Asim Munir Bypass Pakistan Parliament : आसिम मुनीर का सबसे बड़ा प्रमोशन? अब पाकिस्तानी संसद से भी ऊपर हुए ‘फेल्ड मार्शल’, सऊदी वाले फैसले

Asim Munir Bypass Pakistan Parliament : आसिम मुनीर का सबसे बड़ा प्रमोशन? अब पाकिस्तानी संसद से भी ऊपर हुए ‘फेल्ड मार्शल’, सऊदी वाले फैसले


पाकिस्तान के ‘फेल्ड मार्शल’ आसिम मुनीर को बिना वजह बार-बार प्रमोशन पा चुके हैं. वो अब पाकिस्तानी सेना के सबसे पावरफुल शख्सियत बन चुके हैं. उनके पास ऐसी ताकतें भी हैं, जो पाकिस्तान की चुनी हुई सरकार के पास भी नहीं हैं. इस बीच हाल ही में कुछ ऐसा हुआ है जिसके बाद मालूम होता है कि मुनीर पाकिस्तानी संसद से भी ऊपर हो चुके हैं. उन्होंने सऊदी अरब को लेकर जो फैसला किया है, उसने किस्तान के राजनीतिक ढांचे और संसदीय व्यवस्था पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है. पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय और रक्षा नीति पर अब पूरी तरह से सेना का कंट्रोल में हो चुकी है.

आसिम मुनीर कैसे किया पाकिस्तानी संसद को इग्नोर?

दरअसल, साल 2015 में जब सऊदी अरब ने यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ पाकिस्तान से सैन्य मदद मांगी थी, तब पाकिस्तान की संसद में बाकायदा वोटिंग हुई थी और संसद ने सर्वसम्मति से इस युद्ध में न्यूट्रल रहने का फैसला सुनाया था. लेकिन 11 साल बाद, इतिहास पूरी तरह पलट चुका है. आज असिम मुनीर की सेना ने बिना किसी संसदीय बहस या वोटिंग के हजारों सैनिकों को तेजी से सऊदी अरब में तैनात करने का फैसला कर लिया है.

सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच अगस्त में ‘मक्का रक्षा समझौते’ को आधिकारिक तौर पर लागू कर दिया गया है. ये कदम सऊदी अरब पर यमन के ईरान-समर्थित हूती विद्रोहियों द्वारा लगातार किए जा रहे हमलों के बाद उठाया गया है. हाल ही में रियाध में एक आपातकालीन बैठक बुलाई गई, जिसमें असिम मुनीर खुद शामिल हुए थे. बैठक के बाद तीनों देशों ने घोषणा की कि वो अपनी प्रतिबद्धताओं के तहत निर्धारित सैन्य बलों को ‘तुरंत तैनात’ करेंगे.

दिलचस्प बात ये है कि इस पूरी प्रक्रिया में पाकिस्तान की चुनी हुई सरकार या संसद की भूमिका शून्य नजर आई. पिछले साल हुए संवैधानिक संशोधनों ने असिम मुनीर को 2030 तक तीनों सेनाओं का सुप्रीम कमांडर बना दिया है. साथ ही उन्हें फील्ड मार्शल की आजीवन रैंक और किसी भी आपराधिक मुकदमेबाजी से पूरी छूट प्रदान की गई है. यही वजह है कि आज पाकिस्तान में मुनीर के फैसले ही देश के अंतिम कानून बन चुके हैं.

क्या कहता है पाकिस्तान का संविधान?

बिना संसद की मंजूरी के उठाए गए इस कदम पर कई सवाल उठ रहे हैं, लेकिन अगर पाकिस्तान के संविधान और कानूनी ढांचे को समझें तो स्थिति इस प्रकार है:

  • कार्यकारी अधिकार: पाकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद 243 के तहत सशस्त्र बलों का नियंत्रण और कमान संघीय सरकार के पास होता है, जिसमें राष्ट्रपति केवल औपचारिक प्रमुख होता है.
  • संसद की मंजूरी अनिवार्य नहीं: पाकिस्तान का संविधान ये अनिवार्य नहीं बनाता कि विदेश में सैनिक भेजने या किसी रक्षा समझौते को लागू करने के लिए हर बार संसद में वोटिंग कराई ही जाए.
  • 2015 बनाम मौजूदा दौर: 2015 में जब नवाज शरीफ सरकार ने संसद में वोटिंग कराई थी, तो वो एक राजनीतिक परंपरा/सहमति थी, न कि कोई संवैधानिक बाध्यता. मौजूदा समय में, फील्ड मार्शल असिम मुनीर के पास असीमित अधिकार हैं और सरकार के साथ सैन्य तालमेल ऐसा है कि मंत्रिमंडल की मंजूरी को ही कानूनी प्रक्रिया मान लिया गया है और संसद को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया है.

2015 बनाम 2026: एक दशक में कितना बदल गया पाकिस्तान?

दक्षिण एशिया मामलों के जाने-माने विश्लेषक माइकल कुगेलमैन का कहना है, ‘एक समय था जब पाकिस्तान की संसद सैनिकों को न भेजने के पक्ष में वोट करती थी और सेना उस फैसले को स्वीकार भी करती थी. लेकिन अब दौर पूरी तरह बदल चुका है’.

जब पाकिस्तान के सूचना मंत्रालय से ये सवाल पूछा गया कि क्या इस तैनाती में कैबिनेट या संसद की सहमति ली गई थी, तो उन्होंने गोलमोल जवाब देते हुए कहा कि ‘सभी जरूरी सरकारी प्रक्रियाएं पूरी कर ली गई हैं,’ और इस तैनाती के ब्यौरे को ‘ऑपरेशन्ल गोपनीयता’ का मामला बताकर टाल दिया.

इमरान खान का मार्च और सेना का बढ़ता घरेलू दबदबा

असिम मुनीर का ये कदम ऐसे समय में सामने आया है जब पाकिस्तान की घरेलू राजनीति में भूचाल आया हुआ है. जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) इस्लामाबाद की ओर विशाल मार्च निकाल रही है. पीटीआई का सीधा आरोप है कि सेना देश की राजनीति और लोकतंत्र को कुचलकर अपना शासन चला रही है.

किंग्स कॉलेज लंदन के एसोसिएट प्रोफेसर एंड्रियास क्रैग के अनुसार, विदेशी शक्तियां पाकिस्तान की सेना को ही असली शक्ति मानकर सीधे व्यवहार कर रही हैं. विदेशी साझेदार सेना को अनिवार्य मान रहे हैं, जिससे घरेलू स्तर पर सेना का दावा और मजबूत हो रहा है. उन्होंने आगाह किया कि जिस राजनीतिक व्यवस्था में कोई संवैधानिक नियंत्रण नहीं होता, वो समझौते करने में तो बहुत तेज होती है, लेकिन जब उन समझौतों की भारी कीमत चुकानी पड़ती है, तो उन्हें सुधारने में पूरी तरह नाकाम हो जाती है.

ईरान-हूती फैक्टर: क्या एक और बड़े दलदल में फंसेगा पाकिस्तान?

पाकिस्तानी सेना के इस गुप्त फैसले का सबसे खतरनाक पहलू विदेश नीति का संतुलन है. हूती विद्रोहियों को ईरान का सीधा समर्थन हासिल है. दूसरी तरफ, पाकिस्तान अमेरिका-ईरान तनाव में ईरान और अमेरिका के बीच मीडिएटर बनने का नाटक करता रहा है.

अगर पाकिस्तानी सैनिक सऊदी अरब की तरफ से सीधे हूती विद्रोहियों से लोहा लेते हैं, तो ईरान के साथ पाकिस्तान के रिश्ते पूरी तरह तबाह हो सकते हैं. हूतियों ने जुलाई से ही सऊदी जहाजों और तेल ठिकानों पर हमले तेज कर दिए हैं. हाल ही में मदीना में पैगंबर की मस्जिद को बिजली सप्लाई करने वाले पावर स्टेशन पर भी हमला करने का आरोप लगा है. ऐसे में यदि पाकिस्तानी सैनिक इस लड़ाई के बीच में आते हैं, तो वो सीधे तौर पर ईरान समर्थित गुटों के निशाने पर आ जाएंगे.

राजनीतिक दलों की चुप्पी और लोकतंत्र की हार

मौजूदा प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने संसद को दरकिनार किए जाने के सवाल पर पूरी तरह चुप्पी साध रखी है. वहीं पीटीआई के प्रवक्ता जुल्फी बुखारी का कहना है कि इतने संवोदनशील फैसले पर संसद में राजनीतिक सूझबूझ के साथ बहस होनी चाहिए थी.

हालांकि ये कदम संवैधानिक रूप से गैर-कानूनी भले न हो, लेकिन ये लोकतांत्रिक मर्यादा और संसदीय परंपराओं का हनन जरूर है. असिम मुनीर के हाथ में असीमित अधिकार हैं, और शहबाज शरीफ सरकार केवल रबड़ स्टैम्प बनकर रह गई है. बिना जनता या संसद की मर्जी के हजारों सैनिकों को विदेशी युद्ध के मोर्चे पर झोंकना ये साबित करता है कि पाकिस्तान में फील्ड मार्शल की मर्जी ही अब देश की अंतिम विदेश नीति है.



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