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Who is Richa Joshi Bageshwar : उत्तराखंड के बागेश्वर की रिचा जोशी किसी प्रेरणा से कम नहीं हैं. वे इन दिनों अपनी पढ़ाई के साथ पारंपरिक कला को नया रूप देकर अलग पहचान बना रही हैं. पढ़ाई और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के बीच समय निकालकर रिचा ऐपण और मधुबनी आर्ट को आगे बढ़ा रही हैं. वे ऐपण फ्रेम, स्वास्तिक चिन्ह, ऐपण नेम प्लेट, की-रिंग, लक्ष्मी, सरस्वती, नवदुर्गा, चामुंडा, आचार्य, धूलि, नामकरण, स्नान, आसन और गणेश चौकी तैयार करती हैं. लोकल 18 से रिचा का कहना है कि अगर आपके पास कोई हुनर है, तो उसे केवल शौक तक सीमित नहीं रखना चाहिए.
बागेश्वर. उत्तराखंड के बागेश्वर जिले की रिचा जोशी इन दिनों अपनी पढ़ाई के साथ पारंपरिक कला को नया रूप देकर पहचान बना रही हैं. बागेश्वर के ठाकुरद्वारा वार्ड निवासी रिचा जोशी हायर एजुकेशन की पढ़ाई के साथ ऐपण और मधुबनी आर्ट से जुड़ा काम कर रही हैं. अपने हुनर के जरिए वह अलग-अलग तरह के उत्पाद तैयार कर उन्हें ऑनलाइन बेचती हैं. रिचा ने अपनी स्नातक की पढ़ाई हल्द्वानी से पूरी की, जबकि स्नातकोत्तर की पढ़ाई उत्तराखंड ओपन यूनिवर्सिटी से की है. वर्तमान में वह प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रही हैं. पढ़ाई और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के बीच समय निकालकर रिचा ऐपण और मधुबनी आर्ट को आगे बढ़ा रही हैं. उनका कहना है कि आज के समय में पढ़ाई के साथ अपने हुनर को निखारना भी जरूरी है.
बचपन का शौक
रिचा को बचपन से ही ऐपण बनाने में रुचि थी. धीरे-धीरे उन्होंने इस पारंपरिक कला को सीखकर इसमें नए प्रयोग करना शुरू किया. आज उनका यही शौक कमाई के साधन में बदल चुका है. वह पारंपरिक ऐपण डिजाइनों के साथ आधुनिक जरूरतों के अनुसार भी कई तरह के उत्पाद तैयार करती हैं. रिचा ऐपण फ्रेम, स्वास्तिक चिन्ह, ऐपण नेम प्लेट, की-रिंग, लक्ष्मी, सरस्वती, नवदुर्गा, चामुंडा, आचार्य, धूलि, नामकरण, स्नान, आसन और गणेश चौकी सहित कई तरह के डिजाइन तैयार करती हैं. मधुबनी आर्ट भी बनाती हैं. इन कलाकृतियों को लोग घर की सजावट, धार्मिक आयोजनों, उपहार और विशेष मौके के लिए पसंद कर रहे हैं.
रिचा अपने बनाए उत्पादों को ऑनलाइन माध्यम से ग्राहकों तक पहुंचा रही हैं. इससे बागेश्वर जैसे पहाड़ी क्षेत्र में रहते हुए भी उन्हें दूसरे स्थानों से ऑर्डर मिलने का अवसर मिल रहा है. सोशल मीडिया और ऑनलाइन माध्यम उनके लिए अपने हुनर को प्रदर्शित करने के साथ-साथ कमाई का जरिया भी बन रहा है. लोकल 18 से रिचा का कहना है कि अगर युवाओं और महिलाओं के पास कोई हुनर है, तो उसे केवल शौक तक सीमित नहीं रखना चाहिए. उसे व्यवसाय का रूप देकर आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है.
परिवार ने दिया साथ
रिचा के पिता मोहन चंद्र जोशी सरस्वती मंदिर गरुड़ विद्यालय में कार्यरत हैं, जबकि उनकी माता निर्मला जोशी गृहिणी हैं. उनके भाई शुभम जोशी सेना में लेफ्टिनेंट के पद पर कार्यरत हैं. परिवार से मिले सहयोग और प्रोत्साहन ने रिचा को अपने हुनर को आगे बढ़ाने में मदद की है. रिचा की कहानी यह बताती है कि पहाड़ की बेटियां पढ़ाई और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के साथ अपनी पारंपरिक कला को भी रोजगार और स्वरोजगार का माध्यम बना सकती हैं. उनका प्रयास न केवल स्थानीय कला को आगे बढ़ाने का काम कर रहा है, बल्कि दूसरी महिलाओं और युवतियों को भी अपने हुनर के जरिए आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा दे रहा है.