2 साल तक जमीन के अंदर रहते हैं ठाकुर देव, सदियों पुरानी परंपरा का गवाह है गतौरा का बीदर त्योहार

2 साल तक जमीन के अंदर रहते हैं ठाकुर देव, सदियों पुरानी परंपरा का गवाह है गतौरा का बीदर त्योहार


बिलासपुर. छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के मस्तूरी विकासखंड के गतौरा गांव में हर दो साल में एक बार अनोखा बीदर त्योहार मनाया जाता है. यह सिर्फ पूजा-पाठ का आयोजन नहीं बल्कि गांव की वर्षों पुरानी परंपरा, आस्था और सामाजिक एकता से जुड़ा त्योहार है. करीब 12000 की आबादी वाले इस गांव में अलग-अलग समाज और समुदाय के लोग मिलकर गांव के देवी-देवताओं की पूजा करते हैं. गांव के प्रवेश पर स्थित ठाकुर देव की पूजा इस त्योहार का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होती है. स्थानीय परंपरा के अनुसार, ठाकुर देव को करीब दो साल तक जमीन के अंदर रखा जाता है और बीदर त्योहार के अवसर पर बैगा द्वारा उन्हें बाहर निकालकर विधि-विधान से पूजा की जाती है. इसके बाद पूरे गांव के लोगों को दर्शन कराया जाता है. त्योहार के दौरान गांव में घर-घर मेहमान पहुंचते हैं और पूरा गांव उत्सव के माहौल में नजर आता है.

गतौरा गांव में बीदर त्योहार की तैयारी करीब 15 दिन से एक महीने पहले शुरू हो जाती है. गांव के अलग-अलग समाज के लोग बैठक कर पूजा की तारीख और पूरी व्यवस्था तय करते हैं. इसके बाद शुभ तिथि पर ग्रामीण बाजे-गाजे के साथ रैली के रूप में ठाकुर देव के स्थान तक पहुंचते हैं. गांव में मौजूद अलग-अलग देवी-देवताओं और मंदिरों की साफ-सफाई, लिपाई-पुताई और पूजा-अर्चना की जाती है. ग्रामीणों की मान्यता है कि देवी-देवता गांव की सुरक्षा और सुख-समृद्धि से जुड़े हैं, इसलिए दो साल में कम से कम एक बार सभी देवस्थलों की विशेष पूजा की जाती है.

जमीन के अंदर रहते हैं ठाकुर देव
बीदर त्योहार में ठाकुर देव की परंपरा सबसे खास मानी जाती है. आचार्य विद्याधर पांडे के अनुसार, ठाकुर देव को पूजा के बाद जमीन के अंदर स्थापित किया जाता है और करीब दो साल तक वहीं रखा जाता है. बीदर त्योहार के समय बैगा द्वारा उन्हें बाहर निकाला जाता है. इसके बाद विधि-विधान से पूजा होती है और ग्रामीणों को ठाकुर देव के दर्शन कराए जाते हैं. पूजा के बाद उन्हें दोबारा किसी स्थान पर जमीन में स्थापित किया जाता है, जिसकी जानकारी आम ग्रामीणों को नहीं रहती.

ठाकुर देव को माना जाता है गांव का रक्षक
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, ठाकुर देव गांव की रक्षा करते हैं. गांव के बुजुर्गों से जुड़ी मान्यताओं में बताया जाता है कि पुराने समय में ठाकुर देव की सवारी घोड़े पर निकलती थी और रात में गांव का भ्रमण करती थी. बुजुर्ग बताते हैं कि कई दशक पहले तक रात में घोड़े की टाप सुनाई देने की बातें भी कही जाती थीं. हालांकि यह स्थानीय मान्यता और परंपरा का हिस्सा है.

पांच लोगों के नारियल से शुरू होती है पूजा
ठाकुर देव को जमीन से बाहर निकालने के बाद विधि-विधान से पूजा की जाती है. आचार्य विद्याधर पांडे के अनुसार, पूजा में सबसे पहले पांच लोगों की ओर से नारियल चढ़ाया जाता है. इसमें मालगुजार परिवार और सतनामी समाज के लोगों की ओर से सात्विक पूजा और हिंसा से दूर रहने की भावना के साथ नारियल अर्पित किया जाता है. इसके बाद पंचायत की ओर से नारियल चढ़ाया जाता है जबकि बाकी नारियल आचार्य द्वारा पूजा विधि के अनुसार फोड़े जाते हैं. इसके बाद ठाकुर देव की पारंपरिक बैगा पद्धति से पूजा होती है.

1982 से पूजा करा रहे आचार्य विद्याधर पांडे
आचार्य विद्याधर पांडे साल 1982 से बीदर त्योहार में पूजा करा रहे हैं. वह बताते हैं कि बीदर त्योहार छत्तीसगढ़ के कई गांवों में मनाया जाने वाला पारंपरिक त्योहार है लेकिन इसकी शुरुआत कब हुई, इसकी सटीक जानकारी किसी के पास नहीं है. वह करीब 46 वर्षों से गांव के प्रमुख त्योहारों में आचार्य के रूप में सेवा दे रहे हैं. उनके अनुसार बीदर त्योहार में पूजा सात्विक और वैदिक विधि से की जाती है.

मिल-जुलकर मनाते हैं बीदर त्योहार
बीदर त्योहार की सबसे बड़ी विशेषता गांव की सामाजिक एकता है. गतौरा गांव में अलग-अलग जाति और समुदाय के लोग रहते हैं लेकिन त्योहार के दौरान सभी एक साथ शामिल होते हैं. पूजा और आयोजन में सभी समाज के लोग सहयोग करते हैं. पंचायत की भूमिका मुख्य रूप से सुरक्षा और व्यवस्था संभालने की रहती है जबकि आयोजन में गांव के सभी समाज की सामूहिक भागीदारी होती है. यही वजह है कि ग्रामीण इसे आपसी प्रेम और भाईचारे को मजबूत करने वाला त्योहार भी मानते हैं.

पूजा में बलि नहीं, जीव हिंसा को लेकर भी जागरूकता
आचार्य विद्याधर पांडे ने आगे कहा कि बीदर त्योहार की मुख्य पूजा सात्विक होती है और इसमें जीव हिंसा या पशु बलि शामिल नहीं है. कुछ लोग पूजा के बाद अलग तौर पर पशु बलि या मदिरा आदि का सेवन करते हैं लेकिन यह पूजा का हिस्सा नहीं है. गांव में समय-समय पर जीव हिंसा को समाप्त करने को लेकर चर्चा भी होती है. उनका कहना है कि इस परंपरा में बदलाव के लिए पूरे समाज को मिलकर प्रयास करना होगा.

त्योहार में घर-घर आते हैं मेहमान
गतौरा गांव की करीब 12000 की आबादी के बीच बीदर त्योहार बड़े उत्साह से मनाया जाता है. त्योहार के दौरान गांव के लोगों के घरों में बड़ी संख्या में मेहमान पहुंचते हैं. अलग-अलग समाज के लोग एक-दूसरे के साथ मिलकर आयोजन में शामिल होते हैं. इस तरह बीदर त्योहार धार्मिक आस्था के साथ-साथ गांव की सामाजिक एकता और वर्षों पुरानी परंपरा को आगे बढ़ाने का माध्यम बना हुआ है.



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