकर बवाल.
Star link National Security Threat: दुनिया के सबसे अमीर कारोबारियों में शामिल एलन मस्क की सैटेलाइट इंटरनेट सेवा स्टारलिंक ने इस वक्त सिक्योरिटी को लेकर नई बहस छेड़ दी है. अब इस पूरे सीन को समझने के लिए उदाहरण लिया जा रहा है ईरान का. ऐसा इसलिए है क्योंकि अमेरिका के हमले से पहले ईरान में विरोध प्रदर्शनों और इंटरनेट बंदी के दौरान इस सेवा ने लोगों को ऑनलाइन रहने का विकल्प दिया. इससे एक ओर सूचना तक पहुंच बनाए रखने में मदद मिली, तो दूसरी ओर ये सवाल भी उठा कि किसी देश की संचार व्यवस्था पर नियंत्रण एक निजी कंपनी के हाथ में हो, तो राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता के लिए क्या चुनौतियां पैदा हो सकती हैं?
इस वक्त ये मुद्दा इसलिए भी अहम है क्योंकि स्टारलिंक की देश में शुरुआत को लेकर एलन मस्क एक्स पर बहस छेड़ चुके हैं. इस बीच ईरान का अनुभव कई महत्वपूर्ण पहलुओं को सामने लाता है. ईरान के उप संचार मंत्री मोहम्मद हाफिज हाकामी ने हाल ही में चेतावनी दी थी कि स्टारलिंक देश की इंटरनेट गतिविधियों पर सरकारी नियंत्रण को गंभीर चुनौती दे सकता है. ईरान इंटरनेशनल की रिपोर्ट की मानें तो उन्होंने यहां तक कहा कि अगर स्टारलिंक मौजूदा नियंत्रण व्यवस्था को प्रभावहीन कर देता है, तो कम्युनिकेशन मिनिस्ट्री की उपयोगिता ही खत्म हो सकती है.
क्यों स्टारलिंक बन सकता है देश की सुरक्षा के लिए खतरा?
- स्टारलिंक की खासियत यह है कि यह जमीन पर बिछे पारंपरिक इंटरनेट नेटवर्क पर निर्भर नहीं है. इसके बजाय यह अंतरिक्ष में मौजूद उपग्रहों के जरिए इंटरनेट उपलब्ध कराता है. इसलिए जब सरकारें स्थानीय इंटरनेट सेवाएं बंद करती हैं या वेबसाइटों और संचार माध्यमों पर पाबंदी लगाती हैं, तब भी स्टारलिंक एक्टिव रहेगा.
- ईरान में सरकार विरोधी प्रदर्शनों के दौरान इसका इस्तेमाल इसी वजह से चुनौतीपूर्ण हो गया. हालांकि इसे एक्सेस करने के लिए राउटर और तकनीकी परिस्थितियों के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर लगाई गई पाबंदी भी अहम रोल अदा करती है. ईरान में स्टारलिंक को सक्रिय करने से जुड़े एलन मस्क के कदम अमेरिका के दो अलग-अलग राष्ट्रपतियों के कार्यकाल के दौरान सामने आए.
स्टारलिंक को लेकर एलन मस्क के बयान ने नई बहस छेड़ दी है. (फाइल फोटो/Reuters)
ईरान में प्रयोग, भारत में प्लानिंग?
23 सितंबर, 2022 को तत्कालीन अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने घोषणा की थी कि वॉशिंगटन ईरान के लोगों की डिजिटल संचार तक पहुंच बढ़ाने के लिए सामान्य लाइसेंस जारी कर रहा है. यह कदम ईरान में महसा अमीनी की हिरासत में मौत के बाद हुए व्यापक विरोध प्रदर्शनों के बीच उठाया गया था. इन प्रदर्शनों में महिलाओं के अधिकारों और सरकार की कार्रवाई को लेकर नाराजगी सामने आई थी. इसी के अगले दिन मस्क ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर स्टारलिंक को सक्रिय करने का संकेत देते हुए लिखा- ‘स्टारलिंक सक्रिय कर रहे हैं’. इतना ही नहीं जून, 2025 में भी मस्क ने ईरान में इंटरनेट प्रतिबंधों के दौरान स्टारलिंक सेवा उपलब्ध होने का संकेत दिया. उस समय ईरान और इजरायल के बीच युद्ध के दौरान इंटरनेट पर पाबंदियां लगाई गई थीं. ये दोनों ही घटनाएं साफ करती हैं कि प्राइवेट टेक्निकल कंपनी के फैसले अंतरराष्ट्रीय राजनीति और संकट के समय कम्युनिकेशन को प्रभावित कर सकते हैं.
अमेरिका के प्रभाव का खतरा कितना बड़ा है?
भारत की नीति शोध संस्था तक्षशिला इंस्टीट्यूशन की रिपोर्ट स्टारलिंक एंड रिस्क्स फॉर इंडिया में इस विषय पर चिंता जताई गई है. रिपोर्ट में बताया गया है कि स्टारलिंक की तकनीकी क्षमता और अमेरिकी सरकार के साथ मस्क के कारोबारी संबंध दूसरे देशों के लिए कुछ जोखिम पैदा कर सकते हैं. स्टारलिंक की मूल कंपनी स्पेसएक्स अमेरिकी सरकार और नेशनल सिक्योरिटी से जुड़े स्पेस प्रोग्राम के लिए कॉन्ट्रैक्ट पर काम करती है. ऐसे संबंधों के चलते अमेरिकी प्रशासन के पास कंपनी पर प्रभाव डालने के कुछ माध्यम हो सकते हैं. रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि किसी देश में सर्विस रखने, उसे बंद करने या यूजर्स का डेटा शेयर करने के लिए कंपनी पर दबाव डाला जा सकता है. यही वो जोखिम हैं, जिसकी वजह से चीन और रूस भी स्टारलिंक को बाहर का रास्ता दिखा चुके हैं.
एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स की सैटेलाइट इंटरनेट सेवा स्टारलिंक को लेकर भारत की सुरक्षा से जुड़े कई गंभीर सवाल उठाए गए हैं. (AI तस्वीर)
ईरान ने स्टारलिंक को रोकने के लिए क्या किया?
- तक्षशिला इंस्टीट्यूशन की रिपोर्ट के अनुमान के मुताबिक 2026 की शुरुआत में ईरान में लगभग 50 हजार स्टारलिंक टर्मिनल तस्करी के जरिए पहुंचे थे और अवैध रूप से इस्तेमाल हो रहे थे.
- जनवरी में विरोध प्रदर्शन तेज होने के दौरान जब पारंपरिक इंटरनेट सेवाएं बंद की गईं, तब स्टारलिंक बाहरी दुनिया से संपर्क बनाए रखने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन गया.
- इसके जवाब में ईरानी अधिकारियों ने जीपीएस सिग्नल बाधित करने और रेडियो फ्रीक्वेंसी में हस्तक्षेप जैसे तरीके अपनाए. रिपोर्ट के मुताबिक इन उपायों से कुछ क्षेत्रों में स्टारलिंक की सर्विस अस्थायी रूप से प्रभावित हुई.
- अधिकारियों ने लंबी दूरी के जैमर इस्तेमाल करने, ड्रोन की मदद से छतों पर लगे टर्मिनलों की पहचान करने और उपकरण जब्त करने के लिए छापेमारी जैसे कदम भी उठाए. ईरान ने इस मामले को अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ के सामने भी उठाया और आरोप लगाया कि उसकी अनुमति के बिना स्टारलिंक चलाना देश की संप्रभुता का उल्लंघन है.
भारत के लिए क्या हैं सबक?
- भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं के लिए रेगुलेशन मौजूद हैं, लेकिन तक्षशिला की रिपोर्ट कहती है कि इन नियमों को लागू कराने में कुछ व्यावहारिक चुनौतियां हैं. इनमें एक प्रमुख मुद्दा जियोफेंसिंग का है, इसका मतलब ये है कि किसी उपकरण को उसकी भौगोलिक स्थिति के आधार पर नेटवर्क इस्तेमाल करने की अनुमति देना या रोकना.
- इसका एक संवेदनशील उदाहरण मणिपुर में एक उग्रवादी समूह से स्टारलिंक उपकरण बरामद होने और अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह में तस्करी से जुड़े मामले के तौर पर देखा जा चुका है. इन घटनाओं से यह बहस तेज होती है कि विदेशी कंपनी के नियंत्रण वाले नेटवर्क पर राष्ट्रीय नियमों को किस हद तक प्रभावी बनाया जा सकता है.
- इसमें कोई शक नहीं है कि स्टारलिंक दूरदराज के इलाकों में इंटरनेट पहुंचाने और संकट के समय संचार बनाए रखने में उपयोगी हो सकता है लेकिन इनके संचालन पर किसी निजी कंपनी का नियंत्रण, राष्ट्रीय सुरक्षा, डेटा की उपलब्धता और सरकारी नियमन से जुड़ी चुनौतियां भी पैदा होती हैं.