Justice Ujjal Bhuyan on SIR Row: ‘वोट से वंचित लोग बन जाएंगे दूसरे दर्जे के नागरिक’ SIR पर घमासान के बीच जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की दो टूक

Justice Ujjal Bhuyan on SIR Row: ‘वोट से वंचित लोग बन जाएंगे दूसरे दर्जे के नागरिक’ SIR पर घमासान के बीच जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की दो टूक


वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर देश में चल रहे सियासी विवाद और विरोध प्रदर्शनों के बीच सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने मतदान के अधिकार को लेकर बेहद अहम टिप्पणी की है. उन्होंने कहा कि अगर किसी प्रक्रिया के कारण लाखों भारतीय नागरिक अपने वोट देने के अधिकार से वंचित हो जाते हैं और अपने ही देश में बिना मतदान अधिकार वाले ‘दूसरे दर्जे के नागरिक’ बन जाते हैं, तो ऐसी प्रक्रिया अपने आप में मनमानी होगी. उन्होंने साफ कहा कि इस तरह की स्थिति को किसी भी तरह के ‘अगर-मगर’ से सही नहीं ठहराया जा सकता.

जस्टिस भुइयां रविवार को हैदराबाद स्थित NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ में 19वीं NALSAR-जस्टिस बीआर साहनी मेमोरियल मूट कोर्ट प्रतियोगिता के समापन समारोह में बोल रहे थे. हालांकि उन्होंने अपने भाषण में चुनाव आयोग के SIR अभियान का नाम लेकर टिप्पणी नहीं की, लेकिन उनकी बात ऐसे समय आई है जब वोटर लिस्ट में बदलाव और कथित तौर पर बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने को लेकर चुनाव आयोग पर सवाल उठ रहे हैं.

‘संविधान दो तरह के नागरिकों की कल्पना नहीं करता’

जस्टिस भुइयां ने कहा कि भारतीय संविधान नागरिकों को दो वर्गों में नहीं बांटता- एक ऐसे नागरिक जिनके पास वोट देने का अधिकार है और दूसरे ऐसे नागरिक जिनके पास यह अधिकार नहीं है. उन्होंने कहा कि अगर किसी प्रक्रिया से बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक मतदान के अधिकार से वंचित होते हैं, तो यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 326 के खिलाफ होगा. अनुच्छेद 14 समानता के अधिकार से जुड़ा है, जबकि अनुच्छेद 326 लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों में वयस्क मताधिकार का आधार प्रदान करता है.

जस्टिस भुइयां ने यह भी कहा कि मतदान का अधिकार केवल चुनाव में वोट डालने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह नागरिक की लोकतांत्रिक भागीदारी का महत्वपूर्ण माध्यम है. उनके मुताबिक, किसी नागरिक को उसके मतदान अधिकार से अलग करना उसकी नागरिकता से उस अधिकार को अलग करने जैसा है.

‘नोटिस और सुनवाई के बिना नाम नहीं हटाया जा सकता’

जस्टिस भुइयां ने वोटर लिस्ट से नाम हटाने की प्रक्रिया में कानूनी सुरक्षा उपायों पर भी जोर दिया. उन्होंने 1995 के लाल बाबू हुसैन बनाम इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर मामले का हवाला देते हुए कहा कि किसी मृत मतदाता के मामले को छोड़कर मतदाता सूची में दर्ज नाम को बिना नोटिस और सुनवाई का अवसर दिए हटाया नहीं जाना चाहिए.

उन्होंने कहा कि अगर किसी प्रशासनिक प्रक्रिया का परिणाम बड़ी संख्या में लोगों को मतदान के अधिकार से बाहर करना है, तो ऐसी प्रक्रिया को संवैधानिक कसौटी पर परखा जाना चाहिए. उन्होंने जोर दिया कि अनुच्छेद 326 के साथ छेड़छाड़ नहीं की जा सकती और कोई भी प्राधिकरण संविधान से ऊपर नहीं है.

पूर्व जज रोहिंटन नरीमन ने भी जताई चिंता

इसी बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन ने भी चुनाव आयोग और मतदान के अधिकार को लेकर चिंता जताई है. 27 सितंबर को ‘The Constitution and the Common Man’ विषय पर अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि संविधान और लोकतंत्र का केंद्र आम नागरिक का वोट है और यह अधिकार गंभीर खतरे में है.

जस्टिस नरीमन ने मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में कार्यपालिका की भूमिका को लेकर सवाल उठाए. उन्होंने 2023 के उस कानून का भी जिक्र किया, जिसके तहत चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति वाली समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश की जगह केंद्र सरकार के एक मंत्री को शामिल किया गया है. उन्होंने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट से चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े कानून पर जल्द फैसला करने की उम्मीद जताई.



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