उदयपुर. पंचायत चुनाव आ गए हैं. कहते हैं राजस्थान में सत्ता का रास्ता मेवाड़ से होकर ही निकलता है. विधानसभा चुनावों में माना जाता है कि जिसने मेवाड़ फतह कर लिया है वो सरकार बना लेता है. उदयपुर बीजेपी का गढ़ माना जाता है. लेकिन पंचायत चुनावों में ग्रामीण वोटर ही सर्वेसर्वा होते हैं. पंचायत चुनाव के लिहाज से उदयपुर जिले के क्या हाल हैं. यहां की जिला परिषद और पंचायत समितियों पर किसका दबदबा रहा है। क्या परिसीमन के बाद हालात बदले हैं.
वर्ष 1995 से अब तक के इतिहास को देखें तो भाजपा और कांग्रेस दोनों ही तीन-तीन बार अपने प्रत्याशी को जिला प्रमुख की कुर्सी तक पहुंचा चुकी हैं. पिछले करीब दस साल से जिला प्रमुख की कुर्सी भाजपा के पास रही है. 2015 के चुनाव में भाजपा के शांतिलाल मेघवाल जिला प्रमुख बने थे और इसके बाद ममता कुंवर पंवार भी जिला प्रमुख बनीं. लेकिन इससे पहले तस्वीर लगातार बदलती रही. कभी अविश्वास प्रस्ताव के कारण जिला प्रमुख बदला तो कभी चुनाव के दौरान पार्टी के अंदर ही बगावत सामने आई. इसी वजह से उदयपुर जिला परिषद का इतिहास किसी एक पार्टी की सीधी पकड़ वाला नहीं रहा.
1995 में भाजपा की वंदना मीणा बनीं प्रमुख
वर्ष 1995 में भाजपा के बैनर पर चुनाव जीतकर वंदना मीणा जिला प्रमुख बनीं. हालांकि उनका कार्यकाल पांच साल पूरा नहीं हो पाया. करीब चार साल बाद ही उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया और यह प्रस्ताव पारित हो गया. इसके बाद कांग्रेस की सज्जन कटारा जिला प्रमुख बनीं. उन्होंने करीब एक साल तक यह जिम्मेदारी संभाली. इसके बाद हुए चुनाव में कांग्रेस के ही छगनलाल जैन जिला प्रमुख बने.
जब बराबर वोट आने के बाद निकाली गई थी गोटी
छगनलाल जैन के पांच साल का कार्यकाल पूरा होने के बाद जिला प्रमुख का चुनाव काफी चर्चा में आया. कांग्रेस से बगावत करते हुए केवल चंद लबाना ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर फॉर्म भर दिया. इस चुनाव में केवल चंद लबाना को भाजपा का समर्थन मिला. मुकाबला कांग्रेस के कचरूलाल चौधरी और केवल चंद लबाना के बीच हुआ. दोनों को बराबर मत मिले. बराबर वोट आने के बाद गोटी निकाली गई और इसमें केवल चंद लबाना के नाम की गोटी निकली. इस तरह वे जिला प्रमुख बन गए. इसके बाद कांग्रेस की मधु मेहता जिला प्रमुख बनीं. फिर भाजपा के शांतिलाल मेघवाल और ममता कुंवर पंवार जिला प्रमुख की कुर्सी तक पहुंचीं.
ममता कुंवर के समय बढ़ी थी खींचतान
ममता कुंवर पंवार के जिला प्रमुख बनने के समय उदयपुर की राजनीति में अंदरूनी खींचतान की चर्चा भी तेज हुई थी. ममता कुंवर को लेकर भाजपा के भीतर ही दो अलग-अलग धड़ों की बात सामने आई थी. राजनीतिक हलकों में यह कहा जाता रहा कि भाजपा के कद्दावर नेता और वर्तमान राज्यपाल गुलाबचंद कटारिया की मंशा के उलट उनके करीबी माने जाने वाले प्रमोद सामर ने अपने करीबी भंवर सिंह पंवार की बेटी ममता कुंवर को जिला प्रमुख बनाने में भूमिका निभाई. कटारिया और सामर के बीच इस मामले को लेकर नाराजगी की चर्चा भी होती रही. यह राजनीतिक घटनाक्रम उस समय उदयपुर की स्थानीय राजनीति में काफी चर्चा में रहा.
इस बार सामान्य सीट ने बढ़ाई हलचल
अब पंचायत चुनाव फिर सामने हैं और इस बार उदयपुर जिला प्रमुख का पद सामान्य यानी ओपन रखा गया है. ऐसे में दोनों प्रमुख दलों के कई चेहरे जिला प्रमुख की दौड़ में दिखाई दे सकते हैं. 2026 के लिए उदयपुर जिला परिषद में 47 वार्ड हैं और जिला प्रमुख का पद सामान्य वर्ग के लिए रखा गया है. जिला परिषद के सदस्य ही जिला प्रमुख का चुनाव करेंगे. यही वजह है कि जिला परिषद के चुनाव में सिर्फ वार्ड जीतना ही अहम नहीं होगा. जिला प्रमुख की कुर्सी तक पहुंचने के लिए चुनाव के बाद सदस्यों की संख्या और उनके बीच बनने वाला समीकरण भी काफी मायने रखेगा.
परिसीमन के बाद बदली है तस्वीर
उदयपुर जिले में इस बार पंचायत चुनाव परिसीमन के बाद हो रहे हैं. जिला परिषद में अलग-अलग वर्गों के लिए वार्ड आरक्षित किए गए हैं. 47 वार्डों में बड़ी संख्या में सीटें अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जनजाति महिला के लिए हैं, जबकि सामान्य, सामान्य महिला, ओबीसी और एससी वर्ग के लिए भी सीटें रखी गई हैं. उदयपुर में आदिवासी इलाकों की बड़ी हिस्सेदारी होने के कारण जिला परिषद के चुनाव में ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्र के वोटर की भूमिका खास रहती है. ऐसे में शहरी राजनीति में किसी दल की मजबूत स्थिति होने के बावजूद पंचायत चुनाव का गणित अलग दिखाई दे सकता है.
गांव का वोटर तय करेगा आगे की तस्वीर
उदयपुर को भाजपा का मजबूत इलाका माना जाता रहा है, लेकिन जिला परिषद के इतिहास को देखें तो तस्वीर हमेशा एक जैसी नहीं रही. कांग्रेस भी कई बार जिला प्रमुख की कुर्सी तक पहुंची और भाजपा भी लगातार दो कार्यकाल में अपना प्रमुख बनाने में सफल रही. अब फिर से दोनों दल गांवों में अपने उम्मीदवारों के जरिए ताकत दिखाने की तैयारी में हैं. इस बार जिला प्रमुख की सीट सामान्य होने से कई नेताओं और स्थानीय चेहरों की दावेदारी सामने आ सकती है. उदयपुर जिला परिषद का इतिहास यह बताता है कि यहां सिर्फ पार्टी के नाम से पूरा चुनाव तय नहीं होता. कभी अविश्वास प्रस्ताव ने समीकरण बदला, कभी पार्टी के भीतर की बगावत ने चुनाव पलटा और कभी बराबर वोट के बाद गोटी ने जिला प्रमुख का नाम तय कर दिया. अब 2026 के पंचायत चुनाव में परिसीमन के बाद बदले वार्ड और नए राजनीतिक समीकरण इस पुराने इतिहास में एक और अध्याय जोड़ने जा रहे हैं.