देहरादून: देहरादून में अपनी जायज मांगों को लेकर धरने पर बैठे आउटसोर्स कर्मचारियों का दर्द प्रशासनिक उपेक्षा और व्यवस्था की कड़वी सच्चाई को बयां करता है. वन विभाग, जल संस्थान और विद्युत विभाग जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में पिछले 20 से 40 वर्षों से लगातार सेवा दे रहे ये कर्मचारी आज अपनी उम्र के ढलान और रिटायरमेंट के मोड़ पर भी अधिकारों की लड़ाई लड़ने को मजबूर हैं. जंगली जानवरों के हमलों के साए में काम करना हो, जानलेवा बिजली के तारों के बीच उतरना हो या उफनती नदियों और गदेरों को पार कर सेवाएं बहाल रखनी हों, इन कर्मचारियों ने हर विषम परिस्थिति में जनता और सरकार के लिए अपनी जान जोखिम में डाली है.
इसके बावजूद, दशकों तक निष्ठापूर्वक सेवा देने के बाद भी इन्हें न तो सम्मानजनक वेतन मिल पा रहा है और न ही भविष्य की सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा. बुढ़ापे के जिस पड़ाव पर आराम होना चाहिए था, वहां सड़कों पर उतरकर वेतन वृद्धि और नियमितीकरण की गुहार लगाना राज्य की नीतियों पर बड़ा सवाल खड़ा करता है. सरकार को इन कर्मचारियों की वर्षों की निष्ठा और सेवा का संज्ञान लेते हुए तत्काल मानवीय व न्यायसंगत कदम उठाने चाहिए.
काम में निकल गई उम्र, तनख्वाह सिर्फ 4500 रुपए
मंगल लाल ने बताया कि उत्तरकाशी के दुर्गम गांव के रहने वाले हैं. उन्होंने बताया कि साल 1986 से वह जल संस्थान में काम कर रहे हैं. पहले 100 रुपए उनकी तनख्वाह थी, 40 साल की सेवा देने के बाद अब 4500 रुपए ही हो पाई है. हर मौसम में 25-25 किलोमीटर दूर-दूर उन्हे जाना पड़ता है. जब स्रोतों में पानी भर जाता है पाइप फट जाते हैं, उन्हें ठीक करने के लिए जाना पड़ता है. बरसात के दिनों में तो ये जल स्रोत तूफान पर होते हैं और हम जान जोखिम में डालकर काम करते हैं. उन्होंने बताया कि 60 साल की उम्र का मैं होने वाला हूं और कोई काम नहीं कर सकता हूं. लेकिन तनख्वाह बहुत कम है, गुजारा चलाना मुश्किल हो जाता है.
प्रदीप सिंह ने बताया कि वह वन विभाग के राजाजी नेशनल पार्क क्षेत्र में काम करते हैं, जंगली जानवरों का खतरा बना रहता है. जंगलों की आज हो या हाथियों के झुंड को खदेड़ना हो, हम लोग हैं खतरों के साथ यह काम करते हैं और अगर कोई अनहोनी हो जाती है, तब भी कुछ लाभ नहीं होता है. व्यक्ति के परिवार के ऊपर संकट आ जाता है. उन्होंने बताया कि 8-10 हजार की तनख्वाह में आटा, चावल, तेल समेत सभी चीज बहुत महंगी है, मेरे लिए परिवार चलाना मुश्किल हो गया है.
प्रशासन ने अब तक नहीं किया समाधान
श्याम सिंह कहा कि आज की महंगाई को देखते हुए 10 या 12 हजार वेतन का भुगतान किया जाता है. जबकि सरकार में बैठे हुए मंत्री और विधायकों को पेंशन से लेकर सभी सुविधाएं मिलती हैं, उन्हें महंगाई भत्ता दिया जाता है. उन्होंने बताया कि हमने कई बार प्रशासन को पत्र लिखकर अपनी परेशानियां बताई है, लेकिन अब तक कोई भी समाधान नहीं मिल पाया है.
सूरज भंडारी ने बताया कि वह रुद्रप्रयाग के केदार घाटी क्षेत्र के रहने वाले हैं. उन्होंने बताया कि 25,18 किलोमीटर की लाइन उनके पास है, जिन पर उन्हें काम करना होता है और तनख्वाह उनकी 3500 रुपए है. इस हिसाब से एक दिन का 120 रुपए पड़ता है, हम तो मजदूर से भी कम हैं. उन्होंने बताया यह तनख्वाह भी पांच-पांच महीने तक अटकी रहती है.
सुरक्षा को लेकर खतरा
पान सिंह बताते हैं कि वह विद्युत विभाग में काम करते हैं. उन्होंने कहा कि हमारे लाइनमैन को 8000 रुपए वेतन मिलता है. इतने खतरे के काम के बावजूद भी भविष्य सुरक्षित नहीं है. पीएफ ,ईएसआई की कोई सुविधा नहीं है. उन्होंने बताया कि साल 2022 में उनके एक साथी को करंट लगा था, उसके परिवार पर संकट आ गया था. सुरक्षा के लिए दस्ताने और साधन होने चाहिए, हम यही सरकार से मांग कर रहे हैं.