उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का आपसी झगड़ा बढ़ता ही जा रहा है. खासकर सीट शेयरिंग के मसले पर कांग्रेस की ओर से हर रोज नये-नये बयान आ रहे हैं. मंगलवार को कांग्रेस के यूपी प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने न्यूज एजेंसी ANI के साथ बातचीत में स्पष्ट तौर पर कहा कि कांग्रेस किसी भी सूरत में 150+ सीटों से कम पर नहीं लड़ेगी. बीतचीत के दौरान कुछ ही सीटों पर कंप्रोमाइज किया जा सकता है. उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस की 403 सीटों पर तैयारी है. इससे पहले सोमवार को सहारनपुर से कांग्रेस के साथ इमरान मसूद ने दोहराया कि बिना राहुल गांधी के नेतृत्व के अखिलेश यादव या उनकी पार्टी बीजेपी का सामना नहीं कर पाएगी और 2027 में 2022 से कुछ भी अलग रिजल्ट नहीं आएंगे.
इन पांच जिलों को लेकर फंसा है सपा-कांग्रेस पेच
इन तमाम बयानबाजी के बीच सवाल मीडिया में खबरें छनकर आ रही हैं कि कांग्रेस और सपा के बीच सहारनपुर, रायबरेली, अमेठी, बाराबंकी और सीतापुर समेत पांच जिलों को लेकर असली झगड़ा है.
सहारनपुर से शुरू हुई सबसे बड़ी खींचतान
रायबरेली और अमेठी क्यों बने अहम?
हालांकि बाद में ऊंचाहार के विधायक डॉ. मनोज कुमार पांडेय और गौरीगंज के विधायक राकेश प्रताप सिंह राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग करने के बाद बीजेपी में चले गए थे. सपा इन सीटों को भी 2027 में खुद लड़ना चाहती है. वहीं कांग्रेस इन्हें अपने पारंपरिक प्रभाव वाले क्षेत्र के रूप में देख रही है. रायबरेली का महत्व इसलिए भी बढ़ गया क्योंकि अखिलेश यादव ने अपना पीडीए रथ अभियान भी यहीं से शुरू किया है.
बाराबंकी और सीतापुर में भी अलग-अलग दावे
बाराबंकी में कांग्रेस सांसद तनुज पूनिया का क्षेत्र होने के कारण पार्टी यहां कम से कम तीन सीटों की दावेदारी कर रही है. दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी का दावा है कि उसकी तैयारी जिले की सभी छह विधानसभा सीटों पर मजबूत है. सीतापुर में भी तस्वीर अलग नहीं है. यहां कांग्रेस सांसद राकेश राठौर संभावित उम्मीदवारों के नाम तक घोषित कर चुके हैं. बताया जा रहा है कि कांग्रेस 4 से 5 सीटों की मांग कर रही है. सपा 1 या 2 सीटें देने के पक्ष में दिख रही है.
दोनों दलों की सीटों को लेकर क्या चर्चा है?
राजनीतिक चर्चाओं के मुताबिक दोनों दलों के बीच सीटों की संख्या को लेकर भी अलग-अलग सोच सामने आ रही है.
- कांग्रेस की चर्चा वाली मांग: 105–115 सीटें
- सपा की चर्चा वाली सीमा: 85–90 सीटें
- हालांकि, अंतिम फैसला अभी सार्वजनिक नहीं हुआ है.
सबसे बड़ी परीक्षा सीट शेयरिंग की
यूपी 2027 से पहले सबसे बड़ा सवाल यही है कि समझौते की स्थिति में किसे ज्यादा समायोजन करना पड़ेगा. क्या सपा अपनी जीती हुई सीटों पर लचीलापन दिखाएगी, या कांग्रेस अपने दावे में बदलाव करेगी? सीट शेयरिंग पर अंतिम सहमति आने तक इन पांच जिलों की तस्वीर पर सभी की नजर बनी रहेगी.
कांग्रेस को मनमानी सीटें देने पक्ष में क्यों नहीं है सपा?
दरअसल, 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और सपा अलग-अलग लड़े थे. प्रियंका गांधी के खुद अगुवाई करने के बाद भी कांग्रेस के केवल 2 विधायक जीत पाए थे. वहीं समाजवादी पार्टी ने सुभासपा, आरएलडी जैसे छोटे दलों के साथ गठबंधन में 347 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे. इसमें से 111 सीटों पर समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार जीते थे और 223 सीटों पर नंबर दो पर रहे थे.
इसमें से करीब 50 सीटें ऐसी हैं जहां सपा उम्मीदवार 5000 से कम वोटों से हारे थे. इस तरह समाजवादी पार्टी 334 सीटों पर अपनी मजबूती का दावा कर रही है. ऐसे में केवल 69 ऐसी सीटें बचती हैं जिसे वह आसानी से कांग्रेस को देने के लिए तैयार हैं. सपा की तरफ से कहा जा रहा है कि कांग्रेस का संगठन राज्य में इतना मजबूत नहीं है कि उनके लिए अपनी मजबूती वाली सीटें उनके लिए छोड़ी जाए. यह भी कहा जा रहा है कि सपा चाहती है कि 2024 के लोकसभा चुनाव की तर्ज पर 2027 में भी कांग्रेस को जो भी सीटें आवंटित हो, अगर उनके पास मजबूत उम्मीदवार नहीं हैं तो वहां सपा के नेता को कांग्रेस के सिंबल पर चुनाव में उतारा जाए.
बिहार का भी दिया जा रहा उदाहरण
इस चर्चा के बीच बिहार का उदाहरण भी सामने आ रहा है. वहां कांग्रेस और आरजेडी के बीच सीट बंटवारे पर सहमति बनने से पहले कुछ सीटों पर दोनों दलों ने चुनाव लड़कर उसे फ्रेंडली फाइट का नाम दिया था. अब यूपी में भी सीट शेयरिंग की बातचीत को इसी नजरिए से देखा जा रहा है. 2017 में भी सपा ने कांग्रेस को 205 सीटें दी थी, लेकिन राहुल गांधी की पार्टी ने 2014 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार दिए थे. इन दोनों मौकों पर कांग्रेस की वजह से गठबंधन को काफी नुकसान देखा गया था.