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Success Story: बचपन में पिता का साया उठ गया, मां ने दिहाड़ी मजदूरी करके परिवार चलाया और पढ़ाई में अच्छे अंक हासिल कर रूथ जॉन पॉल ने डॉक्टर बनने का सपना पूरा किया लेकिन जब 20 साल की उम्र में उन्होंने अपने ट्रांसजेंडर होने की बात परिवार को बताई तो अपनों ने ही उनसे दूरी बना ली.एमबीबीएस पूरा करने के बाद कई अस्पतालों ने भी उन्हें नौकरी देने से इनकार कर दिया.इसके बावजूद रूथ ने हार नहीं मानी.उन्होंने सरकारी अस्पताल में मेडिकल ऑफिसर के तौर पर काम किया और पोस्टग्रेजुएट दाखिले में भेदभाव महसूस होने पर तेलंगाना हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया.अब उन्होंने एमडी की डिग्री हासिल की है.जानिए रूथ जॉन पॉल की पूरी कहानी…
doctor story, MBBS Admission, Transgender Doctor: ट्रांसजेंडर रूथ जॉन पॉल की कहानी.
Success Story: तेलंगाना की रहने वाली कोय्याला रूथ जॉन पॉल की कहानी उन लोगों के लिए मिसाल है जो मुश्किल हालात के बावजूद अपने सपनों को पूरा करना चाहते हैं. बचपन में पिता को खो दिया, मां ने दिहाड़ी मजदूरी करके परिवार चलाया और पढ़ाई में अपने प्रदर्शन के दम पर रूथ ने मेडिकल की पढ़ाई पूरी की लेकिन जब 20 साल की उम्र में उन्होंने खुद के ट्रांसजेंडर होने की बात परिवार को बताई तो उन्हें अपनों की नाराजगी और दूरी का सामना करना पड़ा.एमबीबीएस पूरा करने के बाद भी कई अस्पतालों ने उन्हें ट्रांसजेंडर होने के कारण नौकरी देने से इनकार कर दिया.इसके बावजूद रूथ ने हार नहीं मानी.उन्होंने न सिर्फ मेडिकल क्षेत्र में अपनी जगह बनाई, बल्कि दाखिले की प्रक्रिया में भेदभाव महसूस होने पर तेलंगाना हाई कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया.अब उन्होंने हैदराबाद के ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल से इमरजेंसी मेडिसिन में पोस्टग्रेजुएट डिग्री हासिल कर ली है.
बचपन में पिता का साया उठा, मां ने मजदूरी करके पढ़ाया
कोय्याला रूथ जॉन पॉल तेलंगाना के खम्मम जिले की रहने वाली हैं.उनका बचपन आसान नहीं रहा. जब वह छोटी थीं तभी उनके पिता का निधन हो गया. इसके बाद परिवार की जिम्मेदारी उनकी मां पर आ गई जो दिहाड़ी मजदूरी करके घर चलाती थीं.आर्थिक तंगी के बावजूद रूथ ने अपनी पढ़ाई पर ध्यान बनाए रखा.रूथ पढ़ाई में शुरू से ही होनहार थीं. उन्होंने 12वीं कक्षा तक हर कक्षा में सबसे ज्यादा अंक हासिल किए. उनकी इसी शैक्षणिक प्रतिभा के कारण उन्हें 11वीं और 12वीं कक्षा में मुफ्त दाखिला मिला. इसके साथ ही उन्हें मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट की तैयारी के लिए मुफ्त कोचिंग की सुविधा भी मिली.इन अवसरों का लाभ उठाते हुए रूथ ने मेडिकल की पढ़ाई में प्रवेश पाने का अपना सपना पूरा किया. उन्होंने हैदराबाद के एक निजी मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस की सीट हासिल की और डॉक्टर बनने की दिशा में आगे बढ़ीं.
ट्रांसजेंडर होने की बात बताई, परिवार ने छोड़ा साथ
रूथ की जिंदगी में एक बड़ा मोड़ तब आया जब वह एमबीबीएस के तीसरे वर्ष में थीं.उस समय उनकी उम्र 20 साल थी.उन्होंने अपने ट्रांसजेंडर होने की बात परिवार को बताई लेकिन परिवार ने उन्हें स्वीकार करने के बजाय उनसे दूरी बना ली.रूथ के परिवार ने उन्हें घर आने से भी मना कर दिया.जिस समय उन्हें अपने परिवार के सहयोग और भावनात्मक सहारे की जरूरत थी उस समय उन्हें अपनों की बेरुखी का सामना करना पड़ा. इसके बावजूद उन्होंने अपनी पढ़ाई और करियर को रुकने नहीं दिया.परिवार के साथ संबंधों में आई इस दूरी और आर्थिक मुश्किलों के बीच मेडिकल की पढ़ाई जारी रखना उनके लिए आसान नहीं था.फिर भी रूथ ने अपनी मेहनत और लक्ष्य पर ध्यान बनाए रखा.
कई अस्पतालों ने नौकरी देने से किया इनकार
एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी करने के बाद रूथ को उम्मीद थी कि अब उन्हें डॉक्टर के रूप में काम करने का अवसर मिलेगा लेकिन उनके सामने एक नई चुनौती आ गई.रूथ के मुताबिक कई अस्पतालों ने उन्हें ट्रांसजेंडर होने के कारण नौकरी देने से इनकार कर दिया.लगातार अस्वीकृति मिलने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी.शुरुआत में उन्होंने एक गैर-सरकारी संगठन यानी एनजीओ की ओर से संचालित क्लिनिक में काम किया.इसके बाद वर्ष 2022 में उन्हें सरकारी उस्मानिया जनरल अस्पताल में मेडिकल ऑफिसर की नौकरी मिल गई.रूथ ने कहा कि उन्होंने अपने आसपास कई ट्रांसजेंडर लोगों को देखा जिन्हें आजीविका के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है. उनके मुताबिक कई लोगों को भीख मांगने या सेक्स वर्क जैसे कामों की ओर जाना पड़ता है. ऐसे हालात देखकर उन्होंने तय किया कि वह आत्मनिर्भर बनेंगी और अपनी मेहनत के दम पर जीवन में आगे बढ़ेंगी.
पोस्टग्रेजुएट दाखिले में आई परेशानी, हाई कोर्ट पहुंचीं
रूथ ने एमबीबीएस के बाद मेडिकल की पढ़ाई में आगे बढ़ने का फैसला किया हालांकि पोस्टग्रेजुएट कोर्स में दाखिला लेते समय उन्हें एक और मुश्किल का सामना करना पड़ा.उनके मुताबिक उस समय ट्रांसजेंडर उम्मीदवारों को दाखिला प्रक्रिया में शामिल करने के लिए स्पष्ट नियम नहीं थे.ऐसे में रूथ ने अपने अधिकारों के लिए तेलंगाना हाई कोर्ट का रुख किया.वहां से उन्हें अनुकूल आदेश मिला जिसके बाद वह दाखिले से जुड़ी प्रक्रिया में आगे बढ़ सकीं.रूथ ने कहा कि उन्हें महिला श्रेणी में शामिल किए जाने के बावजूद भेदभाव महसूस हुआ.उन्होंने बताया कि वह खुद को महिला मानती हैं लेकिन इस पूरी प्रक्रिया के दौरान उन्हें लगा कि उनके साथ उचित व्यवहार नहीं किया जा रहा है इसलिए उन्होंने समझौता करने के बजाय अपनी बात रखी और इसके खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ी.
इमरजेंसी मेडिसिन में हासिल की पोस्टग्रेजुएट डिग्री
लगातार सामाजिक चुनौतियों, परिवार से मिले असहयोग और पेशेवर जीवन में भेदभाव के बावजूद रूथ ने अपनी मेडिकल शिक्षा जारी रखी.अब उन्होंने हैदराबाद स्थित एम्प्लॉइज स्टेट इंश्योरेंस कॉरपोरेशन (ईएसआईसी) मेडिकल कॉलेज और अस्पताल से इमरजेंसी मेडिसिन में पोस्टग्रेजुएट डिग्री हासिल की है.उनके एमडी परीक्षा के नतीजे शनिवार को घोषित किए गए.यह उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि रूथ को पढ़ाई के दौरान आर्थिक कठिनाइयों के साथ-साथ अपनी पहचान को लेकर भी कई सवालों और चुनौतियों का सामना करना पड़ा.पिता की बचपन में मृत्यु, मां की सीमित आमदनी, परिवार से दूरी और नौकरी पाने में आई बाधाओं के बीच मेडिकल क्षेत्र में आगे बढ़ना उनके लिए आसान नहीं था लेकिन उन्होंने अपनी मेहनत और पढ़ाई के प्रति लगन को अपनी ताकत बनाया.