shardiya navratri 2026 saptashrungi devi ardha shaktipeeth 18 hands blessings | सप्तश्रृंगी शक्तिपीठ को क्यों कहते हैं अर्धशक्तिपीठ? यहां मां ने शांत

shardiya navratri 2026 saptashrungi devi ardha shaktipeeth 18 hands blessings | सप्तश्रृंगी शक्तिपीठ को क्यों कहते हैं अर्धशक्तिपीठ? यहां मां ने शांत


Saptashrungi Devi Ardha Shaktipeeth: देशभर में शारदीय नवरात्र की तैयारी शुरू हो गई है. इस साल 11 अक्टूबर दिन रविवार से शारदीय नवरात्र शुरू हो रहे हैं और 19 अक्टूबर को समापन हो रहा है. वहीं 20 अक्टूबर दिन मंगलवार को विजयादशमी का पर्व मनाया जाएगा. नवरात्रि के नौ दिन के दौरान मां के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाएगी. वहीं कुछ श्रद्धालु इस शुभ अवसर पर शक्तिपीठों में जाकर माता के दर्शन करते हैं और आशीर्वाद प्राप्त करते हैं. नवरात्रि के समय 51 शक्तिपीठों में और महाराष्ट्र के ‘साढ़े तीन शक्तिपीठों’ में से एक के रूप में अत्यंत पवित्र सप्तश्रृंगी शक्तिपीठ में भी श्रद्धालु बड़ी संख्या में आते हैं. मान्यता है कि यहां दर्शन करने मात्र से सभी परेशानियों से मुक्ति मिलती है और सभी दोष भी खत्म हो जाते हैं.

साढ़े तीन शक्तिपीठों में से एक
मां सप्तश्रृंगी शक्तिपीठ को अर्धशक्तिपीठ भी कहा जाता है. यह पावन मंदिर महाराष्ट्र में प्रचलित ‘साढ़े तीन शक्तिपीठों’ की विशेष धार्मिक परंपरा का एक मुख्य हिस्सा है. इस व्यवस्था में साढ़े तीन शक्तिपीठ में तीन पीठ को पूर्ण माना गया है, जबकि चौथे (सप्तश्रृंगी) को ‘अर्धशक्तिपीठ’ का दर्जा प्राप्त है. तुलजापुर की तुलजा भवानी, कोल्हापुर की महालक्ष्मी और माहुर की रेणुका माता को पूर्ण शक्तिपीठ माना गया है, जबकि सप्तश्रृंगी देवी यहां कुमारी (बालिका) रूप में विराजमान हैं, इसलिए इसे अर्धपीठ कहा जाता है.

माता सती से जुड़ी पौराणिक कथा
सप्तश्रृंगी में माता सती की दाहिनी भुजा गिरने की पौराणिक कथा शिव पुराण और देवी पुराण की उस प्रसिद्ध कथा से जुड़ी है, जिसमें माता सती के यज्ञकुंड में प्राण आहुति देने के बाद भगवान शिव के विलाप और उनके अंगों के बिखरने का वर्णन है. पौराणिक कथा के अनुसार, राजा दक्ष ने जब एक बार यज्ञ का आयोजन किया तो उसमें भगवान शिव और माता सती को उन्होंने निमंत्रण नहीं दिया था. बिना निमंत्रण के वहां जाने पर जब दक्ष ने भगवान शिव का अपमान किया, तो माता सती इसे सह न सकीं और यज्ञ की अग्नि में कूदकर अपने प्राण त्याग दिए.

51 शक्तिपीठों में से एक
मां सती की मृत्यु से क्रोधित होकर भगवान शिव ने उनके पार्थिव शरीर को अपने कंधे पर उठाया और ब्रह्मांड में प्रलयकारी तांडव करने लगे. संसार को प्रलय से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के अंग-प्रत्यंगों को काटना शुरू किया. मान्यता है कि इस दौरान माता सती की दाहिनी भुजा (हाथ) महाराष्ट्र के नासिक के पास वणी क्षेत्र में स्थित सात पर्वतों (सप्तशृंग) के ऊपर गिरी थी. इसी कारण यह पावन स्थल 51 शक्तिपीठों और महाराष्ट्र के ‘साढ़े तीन शक्तिपीठों’ में एक विशेष स्थान रखता है.

यहां आकर बस गईं थी मां
भागवत पुराण के अनुसार, जब देवी ने दुर्गा का रूप धारण कर महिषासुर का वध किया था, तो वे बहुत क्रोधित थीं. अपने इस रौद्र रूप को शांत करने और विश्राम करने के लिए वह सह्याद्रि की इन सात चोटियों (सप्तश्रृंग) पर आकर बस गईं. यहां उनके पूर्ण रौद्र रूप का केवल सौम्य और आधा अंश ही भक्तों को दिखता है. माना जाता है कि ऋषि मार्कंडेय ने देवी महात्म्य इसी स्थान पर रचा था. इसमें ऋषि मार्कंडेय ने मां की महिमा का वर्णन किया है. माता की मूर्ति की ग्रीवा एक ओर थोड़ी झुकी हुई है. मान्यता है कि यहां के सामने वाले पर्वत पर बैठकर जब ऋषि मार्कंडेय ‘दुर्गा सप्तशती’ का पाठ कर रहे थे, तो माता उनकी स्तुति को ध्यान से सुनने के लिए उस ओर झुक गई थीं.

ऋषि मार्कंडेय द्वारा रचित मार्कंडेय पुराण
ऋषि मार्कंडेय द्वारा रचित ‘मार्कंडेय पुराण’ (देवी महात्म्य) के अनुसार, सप्तश्रृंगी देवी की यह प्रतिमा साक्षात् महालक्ष्मी का स्वरूप है. अठारह भुजाओं वाली इन देवी को ‘अष्टदशभुजा’ कहा जाता है, हालांकि कुछ संदर्भों में इन्हें अष्टभुजा (आठ भुजाओं वाली) के रूप में भी वर्णित किया गया है. माता की यह भव्य प्रतिमा लगभग 8 फीट (2.4 मीटर) ऊंची है, जो पूरी तरह सिंदूर से ढकी होने के कारण गहरे सिंदूरी (केसरिया) रंग की दिखाई देती है.

देवी के हाथों में अस्त्र-शस्त्र
देवी अपने हाथों में शिव का त्रिशूल (त्रिशूल), विष्णु का सुदर्शन चक्र, वरुण का शंख (अग्नि), अग्नि-देव अग्नि की लपटें, वायु का धनुष और बाण, वज्र (वज्र), इंद्र की घंटा (घंटी), यम का डंडा (कुडगेल), दक्ष की अक्षमाला (मोतियों की माला), ब्रह्मा के कमंडलु (जल-पात्र), सूर्यदेव की किरणें, काली की तलवार और ढाल, विश्वकर्मा का परशु (कुल्हाड़ी), कुबेर का मदिरा-प्याला, गदा (गदा) रखती थीं.

इस तरह होते हैं माता के दर्शन
सप्तश्रृंगी देवी नासिक से करीब 65 किलोमीटर की दूरी पर 4800 फीट ऊंचे सप्तश्रृंग पर्वत पर विराजमान हैं. इस मंदिर के एक तरफ गहरी खाई और दूसरी ओर ऊंचा पहाड़ है. करीब 472 सीढ़ियां चढ़कर श्रद्धालु मां के मुख्य मंदिर तक पहुंचते हैं. गुफा में तीन द्वार (शक्ति द्वार, सूर्य द्वार और चंद्रमा द्वार) से मां के दर्शन किए जा सकते हैं. नवरात्र के दौरान देवी की गोद भराई की जाती है. माता की गोद भराई के लिए भक्त नारियल, चुनरी,साड़ी, चूड़ी, सिंदूर, फूल और मिठाई का इस्तेमाल करते हैं. कहा जाता है कि यहां मां अपने भक्तों को 18 हाथों से आशीर्वाद देती हैं. यहां पूरन पोली का प्रसाद मिलता है.



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