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Nautan Gandak Flood: पश्चिम चम्पारण के नौतन प्रखंड में गंडक नदी की बाढ़ से कई गांव जलमग्न हो गए हैं. नेपाल में हुई तेज बारिश के बाद बढ़े गंडक के जलस्तर ने लोगों के घर और सामान डुबो दिए. कई परिवार अब तटबंध पर तंबुओं में रहने को मजबूर हैं. तटबंध के आसपास पानी भरा होने से रात में सांप-बिच्छू और जहरीले जीवों का खतरा बना रहता है. लोगों को मवेशियों के साथ रहने और वहीं खाना पकाने में परेशानी हो रही है. बाढ़ में बच्चों की किताबें भी बह गई हैं. स्कूल भी पढ़ाई संचालित करने की स्थिति में नहीं हैं.
पश्चिम चम्पारण: बाढ़ में सिर्फ लोगों के आशियाने ही नहीं डूबते हैं. कंधे पर बस्ता लेकर और आंखों में उज्ज्वल भविष्य का सपना लेकर स्कूल जाने वाले बच्चों के सपने भी डूब जाते हैं. कुछ ऐसी ही तस्वीर जिले के नौतन प्रखंड से सामने आ रही है. यहां गंडक की तेज लहरों से आई बाढ़ के कारण गांव के गांव जलमग्न हो चुके हैं. नेपाल में हुई तेज बारिश और इसके कारण बढ़े गंडक के जलस्तर ने जब गांवों को डुबाना शुरू किया, तो आशियानों के साथ भविष्य की जमा पूंजी और बच्चों का भविष्य कही जाने वाली किताबें भी बह गईं.
तटबंध पर गुजर-बसर करने को मजबूर लोग
इस त्रासदी को चार दिन हो चुके हैं. लेकिन पीड़ितों को इसका प्रकोप लंबे समय तक झेलना पड़ सकता है. इस लेख में हम उन पीड़ितों की कहानी बता रहे हैं, जिनका सबकुछ गंडक की बाढ़ में खत्म हो चुका है. अब वे तटबंध पर ही दिन और रात बिताने को मजबूर हैं.
हर वक्त बना रहता है जान का खतरा
बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में रात के समय पहुंची लोकल 18 की टीम को पीड़ितों ने अपनी परेशानी बताई. उन्होंने कहा कि दिन तो किसी तरह कट जा रहा है. लेकिन रात गुजारना बेहद मुश्किल हो रहा है. जलमग्न हो चुके गांवों के लोग तटबंध पर रहकर जिंदगी गुजार रहे हैं. तटबंध के दोनों तरफ सीने से ऊपर तक पानी जमा है. सबसे भयावह स्थिति अंधेरा होने के बाद बनती है. अंधेरा होते ही सांप और बिच्छू समेत कई तरह के जहरीले जीव निकलने लगते हैं. इससे हर पल जान का खतरा बना रहता है.
सोने से लेकर खाना पकाने तक की परेशानी
इनसे बचने के लिए पूरी रात आग जलाकर रखनी पड़ती है. हर परिवार के किसी न किसी सदस्य को रात में जागना पड़ता है. पीड़ित नंदकिशोर सिंह बताते हैं कि बाढ़ प्रभावित सभी लोग तटबंध पर ही तंबुओं में गुजर-बसर कर रहे हैं. तटबंध पतला है. इसलिए सोने की जगह के पास ही मवेशियों को भी बांधकर रखना पड़ता है. परेशानी यहीं खत्म नहीं होती. मवेशियों के आसपास ही ईंटों का चूल्हा बनाकर खाना पकाना पड़ता है. इस दौरान सबसे अधिक परेशानी छोटे बच्चों को होती है.
बाढ़ में बह गईं बच्चों की पुस्तकें
चारों तरफ जलजमाव है. घरों का सामान बह चुका है. ऐसे में बच्चे पढ़ाई से भी वंचित हो गए हैं. उनके पास पढ़ने के लिए किताबें तक नहीं बची हैं. वहीं, विद्यालयों की स्थिति भी फिलहाल पढ़ाई संचालित करने लायक नहीं है. चिंता की बात यह है कि इस स्थिति से उबरने में लंबा समय लग सकता है. ऐसे में बड़े-बुजुर्गों के साथ बच्चों पर भी इसका बुरा असर पड़ने की आशंका है.