तुलसी की खेती से किसान बनेंगे मालामाल, कम लागत में होगी मोटी कमाई, पत्ती से लेकर बीज तक बिकेगा माल

तुलसी की खेती से किसान बनेंगे मालामाल, कम लागत में होगी मोटी कमाई, पत्ती से लेकर बीज तक बिकेगा माल


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तुलसी की खेती से किसान बनेंगे मालामाल, कम लागत में होगी मोटी कमाई

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Tulsi Farming: खंडवा में अब कुछ किसान पारंपरिक फसलों के साथ ऐसी फसलों की तरफ भी रुख कर रहे हैं, जिनकी मांग औषधीय और हर्बल उत्पादों में रहती है. इनमें तुलसी की खेती भी शामिल है. किसानों का कहना है कि तुलसी की खेती कम लागत में की जा सकती है और सही बाजार मिलने पर इससे अच्छी आमदनी हासिल हो सकती है.हालांकि जिले के कई किसान अभी तुलसी की खेती के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं रखते. उन्हें यह तक पता नहीं होता कि तुलसी की फसल बिकती कहां है, बीज कहां से मिलेगा और इसकी कटाई के बाद इसे किसे बेचना है. ऐसे में खेती शुरू करने से पहले फसल के साथ-साथ बाजार की जानकारी लेना भी जरूरी है. एक्सपर्ट से जानिए तुलसी की खेती का आसान तरीका और किन बातों का ध्यान रखकर किसान इसमें अच्छा मुनाफा हासिल कर सकते हैं.

तुलसी को औषधीय और व्यावसायिक फसल के तौर पर उगाया जाता है. इसके पत्तों का इस्तेमाल हर्बल उत्पादों और आयुर्वेदिक क्षेत्र में किया जाता है. कटाई के बाद पत्तियों को सुखाकर आगे प्रोसेसिंग के लिए भेजा जाता है, जबकि बीजों की भी अलग मांग हो सकती है. यही वजह है कि तुलसी की खेती शुरू करने से पहले किसान को यह पता कर लेना चाहिए कि उसकी फसल किस खरीदार, कंपनी या व्यापारी को बेचनी है. सीधे कंपनी या खरीददार से संपर्क होने पर किसान को बाजार की जानकारी पहले से मिल सकती है.

तुलसी की खेती के लिए गर्म और आर्द्र मौसम अनुकूल माना जाता है. करीब 20 से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान में पौधे की बढ़वार अच्छी हो सकती है. इसके लिए ऐसी जमीन बेहतर रहती है, जिसमें पानी की निकासी अच्छी हो. बलुई दोमट मिट्टी, जिसमें पर्याप्त जैविक पदार्थ मौजूद हों, तुलसी के लिए उपयुक्त मानी जाती है. खेत तैयार करने के लिए दो से तीन बार अच्छी जुताई करके पाटा चला दें, जिससे मिट्टी भुरभुरी हो जाए.

तुलसी की खेती के लिए एक हेक्टेयर क्षेत्र में करीब 750 ग्राम से 1 किलो तक बीज की जरूरत पड़ सकती है. बीज की मात्रा किस्म और बुवाई की विधि के अनुसार बदल सकती है. इसलिए प्रमाणित बीज लेते समय कृषि विशेषज्ञ या बीज विक्रेता से इसकी मात्रा की पुष्टि करना बेहतर रहेगा. कई किसान पहले नर्सरी में पौधे तैयार करते हैं. जब पौधे करीब 5 से 6 सप्ताह के हो जाएं, तब उन्हें खेत में लगाया जा सकता है. रोपाई करते समय कतार से कतार की दूरी करीब 40 से 60 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी करीब 30 सेंटीमीटर रखी जा सकती है.

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रोपाई के समय खेत में अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद का इस्तेमाल किया जा सकता है. करीब 15 टन प्रति हेक्टेयर सड़ी हुई गोबर की खाद का प्रयोग करने की सलाह दी जाती है. हालांकि, खाद की मात्रा खेत की मिट्टी और उसकी उर्वरता के आधार पर तय करना ज्यादा सही रहेगा. खेत में नमी बनाए रखना जरूरी है, लेकिन पानी जमा नहीं होना चाहिए. बरसात में मौसम के अनुसार सिंचाई की जरूरत कम हो सकती है, जबकि सूखे मौसम में मिट्टी की नमी देखकर पानी देना चाहिए.

तुलसी की फसल में समय पर कटाई भी काफी महत्वपूर्ण है. कटाई कब करनी है, यह किस्म और फसल के उपयोग पर निर्भर करता है. सामान्य तौर पर कटाई से कुछ दिन पहले सिंचाई रोकने की सलाह दी जाती है. दिए गए खेती प्रबंधन के अनुसार कटाई से करीब 10 दिन पहले सिंचाई बंद की जा सकती है, लेकिन स्थानीय मौसम और मिट्टी की स्थिति देखकर कृषि विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहतर रहेगा. कटाई के बाद पत्तियों को अच्छी तरह सुखाकर बाजार में भेजा जाता है. इसके अलावा बीजों को भी अलग करके बेचा जा सकता है. इस तरह किसान को फसल के अलग-अलग हिस्सों से बाजार बनाने का मौका मिल सकता है.

जहां सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है, वहां किसान ड्रिप सिस्टम का इस्तेमाल कर सकते हैं। इससे जरूरत के अनुसार पौधों तक पानी पहुंचाया जा सकता है और पानी की बचत में मदद मिल सकती है। खेत में खरपतवार की नियमित सफाई भी जरूरी है, ताकि पौधों की बढ़वार प्रभावित न हो.एक बार फसल अच्छी तरह तैयार होने के बाद इसकी पत्तियों की कटाई की जा सकती है. कुछ परिस्थितियों में दो से तीन महीने के अंतराल पर कटाई संभव होती है, लेकिन वास्तविक कटाई का समय किस्म, मौसम और फसल की स्थिति पर निर्भर करता है.

तुलसी की खेती में सबसे महत्वपूर्ण बात सिर्फ फसल उगाना नहीं, बल्कि उसे सही जगह बेचना है. किसान पहले यह जानकारी जुटाएं कि उनके क्षेत्र में तुलसी की खरीद कौन करता है, किस रूप में फसल ली जाती है, पत्तियों की मांग है या बीज की और भुगतान किस आधार पर किया जाता है.

खंडवा में किसान अगर खेती के साथ बाजार की इस कड़ी को समझकर आगे बढ़ते हैं तो तुलसी जैसी औषधीय फसल उनके लिए आय का एक अतिरिक्त जरिया बन सकती है. लेकिन खेती शुरू करने से पहले बीज, किस्म, स्थानीय जलवायु, लागत और संभावित खरीदार की पूरी जानकारी लेना जरूरी है. अच्छी खेती के साथ पक्के बाजार की तैयारी ही इस फसल से बेहतर आमदनी का आधार बन सकती है.



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