छत्तीसगढ के सरगुजा जिले के मैनपाट में किसान अक्टूबर शुरू होते ही टाऊ की खेती की ओर रुख अपना लेते हैं. ऐसे में 20 से 25 सालों से मैनपाट में ठंडी के दिनों में दिखाने वाला सफेद परत कोई और नहीं बल्कि टाऊ के फसल के फूल होते हैं जो फलाहार में उपयोग में लाया जाता है. इसकी खेती तिब्बती शरणार्थियों ने शुरू किया और आज के समय में 10 गुना मनाफा देने वाली पहली खेती है जिसे अब लोकल किसान भी खेती कर रहा है और बड़े पैमाने पर खेती करके मोटा कमाई कर रहे हैं. कैसे करें खेती और जानिए सावधानियां, देखिए ये रिपोर्ट…
मैनपाट की ठंडी जलवायु टाऊ के लिए बनी वरदान
स्थानीय किसान सिकंदर ने लोकल 18 को बताया कि मैनपाट का वातावरण टाऊ की खेती के लिए बेहद अनुकूल है. यहां का ठंडा मौसम फसल की अच्छी बढ़वार में मदद करता है और इससे उपज भी बेहतर मिलती है.
सितंबर में शुरू होती है खेत की तैयारी
किसान के मुताबिक टाऊ की खेती के लिए सितंबर के पहले सप्ताह से खेत की तैयारी शुरू कर दी जाती है. खेत में दो से तीन बार जुताई की जाती है. इसके बाद मौसम और मिट्टी में नमी की स्थिति देखकर अक्टूबर के पहले सप्ताह से लेकर अंतिम सप्ताह के बीच इसकी बुआई की जाती है. बुआई से पहले खाद और जरूरत के अनुसार उर्वरक का इस्तेमाल किया जाता है.
1 क्विंटल बीज से 10-15 क्विंटल तक उपज
सिकंदर के मुताबिक अगर समय पर खाद, उर्वरक और जरूरी देखभाल की जाए तो एक क्विंटल बीज से करीब 10 से 15 गुना तक उपज मिल सकती है. यानी अच्छी परिस्थितियों में किसान को काफी बेहतर उत्पादन हासिल हो सकता है.
करीब 10 से 11 हजार रुपये तक आती है लागत
किसान के अनुसार टाऊ की खेती में लागत भी अपेक्षाकृत कम रहती है. एक क्विंटल बीज की कीमत करीब 4 हजार रुपये मानें तो इसके अलावा डीएपी समेत खाद, जुताई-कुड़ाई और अन्य खर्च मिलाकर करीब 10 से 11 हजार रुपये तक लागत आती है. किसान का कहना है कि सही उत्पादन होने पर करीब 50 हजार रुपये तक की कमाई संभव है.
तिब्बती शरणार्थियों ने मैनपाट में शुरू की थी खेती
टाऊ की खेती मैनपाट में नई नहीं है. किसान सिकंदर बताते हैं कि यहां टाऊ की खेती की शुरुआत तिब्बती शरणार्थियों द्वारा की गई थी. मैनपाट में मौजूद सात तिब्बती कैंपों के लोगों ने अपने देश से इसका बीज लाकर यहां इसकी खेती शुरू की थी. धीरे-धीरे स्थानीय किसानों ने भी इसे अपनाया और आज बड़ी संख्या में किसान इससे फायदा उठा रहे हैं.
20-25 साल से मैनपाट में हो रही खेती
सिकंदर के मुताबिक मैनपाट में टाऊ की खेती को करीब 20 से 25 साल हो चुके हैं. पहले स्थानीय लोग इसके बारे में ज्यादा नहीं जानते थे, लेकिन तिब्बती समुदाय द्वारा खेती शुरू किए जाने के बाद धीरे-धीरे इसका विस्तार हुआ.
धान से ज्यादा फायदे का दावा
किसान बताते हैं कि टाऊ की खेती में धान की तुलना में कई फायदे दिखाई देते हैं. बारिश के कारण धान की फसल में कीट और बीमारी का खतरा रहता है, जबकि टाऊ की फसल में बीमारी और कीट का प्रकोप अपेक्षाकृत कम देखने को मिलता है. इसी वजह से कुछ किसान अब धान की जगह टाऊ की खेती को प्राथमिकता दे रहे हैं.
मैनपाट से मुंबई, दिल्ली और कोलकाता तक डिमांड
टाऊ की मांग सिर्फ स्थानीय बाजार तक सीमित नहीं है. किसान के अनुसार मैनपाट से इसका उत्पादन मुंबई, कोलकाता और दिल्ली जैसे बड़े शहरों तक भेजा जाता है. इसका इस्तेमाल फलाहार में किया जाता है. बड़े मंदिरों और ट्रस्टों में भी फलाहार के रूप में इसकी मांग रहती है.
बुआई के समय मौसम का रखना पड़ता है खास ध्यान
टाऊ की बुआई करते समय मौसम का ध्यान रखना बेहद जरूरी है. किसान के मुताबिक अगर बीज डालने के तुरंत बाद बारिश हो जाए तो बीज के सड़ने का खतरा रहता है. इसलिए मौसम देखकर ही बुआई करने की सलाह दी जाती है.
अक्टूबर में खेतों में दिखने लगती है सफेद चादर
अक्टूबर में टाऊ के पौधे खेतों में दिखाई देने लगते हैं. किसान के अनुसार शुरुआती दौर में पौधा करीब 2 से 3 इंच का होता है और आगे चलकर यह लगभग ढाई से तीन फीट तक ऊंचा हो जाता है. इसमें सफेद फूल आने के बाद मैनपाट के खेत बेहद खूबसूरत नजर आते हैं. यहां आने वाले पर्यटक भी टाऊ के खेतों में तस्वीरें खिंचाते हैं.
फलाहार की मांग ने बढ़ाया बाजार
टाऊ की खेती को बढ़ावा मिलने की एक बड़ी वजह इसका फलाहार में इस्तेमाल होना भी है. धार्मिक आयोजनों, मंदिरों और बड़े ट्रस्टों में इसकी मांग रहती है. यही वजह है कि किसानों को स्थानीय बाजार के अलावा दूसरे राज्यों में भी इसका बाजार मिल जाता है.