क्या भारत में हायर एजुकेशन सिस्टम सुरक्षित नहीं है? क्या हमारे देश में हायर एजुकेशन सिस्टम पर ‘अटैक’ लगातार बढ़ रहे हैं? ये कुछ असहज करने वाले सवाल हैं जो स्कॉलर्स एट रिस्क (SAR) की ताजा रिपोर्ट ने खड़े किए हैं. 15 सितंबर को SAR ने अपनी रिपोर्ट “फ्री टू थिंक 2026” जारी की है, जिसमें कहा गया है कि 1 जुलाई 2025 से 30 जून 2026 के बीच भारत में हायर एजुकेशन पर 42 “हमले” दर्ज किए गए हैं. ये रिपोर्ट गंभीर सवाल तो पैदा करती है. इस रिपोर्ट के आंकड़े पहली नजर में देखने पर ये बताते हैं कि भारत में उच्च शिक्षा की पूरी पिक्चर सिर्फ ‘सुंदर’ और ‘प्रगतिशील’ नहीं है. लेकिन सच तो ये है कि ये आंकड़े भारतीय उच्च शिक्षा की पूरी तस्वीर नहीं बताते.
रिपोर्ट बताती है कि ‘अटैक’ के ये मामले 59 देशों में सबसे ज्यादा हैं. ये आंकड़े जिस पैमाने और तरीके से पेश किए गए हैं, वो वैश्विक स्तर पर भारत की एजुकेश्नल फ्रीडम पर बड़ा सवाल खड़ा करते हैं और उसे गंभीर संकट में दिखाते हैं. लेकिन सच ये नहीं है. बल्कि SAR की पद्धति को ध्यान से देखने पर इसकी तस्वीर कुछ अलग निकलती है.
“हमला” या ‘अटैक’ आखिर है क्या?
“अटैक” काफी बड़ा और गंभीर शब्द है. इसके साथ हिंसा, उत्पीड़न और जबरदस्ती चुप कराने की स्थिति नजर आती है. Firstpost की रिपोर्ट बतताी है कि इस रिपोर्ट में “अटैक” की श्रेणी जानबूझकर बहुत व्यापक रखी गई है. इसमें ‘अटैक’ के मामलों में हिंसा और कैद किए जाने जैसी गंभीर घटनाओं से लेकर किसी को पद से हटाए जाना या ‘अन्य’ घटनाओं तक को शामिल किया गया है. यानी 42 ‘हमले’ क्या सभी हिंसात्मक हैं, या ये ‘अटैक’ भारत में अकादमिक स्वतंत्रता को सही से नहीं मापते हैं. SAR ने तो 42 का आंकड़ा दर्ज किया है, उनमें से ज्यादातर घटनाएं प्रशासनिक फैसले, अकादमिक कार्यक्रमों पर रोक, कैंपस विवाद या डिसिप्लेनरी एक्शन वाली कार्रवाई हैं.
ये रिपोर्ट अहम है और इसके आंकड़े जरूरी और गंभीर हालात दिखाते हैं, लेकिन ये एक अधूरी तस्वीर पेश करते हुए भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को धूमिल करने की भी भरपूर कोशिश करते हैं. भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था बहुत बड़ी है. शिक्षा मंत्रालय के ताजा आंकड़े बताते हैं कि देश में 1,213 विश्वविद्यालय, 46,624 कॉलेज और 12,543 स्वतंत्र उच्च शिक्षा संस्थान हैं. इतने बड़े सिस्टम में 42 घटनाएं एक बड़ा आंकड़ा नहीं है. ये आंकड़े ‘अटैक’ के मामलों में 56 देशों से भारत को आगे तो पहुंचा देते हैं पर क्या उन देशों में भी शिक्षा का इतना ही बड़ा तंत्र है? क्या ये आंकड़े प्रति विश्वविद्यालय, प्रति संस्थान या प्रति शिक्षक-छात्र संख्या कितनी घटनाएं हुईं जैसे सवाल पर बात करते हैं, तो इसका जवाब है नहीं. अगर कोई रिपोर्ट राष्ट्रीय अकादमिक माहौल की तुलना करना चाहती है, तो ऐसे आनुपातिक माप और गंभीरता का आकलन जरूरी है.
क्या ‘रेग्युलेशन’ और ‘दमन’ एक ही चीज हैं?
SAR की ये रिपोर्ट राज्य की बढ़ती रेग्युलेशंस पर भी चिंता जताती है, जैसे विश्वविद्यालय शासन, कुलपति नियुक्ति और अनुबंधित शिक्षकों से जुड़े बदलाव. सरकारें सार्वजनिक विश्वविद्यालयों को फंड देती हैं, कानून बनाती हैं और नियुक्ति, वित्त व प्रशासन के नियम तय करती हैं. किसी राज्य को यूनीवर्सिटिज के संचालन में कितना कंट्रोल रखना चाहिए, कितने रेग्युलेशन लगाने चाहिए, ये नीति का विवाद है और इसपर चर्चा हो सकती है. लेकिन यूनीवर्सिटिज पर हो रहा राज्यों का रेग्युलेशन क्या ‘अटैक’ है या ‘दमन’ है ये मान लेना गलत है. क्योंकि किसी विश्वविद्यालयों के लिए रेग्युलेशन तय करना और विश्वविद्यालयों को यह बताना कि वे क्या सोच सकते हैं, इन दोनों बातों में जमीन-आसमान का अंतर है. पहला काम दुनिया के हर लोकतांत्रिक देश में होता है. जबकि दूसरा काम एजुकेशन सिस्टम की फ्रीडम पर गंभीर हमला है. इन दोनों बातों को एक तराजू में नहीं तोला जा सकता.
किसी भी घटना को किसी ‘श्रेणी’ में डालकर आंकड़ा तैयार करना एक सही पद्धति नहीं है. ऐसी रिपोर्ट्स में जरूरी हो जाता है कि इन घटनाओं के पीछे की गंभीरता, किसी देश का एजुकेशन सिस्टम कितना बड़ा है जैसे फेक्टर भी काफी मायने रखते हैं.