Dehradun News : कितने भी रईस की हों, इनके बिना अधूरी थीं शादियां, कौन होते हैं उत्तराखंड में मंग्ल्यौर?

Dehradun News : कितने भी रईस की हों, इनके बिना अधूरी थीं शादियां, कौन होते हैं उत्तराखंड में मंग्ल्यौर?


Last Updated:

What is Mangalyaur Uttarakhand : आजकल जब किसी पहाड़ी की शादी होती है तो समारोह से ऐसे गीत गायब रहते हैं जिन्हें कभी गाए बिना विवाह अधूरा सा लगता था. देहरादून जैसे शहरों में ये समस्या ज्यादा देखने को मिलती है. उत्तराखंड की लोक परंपरा में शुभ और मांगलिक मौकों पर गाए जाने वाले गीतों को मांगल गीत कहा जाता है. ये गीत मुख्य रूप से गढ़वाली में गाए जाते हैं. हालांकि क्षेत्र बदलने के साथ-साथ गीतों के शब्द और बोली में भी थोड़ा बदलाव आ जाता है. देहरादून का ‘जय मां भगवती ग्रुप’ पिछले 10 सालों से इन मांगल गीतों को संजोने में जुटा है.

देहरादून. उत्तराखंड के कई जेन जी अपनी संस्कृति के बारे में कम जानते हैं, खासकर ऐसे लोग जो मूल रूप से पहाड़ी हैं लेकिन पहाड़ में नहीं रहते. ऐसे युवाओं को दादी नानी के गीतों से कम वास्ता होता है. देहरादून जैसे शहर में आज जब किसी पहाड़ी की शादी होती है तो समारोह से वे गीत गायब रहते हैं जिन्हें कभी दादी-नानी गाया करती थीं. उत्तराखंड की लोक परंपरा में शुभ और मांगलिक मौकों पर गाए जाने वाले गीतों को मांगल गीत कहा जाता है. इन गीतों को प्रस्तुत करने वाले लोक कलाकारों को क्षेत्र में ‘मंग्ल्यौर’ के नाम से जाना जाता है. पारंपरिक रूप से ये गीत मुख्य रूप से गढ़वाली भाषा में गाए जाते हैं. हालांकि क्षेत्र बदलने के साथ-साथ गीतों के शब्द और बोल की शैली में भी थोड़ा बदलाव आ जाता है.

क्यों बचाना जरूरी

मांगल गीत केवल संगीत नहीं हैं, बल्कि यह दादी-नानी की पीढ़ी से मिला एक अनमोल सांस्कृतिक उपहार हैं. इन गीतों में समाज का आशीर्वाद, लोक देवी-देवताओं का आह्वान और परिवार की सुख-समृद्धि की भावनाएं छिपी होती हैं. आधुनिकता की दौर में इस धरोहर को जीवित रखना और नई पीढ़ी तक पहुंचाना हमारी लोक संस्कृति को बचाए रखने के लिए बेहद जरूरी हो गया है.

यहां मिल रहा नया जीवन

देहरादून का ‘जय मां भगवती ग्रुप’ पिछले 10 सालों से इन मांगल गीतों को संजोने और प्रसारित करने का कार्य कर रहा है. ग्रुप की कलाकार रिंकी लोकल 18 से बताती हैं कि पुराने समय की लोक भाषा काफी जटिल होती थी, इसलिए वे अब साधारण शब्दों का प्रयोग करती हैं. सरल और सुगम शब्दावली के कारण आज का आमजन और युवा वर्ग इन गीतों को आसानी से समझ पा रहा है. जय मां भगवती ग्रुप का यह प्रयास वेस्टर्न म्यूजिक और आधुनिक गीतों की ओर झुकी युवा पीढ़ी को पुनः पहाड़ी कल्चर से जोड़ने में मील का पत्थर साबित हो रहा है. देहरादून जैसे आधुनिक शहर में आयोजित होने वाले शादी-समारोहों में अब फिर से मांगल गीतों की गूंज सुनाई देने लगी है. मंग्ल्यौर महिलाओं का यह समर्पण हमारी विलुप्त होती लोक परंपरा को शहरों में एक नया जीवन दे रहा है.



Source link