Pradosh Vrat & Masik Shivratri Vrat Katha: आज गुरु प्रदोष व्रत और मासिक शिवरात्रि के व्रत का संयोग बन रहा है. ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है, जब प्रदोष व्रत और मासिक शिवरात्रि का व्रत एक ही दिन किया जाए. इस शुभ दिन पर प्रदोष काल में भगवान शिव की विधि विधान के साथ पूजा अर्चना करने के बाद कथा का पाठ करने का विशेष महत्व है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव की पूजा अर्चना करने के बाद कथा का पाठ करने और सुनने से व्रत पूर्ण माना जाता है और भगवान शिव के आशीर्वाद से ग्रहों के अशुभ प्रभाव से मुक्ति मिलती है. हमने इस आर्टिकल में गुरु प्रदोष व्रत की कथा और मासिक शिवरात्रि व्रत की कथा के बारे में बताया है. यहां पढ़ें संपूर्ण गुरु प्रदोष व्रत कथा और मासिक शिवरात्रि व्रत कथा…
गुरु प्रदोष व्रत कथा | Guru Pradosh Vrat Katha In Hindi
एक बार देवराज इंद्र और वृत्रासुर की सेना के बीच घनघोर युद्ध हुआ था. देवताओं ने दैत्य-सेना को पराजित कर नष्ट-भ्रष्ट कर डाला. यह देख वृत्रासुर अत्यन्त क्रोधित हो स्वयं युद्ध को उद्यत हुआ. आसुरी माया से उसने विकराल रूप धारण कर लिया. सभी देवता भयभीत हो गुरुदेव बृहस्पति की शरण में पहूंचे. बृहस्पति महाराज बोले- पहले मैं तुम्हे वृत्रासुर का वास्तविक परिचय दे दूं.
वृत्रासुर बड़ा तपस्वी और कर्मनिष्ठ है. उसने गन्धमादन पर्वत पर घोर तपस्या कर शिवजी को प्रसन्न किया. पूर्व समय में वह चित्ररथ नाम का राजा था. एक बार वह अपने विमान से कैलाश पर्वत चला गया. वहां शिवजी के वाम अंग में माता पार्वती को विराजमान देख वह उपहास पूर्वक बोला- हे प्रभो! मोह-माया में फंसे होने के कारण हम स्त्रियों के वशीभूत रहते हैं. लेकिन देवलोक में ऐसा दृष्टिगोचर नहीं हुआ कि स्त्री आलिंगनबद्ध हो सभा में बैठे.
चित्ररथ के यह वचन सुन सर्वव्यापी शिव शंकर हंसकर बोले- हे राजन! मेरा व्यावहारिक दृष्टिकोण पृथक है. मैंने मृत्युदाता कालकूट महाविष का पान किया है, फिर भी तुम साधारण जन की भांति मेरा उपहास उड़ाते हो!
माता पार्वती क्रोधित हो चित्ररथ से संबोधित हुई- अरे दुष्ट! तूने सर्वव्यापी महेश्वर के साथ ही मेरा भी उपहास उड़ाया है. अतएव मैं तुझे वह शिक्षा दूंगी कि फिर तू ऐसे संतों के उपहास का दुस्साहस नहीं करेगा, अब तू दैत्य स्वरूप धारण कर विमान से नीचे गिर, मैं तुझे शाप देती हूं. जगदम्बा भवानी के अभिशाप से चित्ररथ राक्षस योनि को प्राप्त हो गया और त्वष्टा नामक ऋषि के श्रेष्ठ तप से उत्पन्न हो वृत्रासुर बना.
गुरुदेव बृहस्पति आगे बोले- वृत्तासुर बाल्यकाल से ही शिव भक्त रहा है. अतः हे देवराज इंद्र तुम बृहस्पति प्रदोष व्रत कर भगवान महादेव को प्रसन्न करो. देवराज ने गुरुदेव की आज्ञा का पालन कर बृहस्पति प्रदोष व्रत किया. गुरु प्रदोष व्रत के प्रताप से इंद्र ने शीघ्र ही वृत्रासुर पर विजय प्राप्त कर ली और देवलोक में शांति छा गई.
बोले भगवान शिव की जय, माता पार्वती की जय
मासिक शिवरात्रि व्रत कथा | Masik Shivratri Vrat Katha In Hindi
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान सदाशिव अपने परमब्रह्म स्वरूप में थे. महाशिवरात्रि के दिन ही वे लिंग स्वरुप में प्रकट हुए थे. एक प्रकार से भगवान सदाशिव परमब्रह्म स्वरूप से साकार हुए थे. तब भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी ने शिवलिंग की प्रथम पूजा की थी. इस वजह से हर शिवरात्रि पर शिवलिंग की पूजा करते हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माता लक्ष्मी, सरस्वती, गायत्री, सीता, पार्वती तथा रति जैसी देवियों ने शिवरात्रि का व्रत शिव कृपा एवं अपने उद्धार के लिए किया था.
फाल्गुन माह की शिवरात्रि को महाशिवरात्रि कहते हैं. महाशिवरात्रि को ही भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था. सती के आत्मदाह के बाद काफी समय बीतने के पश्चात भगवान शिव और माता पार्वती का महाशिवरात्रि को महामिलन हुआ था. इस वजह से भी शिवरात्रि के दिन शिव पूजा का विधान है.