हो जाओगे बर्बाद…पितृ पक्ष में लोहे का दान महापाप क्यों? पंडित जी से जानिए
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Pitru Paksha Rituals : इन दिनों पितृ पक्ष चल रहा है. ये समय पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता, श्रद्धा और आत्मिक तर्पण को समर्पित माना जाता है. इस दौरान अपने पितरों को प्रसन्न करने के लिए पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध कर्म किया जाता है. इससे नाराज पितृ तृप्त हो जाते हैं और अपने वंशजों को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं. हालांकि लोहे से बनी किसी भी वस्तु का उपयोग करना या दान करना पूर्णत: वर्जित है, लेकिन ऐसा क्यों है. लोकल 18 ने इस बारे में हरिद्वार के नारायणी शिला के मुख्य पुजारी पंडित मनोज त्रिपाठी से बात की. पंडित मनोज त्रिपाठी बताते हैं कि अगर कोई व्यक्ति पितृ पक्ष में लोहे के बर्तनों में भोजन बनाता है या खाना परोसता है या लोहे की वस्तुओं, बर्तन आदि का दान करता है तो पितृ नाराज हो जाते हैं.
हरिद्वार. हिंदू धर्म में भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक चलने वाले पितृ पक्ष को पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता, श्रद्धा और आत्मिक तर्पण का पावन समय माना जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन दिनों में अपने पितरों को प्रसन्न करने के लिए पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध कर्म किया जाता रहा है, जिससे नाराज पितृ तृप्त हो जाते हैं और अपने वंशजों को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं. शास्त्रों में इसके लिए नियमों पर जोर दिया गया है. कई बार अनजाने में साधारण त्रुटियां भी फल को निष्प्रभावी कर देती हैं. मुख्य रूप से धातुओं के चयन को लेकर हिंदू परंपरा में कड़े विधान बनाए गए हैं. पितृ पक्ष में एक धातु का स्पर्श पूरे कर्म को प्रभावित कर सकता है.
होने लगेंगी दिक्कतें
हरिद्वार के नारायणी शिला के मुख्य पुजारी पंडित मनोज त्रिपाठी लोकल 18 से बताते हैं कि पितृ पक्ष के दौरान लोहे से बनी किसी भी वस्तु का उपयोग करना और दान करना पूर्णत: वर्जित है. ज्योतिष शास्त्र में लोहे को शनि और राहु का कारक ग्रह माना जाता है. लोहा तामसिक ऊर्जा और नकारात्मकता का प्रतिनिधित्व करता है. पितृ कर्म एक पवित्र अनुष्ठान है जिनमें पितरों की आराधना देव रूप में की जाती है. लोहे की प्रकृति तामसिकता से जुड़ी हुई मानी गई है. अगर कोई व्यक्ति पितृ पक्ष में लोहे के बर्तनों में भोजन बनाता है या खाना परोसता है या लोहे की वस्तुओं, बर्तन आदि का दान करता है तो पितृ नाराज हो जाते हैं. इससे जीवन में कई प्रकार के कष्ट और पितृ दोष की समस्याएं पैदा हो जाती हैं.
तब क्या करें
पंडित मनोज त्रिपाठी कहते हैं कि मान्यताओं के अनुसार श्राद्ध, पिंडदान, तर्पण आदि के समय लोहे के बर्तनों का प्रयोग करने से खाना और जल दूषित हो जाते हैं. इस प्रकार दूषित अन्न-जल को पितृ स्वीकार नहीं करते और नाराज होकर अपने लोक लौट जाते हैं. पितरों की शांति के लिए केवल तांबा, पीतल, चांदी, कांसे जैसी शुद्ध धातुओं के पात्र का ही प्रयोग करना चाहिए. इन पावन धातुओं से किया गया तर्पण ही पूर्वजों को तृप्ति करके जातक को अक्षय पुण्य फल प्रदान करता है.