‘साहब मेरा बेटा है…’ पिता चिल्लाता रहा, पुलिस ने लावारिस लाश समझ किया अंतिम संस्कार, सुनिए परिवार का दर्द

‘साहब मेरा बेटा है…’ पिता चिल्लाता रहा, पुलिस ने लावारिस लाश समझ किया अंतिम संस्कार, सुनिए परिवार का दर्द


बलिया: जिले से पितृपक्ष में एक बेहद मार्मिक कहानी सामने आई है. हाथ में कागजों से भरी फाइल, सीने से लगी 12 साल के बेटे रजत की तस्वीर और पीछे बिलखती मां. पितृपक्ष में जब लोग अपने पुरखों को जल दे रहे थे, बलिया का एक पिता घाघरा किनारे अपने बेटे का पुतला बनाकर उसकी चिता सजा रहा था. लकड़ी, कुश और फूलों के बीच कांपते हाथों से पिता ने आग लगाई तो दर्द सिर्फ इतना नहीं था कि बेटा दुनिया में नहीं रहा. टीस यह भी थी कि जिस शव को वह अपना बेटा बताकर मांगता रहा, उसे कथित तौर पर लावारिस मानकर अंतिम संस्कार कर दिया गया.

मनियर थाना क्षेत्र के कोटवा, पोस्ट मुड़ियारी निवासी अखिलेश कुमार मिश्रा के मुताबिक, उनका 12 वर्षीय बेटा रजत मिश्रा 13 मई 2025 की शाम करीब 7:30 बजे लापता हो गया. परिवार रातभर उसे तलाशता रहा. पुलिस को सूचना दी गई और खोजबीन शुरू हुई. पिता का कहना है कि रजत के साथ रहने वाले एक लड़के से भी पूछताछ हुई, लेकिन बेटे का पता नहीं चला.

परिवार को बेटे के वापसी की उम्मीद
15 मई को नदी किनारे एक शव मिला. अखिलेश का दावा है कि उन्होंने शव देखकर पुलिस से कहा था, यह मेरा बेटा है. लेकिन कथित तौर पर उन्हें बताया गया कि शव किसी अधिक उम्र के युवक का है और नदी में बहकर आया है. पोस्टमार्टम में भी उम्र करीब 20 वर्ष और वजन लगभग 65 किलो बताए जाने की बात पिता कहते हैं. इसी भरोसे में परिवार उम्मीद लगाए रहा कि शायद रजत कहीं जीवित मिल जाए.

डीएनए रिपोर्ट में हुआ खुलासा
वहीं अखिलेश ने उस शव का डीएनए परीक्षण कराने की मांग नहीं छोड़ी. माता-पिता के नमूने लिए गए. करीब छह महीने बाद आई डीएनए रिपोर्ट ने परिवार की बची हुई उम्मीद भी तोड़ दी. पिता के अनुसार, उन्हें बताया गया कि डीएनए उसी शव से मैच हो गया है. यानी जिस शव को वह अपना बेटा बताकर मांग रहे थे, वह रजत का ही था. उस समय के मनियर थानाध्यक्ष की बड़ी लापरवाही सामने आई है. इसके अलावा हर जगह से इस पिता को अन्याय मिला है.

पुतले को बेटा मानकर किया अंतिम संस्कार
अखिलेश का आरोप है कि इसके बाद उन्होंने पुलिस अधिकारियों से लेकर अन्य स्तरों तक न्याय की गुहार लगाई. उनका यह भी दावा है कि उन्हें और गवाहों को धमकियां मिलीं और जांच को लेकर उनकी कई शिकायतें हैं. इन आरोपों पर पुलिस पक्ष सामने आना जरूरी है. अब पिता के पास बेटे की देह नहीं है, सिर्फ तस्वीर, दस्तावेजों की मोटी फाइल और अनगिनत सवाल हैं. इसलिए पितृपक्ष में उन्होंने पुतले को ही अपना रजत मानकर अंतिम संस्कार किया.

कब खुलेगा बेटे की मौत का सच?
चिता की लपटें उठीं, लेकिन सवाल नहीं जले, रजत नदी तक कैसे पहुंचा. उसकी मौत कैसे हुई. शव की पहचान में इतनी बड़ी चूक कैसे हुई और यदि डीएनए उसी बच्चे का था, तो पिता को अपने बेटे का अंतिम संस्कार करने का अधिकार क्यों नहीं मिल सका. एक मजबूर पिता ने परंपरा निभाने के लिए पुतले को मुखाग्नि दे दी, लेकिन बेटे की मौत का सच जानने की उसकी लड़ाई अभी बाकी है.



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