नियोग ब्राह्मण समुदाय का वीर्य बेचने का धंधा था? देवदत्त पटनायक के पोस्ट पर क्यों मचा है बवाल

नियोग ब्राह्मण समुदाय का वीर्य बेचने का धंधा था? देवदत्त पटनायक के पोस्ट पर क्यों मचा है बवाल


प्राचीन वैदिक और महाभारत काल में महिलाएं बिना पति के बच्चा पैदा कर सकती थीं. इसके लिए उन्हें दूसरे पुरुष के साथ संसर्ग यानी संबंध बनाने की अनुमति थी. हालांकि इसका उद्देश्य सिर्फ वंश की रक्षा करना था. इसके लिए कुछ धार्मिक, सामाजिक और नैतिक नियम तय किए गए थे, जिसे नियोग प्रथा नाम दिया गया था. धृतराष्ट्र और पांडु भी इसी नियोग प्रथा से पैदा हुए थे.

बाद में द्रोणाचार्य समेत पांडव भी इसी नियोग प्रथा से पैदा हुए. ऋग्वेद और बाद के वैदिक ग्रंथों में इसका जिक्र मिलता है. अब इसी नियोग प्रथा पर लेखक देवदत्त पटनायक की पोस्ट ने बवाल मचा दिया है. पोस्ट में उन्होंने लिखा है कि ब्राह्मण अपना वीर्य बेचकर पैसे कमाते थे. उन्होंने इसकी तुलना सेक्स वर्क से की है.

क्या थी नियोग प्रथा?

नियोग प्रथा उस प्रक्रिया को कहते थे, जब पति के मर जाने या संतान पैदा करने में असमर्थ होने की स्थिति में महिला किसी दूसरे योग्य पुरुष से संतान प्राप्त करती थी. इसका सबसे बड़ा नियम ये था संतान चाहे जिस व्यक्ति की हो, लेकिन उस पर अधिकार सिर्फ महिला के पति का ही होता था. सबसे खास बात ये थी कि इस प्रक्रिया से पहले महिलाओं की लिखित या मौखिक सहमति जरूरी होती थी. महाभारत में पांडवों की परदादी से इसकी शुरुआत हुई थी.

महाभारत कथा के मुताबिक रानी सत्यवती पर जब राजा शांतनु रीझ गए और उनसे शादी करनी चाही तो पिता ने शर्त ली थी कि सत्यवती से पैदा संतान ही राजगद्दी पर बैठेगा. ऐसे में शांतनु के पुत्र भीष्म को प्रतिज्ञा करनी पड़ी कि वह आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करेंगे. दरअसल पहले शांतनु को भी पता नहीं था कि सत्यवती ने युवावस्था में महान ऋषि पराशर से संतान पैदा की है. जो नियोग प्रथा से हुई थी. इसी संतान का नाम वेदव्यास था जो महाभारत के रचयिता बने. कुंती ने कर्ण को भी इसी प्रथा से जन्म दिया था. बाद में उन्हें नदी में बहा दिया था.

देवदत्त पटनायक ने पोस्ट में क्या लिखा?

देवदत्त पटनायक ने पोस्ट में लिखा है कि जब किसी महिला की कोई संतान नहीं होती थी, तो वह देवताओं यानी ब्राह्मणों – के पास जाती थी. वे इसलिए आते थे क्योंकि उन्हें खाना, कपड़े और गाय देने का वादा किया जाता था. वे महिला को बच्चा पैदा करने में मदद करते थे.

बच्चे पर उनका कोई अधिकार नहीं होता था, ठीक वैसे ही जैसे प्रजनन के लिए सांड देने वाले व्यक्ति का किसान की गाय से पैदा हुए बछड़े पर कोई अधिकार नहीं होता. कोई भी खेत में बीज बो सकता है, लेकिन फसल खेत के मालिक की होती है. इसलिए पांडव पांडु की संतान हैं, भले ही उनके पिता देवता हों. यहाँ तक कि पांडु के पिता भी आधिकारिक तौर पर विचित्रवीर्य ही हैं, भले ही उनकी मां को ब्राह्मण व्यास ने गर्भवती किया हो. इसे नियोग कहा जाता है. बाद में, पुत्र-वधू (बेटे की पत्नी) कुल-वधू (कुल की पत्नी) बन गई, ताकि वह ब्राह्मणों को बुलाने बजाय अपनी ही जाति के पुरुषों के पास जा सके.

देवदत्त पटनायक का पोस्ट (सोर्स- FB)

11वीं सदी के कश्मीर में लिखे गए सोमदेव के कथासरित्सागर में एक व्यापारी की बेटी की कहानी है, जिसकी शादी एक मरणासन्न चोर से हुई थी. वह एक रात के लिए एक गरीब ब्राह्मण छात्र को पाँच सौ सोने के सिक्के देती है ताकि चोर का बेटा हो सके. विक्रम फैसला सुनाते हैं कि बच्चा चोर का है. ब्राह्मण ने पैसे ले लिए थे, इसलिए उसका दावा वहीं खत्म हो गया.

केरल में यह व्यवस्था सिर्फ़ कहानी नहीं रही, बल्कि बाकायदा वेतन वाली नौकरी बन गई. केरल-उत्पत्ति का दावा है कि परशुराम ने यह जमीन नंबूदरी ब्राह्मणों को दी थी. ब्राह्मण परिवार का केवल सबसे बड़ा बेटा ही अपनी सामाजिक स्थिति वाली महिला से शादी करता था, और छोटे भाई नायर परिवारों (जहाँ वंश माँ से चलता था) में ‘संबंधम’ बनाते थे, ताकि उनके बच्चे ब्राह्मणों की संपत्ति पर कोई दावा न कर सकें. कोचीन महल में, राजकुमारियों को गर्भवती करने के लिए बुलाए गए ब्राह्मण पुरुषों को छह से आठ रुपये का वजीफा दिया जाता था.
(ये पोस्ट का एक हिस्सा है…. )

पोस्ट पर क्यों मचा बवाल?

देवदत्त पटनायक की इस पोस्ट पर तरह-तरह के कमेंट आ रहे हैं. कोई इस पर आपत्ति जता रहा है तो कोई इसके समर्थन में हैं. एक यूजर ब्रजेश भट्ट ने पटनायक पर निशाना साधा है. उन्होंने पोस्ट के कमेंट में लिखा है कि इतिहास के चुनिंदा प्रसंगों को सनसनीखेज तरीके से परोसकर ब्राह्मण समाज को कटघरे में खड़ा करना विद्वता नहीं, वैचारिक पूर्वाग्रह का प्रदर्शन है.

सुनील दुबे नाम के एक यूजर ने पटनायक से सबूत मांगा तो है अर्पण जोशी का कहना है कि धर्मग्रथ की कथाओं के आधार पर अंदाजे से लिख रहे हैं ताकि वाहवाही हो सके.

नरेश व्यास नाम के एक यूजर ने लिखा है कि- क्यों क्या तब ब्राह्मण ही सक्षम थे दूसरो में क्षमता नहीं थी क्या? विक्रम भोंसले ने भी यही सवाल उठाया है.

उमा सहादेव सिन्हा ने लिखा है कि हे भगवान इन कड़वे सच से बहुत कम लोग ही परिचित होंगे. हर समाज और संस्कृति में ऐसी ही बहुत सी बातें हैं जिन्हें अभी शर्मिंदगी का सबब समझा जाएगा पर किसी जमाने में यह समाज की जरूरत रही होगी. बी कूल आज की कई बातें पांच सौ हजार साल बाद हंसी का कारण बन सकते हैं.

राजेश निंबालकर ने लिखा है कि- कब तक कब तक जातिगत विशेषताएं जातिगत परंपरा, अन्याय पर कलम चलती रहेगी? कुरीतियों पर प्रहार या इतिहास में देखना सही होगा. किंतु कोई मीडिया, कोई लेखक,कोई ब्लॉगर कभी आर्थिक उत्थान की बात नही करता. सेमी कंडक्टर चिप या मदर बोर्ड सर्किट की तकनीक न जानने वाले देश मे न जाने कितनी अस्मिताओं का अभिमान है.

पंकज त्रिवेदी नाम के यूजर ने लिखा है कि- यह सब प्रामाणिक नहीं पर रोचक है आपके लिखे पोस्ट की भाषा हिंदी में बनाई गयी है यह तब ज्यादा प्रामाणिक होता जब यह सब लिखा मूल भाषा और हिंदी दोनों में एक साथ इस पोस्ट पर होता? पर नहीं है प्रमाण यदि न हो तो विवाद होता है और विवाद से ही व्यक्ति प्रसिद्धि पाता है सही है न?



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