Crop Residue Management: पराली जला देते थे, अब उसी से बना रहे जैविक कोयला, मिट्टी के लिए बेहद काम की देसी तकनीक

Crop Residue Management: पराली जला देते थे, अब उसी से बना रहे जैविक कोयला, मिट्टी के लिए बेहद काम की देसी तकनीक


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पराली जलाने की जगह बना रहे जैविक कोयला, गड्ढे और पानी से तैयार हो रहा बायोचार

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Crop Residue Management: तेलंगाना के किसानों ने पराली और डंठल जैसी समस्या का एक बेहतरीन और टिकाऊ समाधान ढूंढ लिया है. किसान अब फसल कटाई के बाद बचने वाले सूखे अवशेषों को जलाने के बजाय गड्ढे में नियंत्रित तरीके से सुलगता कर ‘बायोचार’ यानी जैविक कोयला बना रहे हैं. बिना लागत के तैयार होने वाला यह बायोचार खेतों में डालने पर 20 से 50 साल तक मिट्टी की उर्वरता और नमी बनाए रखता है. यह तकनीक प्रदूषण रोकने के साथ-साथ कृषि कचरे को मूल्यवान संपदा में बदलने का सबसे कारगर तरीका बन गई है.

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तेलंगाना: फसल कटाई के बाद खेतों में बचने वाले अवशेषों के निपटारे को लेकर देश के कई हिस्सों में किसान अब एक नया और टिकाऊ तरीका अपना रहे हैं. तेलंगाना के ग्रामीण क्षेत्रों में कपास, मक्का और सोयाबीन की बड़े पैमाने पर खेती की जाती है. इन फसलों से दाना और मुख्य उपज निकालने के बाद खेतों में भारी मात्रा में सूखे डंठल और अवशेष बच जाते हैं. पहले किसान अगली फसल की बुवाई की जल्दबाजी में इन डंठलों को जलाकर राख कर देते थे. इससे न केवल पर्यावरण प्रदूषण भारी मात्रा में बढ़ता था, बल्कि मिट्टी के जरूरी पोषक तत्व भी पूरी तरह नष्ट हो जाते थे. लेकिन अब किसानों ने इसका एक बेहतरीन तोड़ निकाल लिया है और वे इन अवशेषों से बायोचार यानी जैविक कोयला बना रहे हैं.

फसल अवशेषों से बायोचार तैयार करने की पूरी प्रक्रिया बेहद सरल और बिना किसी लागत के है. फसल कटाई के बाद किसान सूखे डंठलों को इधर-उधर फेंकने के बजाय एक जगह इकट्ठा करते हैं. इसके बाद खेत में एक छोटा गड्ढा खोदा जाता है और उसमें यह सारा कृषि कचरा डाल दिया जाता है. इस कचरे में आग लगाई जाती है, लेकिन इसे खुले में तेजी से भड़कने और राख बनने से रोकने के लिए खास सावधानी बरती जाती है. इस दौरान उस पर लगातार पानी छिड़का जाता है ताकि कचरा केवल नियंत्रित रूप से सुलगता रहे. इस नियंत्रित प्रक्रिया के कारण अवशेष राख बनने के बजाय ठोस काले कोयले में बदल जाते हैं. इस प्रकार बिना किसी अतिरिक्त लागत के उपयोगी बायोचार तैयार हो जाता है.

मिट्टी की उर्वरता और नमी के लिए है बेहद फायदेमंद
तेलंगाना के खेतों की मिट्टी में बायोचार का उपयोग बेहद असरदार साबित हो रहा है. स्थानीय किसानों के अनुसार, यह जैविक कोयला जमीन के अंदर आसानी से नष्ट नहीं होता है. इसे एक बार खेत में डालने पर यह लगभग 20 से 50 वर्षों तक लगातार मिट्टी की उर्वरता और उपजाऊपन को बनाए रखता है. यह मिट्टी की अवांछित दुर्गंध को सोख लेता है और उसमें प्राकृतिक ताजगी व मजबूती लाता है. इसके अलावा, यह मिट्टी के अंदर लंबे समय तक नमी को बांधकर रखने की क्षमता रखता है, जिससे फसलों को सूखे से लड़ने में मदद मिलती है. बायोचार का यह शानदार इस्तेमाल अनाज, दलहन और सब्जियों सहित किसी भी तरह की खाद्य फसल के लिए किया जा सकता है.

कचरे को मूल्यवान संपदा में बदलने का कारगर विकल्प
हमारे गांवों में लकड़ी के कोयले का पुराना और ऐतिहासिक महत्व रहा है, जहां लोग पारंपरिक रूप से मंजन और अन्य दैनिक कार्यों में इसका उपयोग करते आए हैं. अब वही देसी कोयला किसानों के खेतों के लिए किसी वरदान से कम साबित नहीं हो रहा है. पराली और डंठल जलाने की गंभीर समस्या से जूझ रहे किसानों के लिए बायोचार तकनीक खेती के कचरे को एक मूल्यवान संपदा में बदलने का सबसे सुरक्षित और कारगर विकल्प बन चुकी है.



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